अरविंद केजरीवाल की मुफ्त वाली राजनीति

“हम तो राजनीति बदलने आए हैं जी” : युगपुरुष श्री केजरीवाल जी की परिवर्तित (मुफ्त वाली) राजनीति

तो भ्रातागणों ! दिल्ली के यशस्वी मुख्यमंत्री एवं आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक माननीय श्री अरविंद केजरीवाल जी पहुँच ही गए पंजाब। पाँच नदियों का यह प्रदेश प्रतीक्षारत था उस महान राजनैतिक व्यक्तित्व के जिसने राजनीति परिवर्तन का वचन दिया था किन्तु कब राजनीति ने इन्हें परिवर्तित कर दिया, ज्ञात ही नहीं हुआ। पंजाब पहुँचे श्री केजरीवाल ने अपनी (फ्री वाली) पोटली में हाथ डाला एवं इस बार महिलाओं के लिए अप्रतिम उपहार निकाल लाए। एक हजार रुपए, जी हाँ मेरे भ्राताओं एवं भगिनियों, एक हजार रुपए प्रतिमाह का वचन दिया है माननीय केजरीवाल ने पंजाब की माताओं एवं बहनों को। चुनाव आयोग, चुनाव सुधार के ठेकेदार, सिविल सोसायटी और सामाजिक सुधार के अगुआ, रिपोर्ट लिखे जाने तक धृतराष्ट्र बने बैठे थे। दिल्ली में जो प्रयोग माननीय श्री केजरीवाल ने किया था, उसका प्रतिपालन उत्तराखंड, गोवा एवं पंजाब में किए जाने की योजना है। किन्तु कितना सही है ऐसे वचन देना? अथवा ऐसा कहिए कि यह अनैतिक क्यों नहीं है एवं इस पर अभी भी विरोध क्यों नहीं हुआ? आइए, करते हैं एक विश्लेषण।

सर्वप्रथम सुनिए कि क्या कहा है हमारे युगपुरुष ने

तो पंजाब के मोगा में 22 नवंबर 2021 को केजरीवाल जी ने एक ‘बड़ी’ रैली की। ‘बड़ी’ इसलिए लिखा कि कुछ 2BHK धारी और यूट्यूब वाले पत्रकारों को मोदी जी के विरोधियों की प्रत्येक रैली ही बड़ी प्रतीत होती है। अब ये ‘इंटेलेक्चुअल’ लोग कहते हैं तो बड़ी ही होती होंगी। तत्पश्चात केजरीवाल जी पर ध्यान केंद्रित करते हैं। रैली को संबोधित करते हुए AAP के केजरीवाल जी ने कह दिया कि भइया हम तो ‘महिला सशक्तिकरण’ करने आए हैं और हम यह सार्वजनिक तौर पर कहे देते हैं कि यदि पंजाब में हमारी सरकार आई तो हम 18 वर्ष से अधिक उम्र की सभी महिलाओं को 1000 रुपए प्रति माह देंगे। युगपुरुष यहीं नहीं रुके। उन्होंने यहाँ तक घोषित कर दिया कि यदि एक घर में तीन महिलाएं (सास, बहू और पोती/बेटी) है तो हम तीनों को एक-एक हजार देंगे। साथ ही जिन्हें पेंशन इत्यादि प्राप्त हो रही है उन्हें भी 1000 रुपए दिए जाएंगे।

केजरीवाल जी की घोषणा सुनकर लल्लन भइया को सदमा लग गया कि उन्होंने तो मतदाताओं को मात्र 80 रुपया का पउआ ‘ऑफर’ किया था लेकिन फिर भी उन्हें रपेट पड़ गई थी, नाम कलंकित हुआ सो अलग किन्तु यहाँ तो सार्वजनिक तौर पर हजार-हजार रुपए की घोषणाएं की जा रही हैं। माने यदि लल्लन भइया नेशनल लेवल के राजनेता न हुए तो उनका ‘ऑफर’ गलत और यदि केजरीवाल जी 1000 बाँटने की बात करें तो सही। सही है। तत्पश्चात लल्लन भइया तो स्वयं की जेब का धन खर्च रहे थे किन्तु यहाँ तो सरकारी बजट को लुटाने की बात हो रही है। (हालाँकि माननीय केजरीवाल ने नहीं बताया कि इस योजना का खर्च कितना आएगा, कहाँ से आएगा, कितना बोझ पड़ेगा) अब हम क्या ही कहें क्योंकि केजरीवाल जी तो राजनीति में परिवर्तन करने आए थे अतः संभव है कि यह उसी परिवर्तन का सूर्य हो और हमारे चक्षुओं के सम्मुख अंधभक्ति की धुंध छाई हो जिसके कारण हम परिवर्तन के इस सूर्योदय को देख पाने में असमर्थ हों।

मुँह जो लगी मिठाई तो नीम कहाँ सुहाए

दिल्ली में हुए विधानसभा चुनावों में भी माननीय युगपुरुष जी ने परिवर्तन की राजनीति का दाँव खेला था। फ्री बिजली एवं फ्री जल का वचन दिया। चुनाव हुए एवं केजरीवाल जी ने अभूतपूर्व प्रदर्शन किया। महिलाओं को बस की फ्री यात्रा का निर्णय भी लिया गया। अब परिवहन विभाग घाटे में जाता है तो जाए, हम तो वचन के पक्के हैं जी। दिल्ली में प्राप्त परिणामों ने केजरीवाल जी को ‘परिवर्तन’ का नया मार्ग दिखलाया एवं उसी मार्ग पर आधुनिक राजनीति के महात्मा चल पड़े। चलते-चलते कई चुनावी राज्यों का दौरा किया गया। इसी क्रम में उनका पहुँचना हुआ देवभूमि उत्तराखंड में। यहाँ भी उन्होंने फ्री बिजली एवं विभिन्न समुदायों को फ्री तीर्थयात्रा का वचन दे दिया है। एक तथ्य तो स्वीकारना पड़ेगा कि युगपुरुष जी सेक्युलरिज्म का भरपूर ध्यान रखते हैं। तीर्थयात्रा के लिए उन्होंने कहा है कि हिंदुओं को अयोध्या, मुसलमानों को अजमेर शरीफ एवं सिखों को करतारपुर साहिब की यात्रा कराई जाएगी। किन्तु मैं उनके सेक्युलरिज्म में 10 अंक काटना चाहूँगा क्योंकि उन्होंने ईसाइयों की चर्चा नहीं की। उन्हें यह कहना था कि ईसाइयों को भी वैटिकन न सही तो कम से कम केरल अथवा तमिलनाडु के चर्च तो ले ही जाएंगे एवं इसके साथ केजरीवाल जी को एक पैकेट बासमती चावल के प्रबंध का वचन तो देना ही चाहिए था।

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तत्पश्चात यह तो बात हुई उत्तराखंड की। जिस प्रकार महान संत आदि शंकराचार्य जी ने सुदूर दक्षिणी भाग केरल में जन्म लेकर सम्पूर्ण भारत को एकीकृत करने हेतु भारत भूमि के चार कोनों में मठों की स्थापना की थी एवं सुदूर उत्तर में जाकर मोक्ष प्राप्त किया था, उसी प्रकार केजरीवाल जी ने भी उत्तराखंड में चुनावी बिगुल फूँकने के साथ केरल के थोड़ा उत्तर में स्थित गोवा में भी अपनी इस चुनावी रणनीति का उपयोग करने की योजना बनाई। (नोट : यहाँ आदि शंकराचार्य जी की तुलना अरविंद केजरीवाल से नहीं की गई है अपितु यह लेख के हिसाब से एक कंटेक्स्ट मात्र है। मैं स्वयं आदि शंकराचार्य जी का अनुयायी हूँ एवं उनके समकक्ष किसी की कल्पना भी नहीं कर सकता।) तो गोवा में केजरीवाल जी ने वही तीर्थयात्रा वाला दाँव चला दिया, साथ ही साथ फ्री बिजली एवं बेरोजगारी भत्ता भी प्रदान करने की घोषणा कर आए। इसी ‘राजनैतिक परिवर्तन’ की यात्रा करते हुए केजरीवाल जी पहुँचे थे पंजाब।

अब पाठकगण यह समझ लें कि केजरीवाल जी भले ही गलत ही क्यों न हों किन्तु हैं तो लिबरलों की आँखों के तारे। यही कारण है कि भला उनकी इस ‘परिवर्तनवादी राजनीति’ पर कोई एक उँगली तो उठाकर दिखाए। इकोसिस्टम भला अपने इस अनूठे उत्पाद में किसी प्रकार की कोई कमी क्या ही निकलेगा। अब इस बात पर गंभीरता से विचार करते हैं। लिबरल, वामपंथी एवं सुधारवादी केजरीवाल जी के इन ‘चुनावी वचनों’ पर चुप्पी साधे हुए हैं। उनका चुप्पी साधना उचित भी है क्योंकि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का विरोधी कुछ भी करे, उसका अनैतिक होना असंभव है। किन्तु जिन्हें राजनैतिक सुधारों की चिंता है एवं जो स्वयं को निष्पक्ष मानते हुए राजनैतिक घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया दिया करते हैं, वो चुप क्यों हैं? वो इसे अनुचित क्यों नहीं कह रहे? क्यों करदाताओं के अथक परिश्रम का कोई मूल्य नहीं समझ आता?

चुनाव आयोग, नियम-कानून एवं संवैधानिक पहलू

केजरीवाल जी द्वारा इस प्रकार चुनावी घोषणाओं के मध्य चुनाव आयोग एवं चुनाव से संबंधित नियम-कानूनों पर भी चर्चा करना आवश्यक हो जाता है। चुनावी रैलियों में इस प्रकार की गई घोषणाओं पर चुनाव आयोग असमर्थ प्रतीत होता है। तमिलनाडु में इस प्रकार की घोषणाओं के लिए प्रसिद्ध रहा है। राज्य में बाँटे जा रहे ‘चुनावी उपहारों’ के विरोध में पहले मद्रास उच्च न्यायालय एवं तत्पश्चात उच्चतम न्यायालय में याचिका दाखिल की गई। तर्क (सुब्रमण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु राज्य) दिया गया कि चुनाव के चलते ‘मुफ्त’ की घोषणाएं करना न केवल असंवैधानिक है अपितु जनप्रतिनिधि अधिनियम 1951 की धारा 123 का उल्लंघन भी करता है।

सुनवाई हुई एवं अंततः उच्चतम न्यायालय ने यह कहते हुए सभी तर्कों को नकार दिया कि जनप्रतिनिधि अधिनियम 1951 की धारा 123, एक प्रत्याशी मात्र पर लागू होती है न कि किसी राजनैतिक दल पर। साथ ही यह भी कहा गया कि विभिन्न दलों द्वारा यदि मुफ्त में कुछ भी उपलब्ध कराने अथवा केजरीवाल जी जैसे महीने के पैसे देने की घोषणाएं करना जनप्रतिनिधि अधिनियम 1951 की धारा 123 का उल्लंघन नहीं है। इस हिसाब से तो उच्चतम न्यायालय के निर्णय का तात्पर्य यह है कि यदि एक निर्दलीय प्रत्याशी अपने मतदाताओं को मुफ्त में कुछ उपहार प्रदान करता है तो वह अनुचित है किन्तु क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय दल यदि ऐसी घोषणा करते हैं तो उसे उचित माना जाएगा।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 282 स्पष्ट तौर पर कहता है कि केंद्र एवं राज्य की सरकारें सार्वजनिक वित्त का उपयोग मात्र सार्वजनिक उद्देश्यों एवं जनकल्याण के लिए ही करेंगी किन्तु व्याख्या के अभाव के चलते चुनावों के पश्चात जब ऐसी मुफ्त वाली चुनावी घोषणाओं को पूर्ण करने के लिए सार्वजनिक वित्त का उपयोग किया जाता है तब सम्पूर्ण भार उस वर्ग पर आता है जो निष्ठा के साथ अपने कर का भुगतान करता है। जिम्मेदार संस्थाएं मूकदर्शक बनकर रह जाती हैं क्योंकि राजनैतिक दलों की ये घोषणाएं अंततः हैं तो ‘जनकल्याण’ के कार्य ही।

कृषकों को कम दामों पर बिजली, सिंचाई के लिए जल, खाद-बीज एवं उत्तम तकनीकी उपलब्ध कराना, बेरोजगारों को नौकरियाँ एवं स्व-रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना, महिलाओं को समानता का अधिकार एवं साथ ही साथ बेहतर शिक्षा एवं रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना, वंचितों एवं असमर्थों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान कराना राजनैतिक दलों की प्राथमिकता में होना चाहिए न कि मुफ्त में कुछ भी उपलब्ध कराने की घोषणाएं करना। यदि मैं बिजली का उपयोग कर रहा हूँ तो उसका मूल्य देना मेरा कर्त्तव्य है। यदि मैं समर्थ हूँ तो मुझे सरकार द्वारा प्राप्त सभी सेवाओं का भुगतान करना चाहिए। महँगाई, कीमतें, सब्सिडी एवं कर इत्यादि चर्चा के विषय हैं किन्तु प्रत्येक सेवा के लिए जो भी आधारभूत लागत है उसका भुगतान किया जाना प्रत्येक उस नागरिक के लिए आवश्यक है जो समर्थ है। एक बार के लिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए मुफ्त की योजनाएं प्रारंभ करना लघुकालिक तौर पर उचित निर्णय हो सकता है किन्तु अंततः ध्यान इस बात पर हो कि उस वर्ग का उत्थान कैसे किया जाए। किन्तु चुनावी लाभ के लिए जनता को मुफ्त का लालच देना किसी भी तौर पर उचित नहीं हो सकता।