श्रीरामचरितमानस के सुंदरकाण्ड का महात्म्य

धर्म एवं मूल्यों के सर्वोच्च परिमानों का संग्रह : तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस का सुंदरकाण्ड

श्रीराम जी के अनंत चरित्र हैं। युगों से देवों और मुनि-मनीषियों ने एवं इस कलियुग में अनेकों कवि एवं लेखकों ने श्रीराम जी के चरित्र का बखान किया है। इन कोटि चरित्रों में गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीराम चरित्र का एक विशेष स्थान है। तुलसीदास जी का यह प्रभु चरित्र संसार भर में श्रीरामचरितमानस के नाम से विख्यात है। मानस में तुलसीदास जी ने श्रीरघुनाथ जी के चरित्र को बड़े ही प्रेम एवं भक्ति-भाव से वर्णित किया है। मानस ग्रंथ सात भागों में व्यवस्थित है जिन्हें काण्ड कहा जाता है। ये सात कांड हैं ; बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुंदरकाण्ड, लंकाकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड।

इस रामचरित्र का एक-एक शब्द स्वयं में साक्षात प्रभु श्रीराम की आरती के समान है। ज्ञान एवं भक्ति का अनूठा संयोग है, श्रीरामचरितमानस। कहने को तो सम्पूर्ण मानस ग्रंथ ही दिव्य एवं अलौकिक है किन्तु सुंदरकाण्ड का एक विशेष महत्व है। आज भी हिन्दुओं में सुंदरकाण्ड के प्रति अटूट आस्था है। भले ही आज के व्यस्त समय में सम्पूर्ण श्रीरामचरितमानस का पाठ कठिन हो किन्तु कई घरों में सुंदरकाण्ड का पाठ अवश्य किया जाता है। सुंदरकाण्ड का पाठ करना, सम्पूर्ण श्रीरामचरितमानस के पाठ करने के समान ही पुण्य फलदायी है। सुंदरकाण्ड के विषय में कहा ही जाता है कि,

सुन्दरे सुन्दरो रामः सुन्दरे सुन्दरं वनम्।
सुन्दरे सुन्दरी सीता सुन्दरे किं न सुंदरम्।।

अर्थात सुंदरकाण्ड में सुन्दर श्रीराम जी हैं, सुन्दर वन है, सुन्दर श्रीसीता जी हैं, तो सुंदरकाण्ड में क्या सुन्दर नहीं है अर्थात सब कुछ सुन्दर है।

जीवन में समस्याएं हों अथवा कोई उत्सव-त्यौहार का समय हो, सुंदरकाण्ड के पाठ का आयोजन होता ही रहता है। कई हिन्दू परिवारों में वर्षों से मंगलवार अथवा शनिवार के दिन नियमित रूप से सुंदरकाण्ड का पाठ किया जाता रहा है।

आइए जानते हैं कि हमें सुंदरकाण्ड का पाठ क्यों करना चाहिए। मानस के इस महत्वपूर्ण भाग का न केवल पाठ किया जाना चाहिए अपितु हिंदी अनुवाद को पढ़ते हुए इसका सम्पूर्ण अध्ययन किया जाना चाहिए। सुंदरकाण्ड का अध्ययन इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि आज के समय में प्रत्येक व्यक्ति अवसाद और कुसंगति के मकड़जाल में फँसकर अपने मूल्यों का नाश करता जा रहा है, ऐसे में मनुष्य के चरित्र निर्माण के लिए सुंदरकाण्ड से सरल एवं उत्तम साधन और कोई नहीं हो सकता है।

हनुमान जी का आदर्श चरित्र :

सुंदरकाण्ड का सबसे आकर्षक भाग है, श्रीहनुमान जी महाराज का चरित्र। सुंदरकाण्ड में हनुमान जी की महान शक्ति का वर्णन किया गया है। इस महान शक्ति एवं अतुलित बल की उपस्थिति भी हनुमान जी को सौम्य एवं शांत बनाए रखती है। हनुमान जी की इसी निरहंकारिता का वर्णन कई मोटिवेशनल स्पीकर भी करते हैं। सुंदरकाण्ड के माध्यम से हनुमान जी यह सीख देते हैं कि असीम सामर्थ्य होने के बाद भी किस प्रकार अहंकार से कोषों दूर रहा जाए। सुंदरकाण्ड में हनुमान जी की प्रगाढ़ रामभक्ति का भी वर्णन किया गया है। पूरा सुंदरकाण्ड पवनसुत के चातुर्य, विचक्षणता एवं बुद्धिमत्ता के उदाहरणों से भरा हुआ है। जब हनुमान जी लंका दहन करके माता सीता की सूचना लेकर भगवान श्री राम के पास पहुँचते हैं तो प्रभु उनसे लंका में उनके द्वारा किए गए कारनामों के विषय में पूछते हैं। तब हनुमान जी का सीधे तौर पर कहते हैं,

सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।

सुंदरकाण्ड में हनुमान जी की यही विशेषता देखने को मिलती है कि प्रत्येक बार हनुमान जी अपने पराक्रम और सामर्थ्य के लिए प्रभु श्री राम को ही प्रेरणा मानते हैं।

भक्तवत्सल श्रीरघुनाथ जी :

हालाँकि गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी श्रीराम चरित्र की व्याख्या करने से पूर्व बड़ी क्षमा याचना करी कि वे ब्रह्मांडनायक श्रीराम जी का चरित्र चित्रण कर रहे हैं। ऐसा ही कुछ यहां भी है। तुलसीदास जी सुंदरकाण्ड में प्रभु श्रीराम के जिस चरित्र का जीवंत चित्रण किया है वह अद्भुत है और उनके पश्चात कुछ भी शेष नहीं रह जाता किन्तु अब जब लेख लिखा ही जा रहा है तो प्रभु के विषय में कुछ पंक्तियाँ तो लिखनी ही होंगी। सुंदरकाण्ड में तीन प्रसंग ऐसे हैं जहाँ प्रभु का भक्तवत्सल स्वरूप दिखाई देता है। पहला, जब हनुमान जी माता सीता जी की जानकारी लेकर लंका से लौटते हैं, तब रामजी, हनुमान जी को अपने हृदय से लगा लेते हैं और उनकी खूब प्रशंसा करते हैं। श्रीराम और हनुमान जी का वह संवाद निश्चित ही हम सभी को पढ़ना एवं समझना चाहिए।

दूसरा, जब विभीषण लंका का त्याग करके श्रीराम की शरण में आते हैं तब प्रभु उन्हें न केवल स्वीकार करते हैं अपितु उसी क्षण उनका राज्याभिषेक करके उन्हें लंका का सम्राट घोषित कर देते हैं। सुग्रीव आदि मंत्रियों के इस भय के पश्चात भी कि विभीषण भेद लेने आया है, प्रभु श्रीराम, विभीषण को अपने परम मित्र की पदवी प्रदान करते हैं।

तीसरा प्रसंग रावण के दूत शुक से सम्बंधित है जब शुक भी रावण के वैभव को छोड़कर श्रीराम जी की शरण में आता है तो उसे भी प्रभु अपना सकल आशीष प्रदान करते हैं और वह श्राप से मुक्त होकर परमधाम को प्राप्त करता है।

सुंदरकाण्ड में वर्णित श्रीरघुनाथ जी का चरित्र इतना उत्तम एवं अलौकिक है कि उसका वर्णन करना असंभव है। सुंदरकाण्ड का पाठ करने वाला व्यक्ति ही इस आनंद का अनुभव कर सकता है।  

कमल का पुष्प कीचड़ में ही खिलता है :

सुंदरकाण्ड में कई ऐसे पात्रों का वर्णन है जिन्होंने अधर्म की छाया में रहकर भी अपने धर्म को बचाए रखा। आसुरी माया के वातावरण में भी भगवान् का स्मरण करते रहना एवं मानवीय मूल्यों पर अडिग रहना अत्यंत कठिन है किन्तु सुंदरकाण्ड में ऐसे महानुभावों के अनेकों उदाहरण हैं।

सबसे पहले तो विभीषण ही एक महान उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। रावण के अनुज होने के पश्चात भी उन्होंने धर्म के मार्ग का त्याग नहीं किया। उनका सम्पूर्ण कुल ही अधर्मी एवं श्रीराम द्रोही हो गया था किन्तु विभीषण ने अपना कुल एवं राज्य का त्याग करना उचित जाना किन्तु प्रभु श्रीराम के साथ द्रोह नहीं किया। अंतिम समय तक उन्होंने अपने अग्रज को समझाने का प्रयत्न किया और अंततः धर्म और अधर्म के उस विराट युद्ध में विभीषण धर्म के रथ पर सवार हो चले। जब हनुमान जी प्रथम यात्रा में लंका गए हुए थे तब वे स्वयं आश्चर्यचकित हो गए कि असुरों की नगरी लंका में एक सज्जन कैसे निवास कर रहा है।

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माल्यवंत और त्रिजटा भी उस राक्षसी राज्य में रहने वाले दो धर्मपरायण मनुष्य थे। माल्यवंत के विषय में कहा गया है कि वे अत्यंत बुद्धिमान थे। जब विभीषण ने रावण को श्रीराम से क्षमा मांगने और माता सीता को उनके निकट सकुशल भेजने का सुझाव दिया तब विभीषण का समर्थन करने वाले एक मात्र सभासद माल्यवंत ही थे। त्रिजटा के विषय में तो तुलसीदास जी ने कहा है कि,

त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।

अर्थात राक्षसियों में त्रिजटा नाम की एक राक्षसी थी जिसकी श्रीरामचन्द्र जी के चरणों में प्रीति थी और वह विवेक में निपुण थी अर्थात विवेकवान थी।

इनके अतिरिक्त रावण की पत्नी मंदोदरी एवं उसका दूत शुक भी उस अधर्म के राज्य में होते हुए भी विवेकहीन नहीं हुए थे। दोनों ने ही रावण को श्रीराम के सामर्थ्य एवं पराक्रम का भान कराने का भरपूर प्रयत्न किया किन्तु रावण अहंकार में उन दोनों की चेतावनी को समझ नहीं सका। मंदोदरी रावण की हंसी का पात्र बनी और शुक को रावण ने अपने राज्य से निकाल दिया। शुक भी कहीं और नहीं गया अपितु उसने भी श्रीराम की ही शरण ली।

कहने का तात्पर्य है कि सुंदरकाण्ड स्वयं में एक सम्पूर्ण शिक्षा है। सुंदरकाण्ड में जहां एक ओर हनुमान जी की रामभक्ति है, शौर्य एवं पराक्रम है, व्यवहार-कुशलता एवं बुद्धिमत्ता है, निरहंकारिता है वहीं दूसरी ओर रावण का रामद्रोह है, उसका अज्ञान एवं मूर्खता है, अहंकार है।

सुंदरकाण्ड में जहां एक ओर मंदोदरी की अपने पति के प्रति चिंता है तो वहीं दूसरी ओर प्रभु श्रीराम का माता सीता के प्रति प्रेम है एवं माता सीता का प्रभु श्रीरामचन्द्र जी से बिछोह का भाव भी है। सुंदरकाण्ड में जहां एक ओर विभीषण और शुक जैसे असुरों की धर्मपरायणता है वहीं दूसरी ओर रावण के अन्य सभासदों की चाटुकारिता भी है। मानस ग्रंथ का सुंदरकाण्ड एक ऐसा भाग है जहां माता सीता और श्रीरघुनाथ जी के प्रति रावण का क्रूर व्यवहार एवं धृष्टता है वहीं श्रीराम जी की विभीषण के प्रति मित्रता एवं शुक के प्रति करुणा का भाव भी है।

सुंदरकाण्ड सभी मानवीय भावनाओं से परिपूर्ण है। यह नीति एवं सत्य पर आधारित है। यह रामभक्ति की महान गाथा कहता है। यह प्रेम एवं करुणा के भावों को स्वयं में समेटे हुए है। यदि हमारे भीतर किसी भी प्रकार की नकारात्मकता फल-फूल रही है तो हमें निश्चित तौर पर सुंदरकाण्ड का पाठ करना चाहिए। एक अच्छा मनुष्य बनने के लिए एवं श्रीराम का सकल आशीष प्राप्त करने के लिए सुंदरकाण्ड का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है।

तो विलंब कैसा? यदि आप अभी भी सुंदरकाण्ड का पाठ नहीं करते हैं तो प्रारम्भ कीजिए और अपने जीवन में सकारात्मकता का संचार कीजिए।

।।जय श्रीराम।।