कृषि सुधार कानूनों को रद्द करने का निर्णय लिया पीएम मोदी ने

PM मोदी ने क्यों लिया कृषि सुधार कानूनों को वापस लेने का निर्णय? एक विश्लेषण

आज उत्साह का माहौल है। लिबरलों और वामपंथियों का झुंड एकत्रित होकर सियार ध्वनि निकाल रहा है। भारत को तोड़ने का स्वप्न देखने और उसके लिए सतत परिश्रम करने वाले आज खुशी के मारे अपनी पसलियों पर इतना जोर दिए दे रहे हैं कि मुझे यह चिंता है कि ये कहीं कल तक अस्पताल का बिस्तर न पकड़ लें। किसानों के तथाकथित हितैषी ‘अधर्म पर धर्म की विजय’, ‘असत्य पर सत्य की जीत’, ‘किसानों के बलिदानों की जीत’, ‘अहंकार की पराजय’ एवं ऐसे ही अनेकों वाक्यांश गढ़ कर आगामी कुछ दिनों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का डाटा स्टोरेज कई गुना बढ़ाने वाले हैं। महीनों से किसानों के समर्थन में शब्दों के मकड़जाल बुनने वाले रिहाना और मिया खलीफा के सहारे अपनी आगामी कुछ रात्रियाँ व्यतीत करेंगे और अपने शुद्ध अंतःकरण से किसानों को दिए गए इनके समर्थन का आभार प्रकट करेंगे।

यह सब संभव हुआ है प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के लगभग 17 मिनट के सम्बोधन के कारण जिसमें उन्होंने तीनों कृषि सुधार कानूनों को वापस लेने (रिपील करने) की घोषणा की। उन्होंने कहा कि इसी महीने के अंत में प्रारंभ होने जा रहे संसद सत्र में तीनों कृषि सुधार कानूनों को वापस लेने की संवैधानिक प्रक्रिया शुरू की जाएगी। किन्तु यह प्रश्न सभी के मन में है कि अपनी दमदार छवि के लिए विख्यात मोदी जी अंततः कथित किसानों के महीनों से चल रहे आंदोलन के आगे क्यों झुक गए? क्या उन्होंने हार मान ली? क्या सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सम्मुख कोई और मार्ग शेष नहीं रह गया था? क्या कारण था कि स्वयं मोदी जी को सामने आकर कृषि सुधार कानूनों (वो तीनों कानून कृषि सुधार के लिए ही बने थे और मैं उन्हें कृषि सुधार कानून ही कहूँगा) को वापस लेने की बात कहनी पड़ी? इसका विश्लेषण आवश्यक है और इसके पीछे एक सबक है उनके लिए जो स्वयं को भाजपा का समर्पित कार्यकर्ता कहते हैं, जो भाजपा के संगठन एवं सरकार में उच्च पदों पर बैठे हुए हैं। सबक है उन दक्षिणपंथियों के लिए जो लाखों लोगों का जनाधार होने के पश्चात भी अपनी बात को आमजनों तक पहुँचाने में असफल रहे।

मोदी जी के इस अप्रत्याशित निर्णय के सभी पहलुओं पर चर्चा करने के लिए सर्वप्रथम उनके संबोधन पर चर्चा करनी आवश्यक है। वास्तव में मोदी जी का लगभग 17 मिनट का संबोधन तीन भागों में विभाजित था। मोदी जी के मुखमंडल पर कोई चिंता या अवसाद के भाव नहीं थे अपितु वह संतुष्ट दिखाई दे रहे थे और उनकी बातों से यह स्पष्ट था कि यह कोई अप्रत्याशित नहीं अपितु भली-भाँति विचार करने के पश्चात लिया गया निर्णय है। मोदी जी के भावों में भारत के किसानों के लिए उनकी सरकार के द्वारा किए गए सुधार कार्यों की संतुष्टि का तेज पुंज था।

वीडियो साभार : भारतीय जनता पार्टी

मोदी जी ने अपने संबोधन के पहले भाग में अपनी सरकार के द्वारा किसानों और कृषि हित में किए गए कार्यों और लिए गए निर्णयों का लेखा-जोखा दिया। उन्होंने बताया कि कैसे 2014 में सत्ता में आने के पश्चात उन्होंने कृषिगत अवसंरचना के विकास पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि कैसे उनकी सरकार ने किसानों को ऋण प्रदान करने और कृषि के उत्थान के लिए हरसंभव सहायता करने का प्रयास किया। सत्य भी यही है कि किसानों की आय को बढ़ाने और कृषि में सुधारों के नए युग के आरंभ के लिए जो प्रयास मोदी जी की सरकार ने किए, वो पूर्ववर्ती किसी भी सरकार द्वारा नहीं हुए।

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मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने खेती को उन्नत बनाने और उसमें निहित लाभ की अनवरत वृद्धि के लिए नवाचार के साथ आर्थिक एवं सामाजिक सुरक्षा देने का कार्य भी किया। कृषि सुधार कानून भी इन्हीं सुधारवादी प्रयासों का एक भाग थे। मोदी जी ने अपने संबोधन में बताया कि इन कानूनों का लक्ष्य ही था किसानों को बेहतर अवसर प्रदान करके उनके लिए विकल्पों का पिटारा खोल देना। लाभान्वित होते वो करोड़ों किसान जो लघु श्रेणी में आते हैं, जिनके पास 2 हैक्टेयर से भी कम कृषि भूमि है एवं जिनकी संख्या लगभग 10 करोड़ है। अपने संबोधन के पहले भाग में मोदी जी ने गर्वित होकर अपने प्रयासों को हमारे सामने प्रस्तुत किया।

महत्वपूर्ण है मोदी जी के संबोधन का दूसरा भाग जिसमें कृषि सुधार कानूनों को वापस लेने के सम्पूर्ण कारण निहित हैं। दूसरा भाग कृषि सुधार कानूनों के अस्तित्व में आने के पश्चात उन कमियों पर अप्रत्यक्ष रूप से प्रकाश डालता है जिनके कारण मोदी जी को कहना पड़ा कि उनकी तपस्या में ही कोई कमी रह गई थी जिसके कारण वो अपनी ईमानदारी एवं किसानों के हित में किए जा रहे प्रयासों को लोगों तक नहीं पहुँचा पाए। दूसरे भाग में चेतावनी है उस इकोसिस्टम के विरुद्ध जिससे लड़ने में दक्षिणपंथी असफल रहे और जिसका खामियाजा कृषि सुधार कानूनों की असफलता के रूप में पूरे भारत को भुगतना पड़ा। मोदी जी ने एक मुखिया की भाँति सब अपने सिर पर लेते हुए कह डाला कि उनका हृदय पूर्णतः सच्चा था किन्तु फिर भी किसानों का एक वर्ग असन्तुष्ट बना रहा एवं अपनी बात को पूर्णतः इन किसानों तक ले जाने में वो असफल रहे। हालाँकि दोष मोदी जी का नहीं है और न ही यह आंदोलन किसानों के हित में था।

कृषि सुधार के लिए बने कानूनों को किसान विरोधी बताने का कार्य किया उस इकोसिस्टम ने जो इस बार भारी पड़ गया। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय तौर पर इस इकोसिस्टम ने भारत के आन्दोलनरत कथित किसानों को हीरो बना दिया। 26 जनवरी को लाल किले पर उपद्रव मचाने वाले आंदोलनकारी लोकतंत्र की बहाली के लिए किए जा रहे संघर्ष का चेहरा बना दिए गए। टेंट और तंबू तानकर लाखों लोगों की दिनचर्या, आर्थिक व्यवहार और व्यापारिक स्थिरता को नष्ट करने वाले आंदोलनकारी इस इकोसिस्टम के सहारे प्रत्येक अपराध से मुक्त होते गए। दिल्ली के निकटतम क्षेत्रों में चल रहे 3-4 आंदोलनों को पूरे भारत के किसानों के हितों का प्रतिनिधि बताया गया। इकोसिस्टम ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया और सरकार के विरोध में वातावरण तैयार करने के लिए किसानों को ढाल बनाया क्योंकि किसान का अर्थ है भावनाएं जो आम लोगों के मन में उनके लिए सम्मान के रूप में रची-बसी हैं।

किन्तु इसके उलट भाजपा के संगठन पदाधिकारियों, संबंधित संगठनों एवं जनप्रतिनिधियों ने क्या किया? मेरा निजी अनुभव है कि मोदी जी एवं भाजपा का विरोध करने वाले आए दिन लोगों में कृषि सुधार कानूनों के विरूद्ध अफवाह प्रसारित करते रहे। किसानों को भड़काते रहे और इकोसिस्टम के सबसे छोटे प्यादे बनकर सूक्ष्म समूहों में रहकर भी लोगों के मन एवं मस्तिष्क में ‘कथित’ किसानों पर हो रहे ‘कथित’ अत्याचारों का बीज बोते रहे। किसानों के प्रति लोगों के मन में हमेशा से सद्भावना ही रहती आई है और इकोसिस्टम ने इसी सद्भावना का उपयोग करते हुए ‘खेला’ कर दिया।

किन्तु मेरे निजी अनुभव का एक पहलू यह भी है कि मैंने भाजपा, उसके संगठन के पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को किसी भी तरह से लोगों तक कृषि सुधार कानूनों के लाभों को पहुँचाते हुए नहीं देखा। कहने को बहसें हुईं, टीवी पर बड़े-बड़े स्टूडियो में बैठकर प्रवक्ताओं ने कानून विरोधियों से कानूनों के नाम पूछकर अपनी रणनीतिक विजय का अट्टहास कर लिया लेकिन इकोसिस्टम को यह ज्ञात है कि ‘एक झूठ को यदि 100 बार प्रखरता से कहा जाए तो वह सत्य प्रतीत होने लगता है’। कानूनों का नाम भी न बता पाने वाले इस तथ्य से परिचित थे सो उन्होंने झूठ पर झूठ कहे और लगातार कहते रहे।

दिल्ली की सीमाओं के अतिरिक्त भारत में कहीं भी ऐसा बड़ा आंदोलन नहीं खड़ा हुआ। कुछ स्थानों पर टेंट लगाकर लोग बैठे रहे किन्तु उनका क्या लक्ष्य था, उन्हें भी ठीक से ज्ञात नहीं था। राजनैतिक सक्रियता के कारण अनेकों लोग आंदोलन जैसा कुछ करने का प्रयास कर रहे थे। किन्तु गंभीरता से विचार करें तो हम पाएंगे कि भले ही कृषि कानूनों के विरोध में भारत के अन्य हिस्सों में संगठित विरोध देखने को नहीं मिला किन्तु कोई संगठित समर्थन भी नहीं दिखाई दिया। कथित किसान आंदोलन के सामने कमी थी एक ‘काउंटर आंदोलन’ की जो कृषि सुधार कानूनों के समर्थन में हो। भाजपा एवं उसके सहयोगी संगठन भारत में कहीं भी बड़ी संख्या में किसानों को इकट्ठा नहीं कर पाए जो खुलकर कह सकें कि उन्हें यही कृषि सुधार कानून चाहिए एवं वो अंतिम समय तक सरकार के साथ खड़े रहेंगे।

इसी काउंटर आंदोलन की कमी का लाभ उठाते हुए इकोसिस्टम ने किसानों के प्रति लोगों के मन में बसी संवेदनाओं और सम्मान का ज्वार अपनी ओर मोड़ लिया। अब अंततः हैं तो वो ‘अन्नदाता’ ही, वो गलत कैसे हो सकते हैं। इन्हीं भावनाओं का परिणाम था कि इकोसिस्टम निष्पक्ष लोगों में भी यह विचार प्लांट करने में सफल रहा कि हाँ सरकार भी गलत नहीं है लेकिन किसानों के साथ भी कहीं न कहीं गलत हो ही रहा है। ‘बेनिफिट ऑफ डाउट’ गया आंदोलनकारियों की ओर किन्तु जिन्हें कृषि सुधार कानूनों का प्रचार-प्रसार करना चाहिए था, वो निश्चिंत बैठे थे। उन्होंने यह मान लिया था कि मोदी है न। इसी के विषय में मोदी जी ने कहा, “हमारी तपस्या में ही कमी रह गई थी”। 

हालाँकि संघर्ष और राष्ट्रप्रेम का दूसरा नाम है मोदी। अपने संबोधन के तीसरे एवं आखिरी भाग में मोदी जी ने स्पष्ट तौर पर कहा कि उनकी सरकार किसानों के हित में कार्य करती आई है और भविष्य में भी करती रहेगी। सुधार मोदी जी की प्राथमिकता है और इतिहास साक्षी रहा है कि गुजरात से लेकर अपने प्रधानमंत्रित्व काल में मोदी जी ने सुधारवादी परिवर्तनों के लिए कभी भी कड़े निर्णयों को लेने में संकोच नहीं किया। उन्होंने भले ही कृषि सुधार कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर दी है किन्तु कृषि सुधार उनके एजेंडे का प्रमुख अंग अभी भी बना हुआ है।

अपने संबोधन में कृषि सुधार को लेकर उन्होंने स्पष्ट तौर पर यह कहा कि जीरो बजट खेती को बढ़ावा देने, देश की बदलती आवशयकताओं को ध्यान में रखकर क्रॉप पैटर्न को वैज्ञानिक तरीके से बदलने के लिए, एमएसपी को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए एवं ऐसे सभी विषयों पर निर्णय लेने के लिए एक कमेटी का गठन किया जाएगा। इस कमेटी में केंद्र सरकार, राज्य सरकारों के प्रतिनिधि, किसान, कृषि वैज्ञानिक एवं कृषि अर्थशास्त्री होंगे। 2016 में नवंबर महीने में ही जब विमुद्रीकरण (नोटबंदी) का निर्णय लिया गया था तब उसकी आलोचना हुई थी किन्तु जब आज हम एक सब्जी के ठेले पर भी डिजिटल पेमेंट एक्सेप्ट करने के लिए बार कोड लगा देखते हैं तो मोदी जी द्वारा 5 साल पहले लिए गए निर्णय का स्मरण हो उठता है और भारत में लगातार बढ़ रहे डिजिटल पेमेंट (विश्व में सफलतम डिजिटल पेमेंट व्यवस्था भारत में ही है) के दायरे के आगे विमुद्रीकरण एवं मोदी जी के लिए हुई आलोचनाएं धूमिल हो जाती हैं।

कहने का तात्पर्य है कि आज लिबरल, वामपंथी और इकोसिस्टम के सदस्य कूद-कूद कर मोदी जी के निर्णय का उत्सव मना रहे हों किन्तु कृषि सुधारों को टाला नहीं जा सकता है। इन्हें यह स्मरण कर लेना चाहिए कि सुधार होकर ही रहते हैं। सुधार एक सतत प्रक्रिया है जो किसी के रोके नहीं रुकती। तत्पश्चात जब भारत जैसे महान राष्ट्र का यशस्वी प्रधानमंत्री कहता है, “जो किया किसानों के लिए किया था, जो अब कर रहा हूँ देश के लिए कर रहा हूँ। साथ ही अब और मेहनत करूँगा जिससे आपके सपने साकार हो सकें और देश के सपने साकार हो सकें”, तो यह समझ लेना चाहिए कि नए सुधारों के प्रारंभ की दिशा में निश्चित ही कुछ विचार किया जाएगा।