जयपुर और संभल में स्थित कल्कि मंदिर

भारत के दो मंदिर जहाँ पूजे जाते हैं ऐसे भगवान जिनके जन्म की प्रतीक्षा में है सम्पूर्ण जगत

भारतवर्ष के कोने-कोने में अगणित मंदिर स्थापित हैं जहाँ भगवान के विभिन्न स्वरूप और अवतार विराजमान हैं। इन मंदिरों का प्राचीन इतिहास है और इनसे जुड़ी अनेकों मान्यताएँ हैं। इन्हीं मंदिरों की श्रृंखला में हम अपनी इस भारत भूमि के दो ऐसे मंदिरों के विषय में जानकारी देंगे जो भगवान के उन स्वरूप को समर्पित हैं जिनका पृथ्वी पर आना अभी शेष है। ये दो मंदिर राजस्थान की राजधानी जयपुर और उत्तर प्रदेश के संभल जिले में स्थित हैं जहाँ भगवान विष्णु के दसवें अवतार भगवान कल्कि की पूजा की जाती है।

जयपुर के संस्थापक द्वारा स्थापित 300 वर्ष प्राचीन कल्कि मंदिर :

‘गुलाबी शहर’ अथवा ‘पिंक सिटी’ के नाम से विख्यात राजस्थान की राजधानी जयपुर के सुप्रसिद्ध हवा महल के निकट सिरहड्योढ़ी नामक क्षेत्र में स्थित है भगवान कल्कि का मंदिर। यह मंदिर जयपुर शहर की नींव रखने वाले महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने बनवाया था। अनेकों उपलब्ध प्रमाणों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण सन् 1739 में कराया गया। हालाँकि भगवान कल्कि हजारों वर्ष पश्चात इस भारत भूमि पर अवतरित होंगे किन्तु महाराजा जय सिंह ने सनातन शास्त्रों में वर्णित भगवान कल्कि के स्वरूप के आधार पर इस मंदिर का निर्माण कराया।

जयपुर के कल्कि मंदिर का निर्माण शिखर शैली में हुआ है। मंदिर के निर्माण के लिए लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर का उपयोग किया गया है। इसके अतिरिक्त मंदिर के मंडप तीन विभिन्न शैलियों में निर्मित किए गए हैं। भगवान कल्कि के अतिरिक्त मंदिर में उनकी सवारी श्वेत अश्व की प्रतिमा भी स्थापित की गई है। जयपुर के इस अनूठे कल्कि मंदिर में संगमरमर पर नक्काशी भी देखने को मिलती है। मंदिर के गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर अत्यंत पवित्र माने जाने वाले शंख और गदा की आकृति संगमरमर के पत्थर पर उकेरी गई है।

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उत्तर प्रदेश के संभल में 1000 वर्ष प्राचीन कल्कि मंदिर :

जयपुर के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश के संभल जिले में भी भगवान कल्कि का प्राचीनतम मंदिर स्थित है। मंदिर के महंत के निकट सुरक्षित रखे लगभग 1000 वर्ष प्राचीन मानचित्र में कल्कि मंदिर का प्रमाण उपस्थित है। इन प्रमाणों के अनुसार मंदिर का निर्माण लगभग 1000 वर्ष पूर्व मनु महाराज ने कराया था। मानचित्र में मंदिर को मनु श्री कल्कि मंदिर के नाम से अंकित किया गया है। संभल के कल्कि मंदिर का जीर्णोद्धार इंदौर की महारानी राजमाता अहिल्याबाई होल्कर द्वारा अपने राजज्योतिष की सलाह पर कराया गया। इसके पश्चात महारानी के राजज्योतिष के वंशज ही मंदिर में मुख्य पुजारी के रूप में अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं।

संभल स्थित कल्कि मंदिर की वास्तुकला मंदिर निर्माण की द्रविड़ शैली से प्रेरित है जो रहस्य का विषय है क्योंकि भारत के उत्तरी भाग में द्रविड़ शैली के मंदिर बहुत दुर्लभ हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार पर राजमाता अहिल्याबाई होल्कर के राज्य के राजचिन्ह आज भी हैं।

सनातन की महान देव परंपरा का अनुपम उदाहरण :

श्रीहरि के दसवें अवतार भगवान कल्कि कलियुग के उस चरण में अवतार लेंगे जब अधर्म अपने चरम पर होगा और धर्म लगातार क्षीण होता जाएगा। शास्त्रों और पुराणों के अनुसार ऐसा समय हजारों वर्षों के पश्चात आएगा। किन्तु यह सनातन का माहात्म्य ही है कि हमारे वैदिक ग्रंथों ने भगवान के ऐसे स्वरूप के विषय में पूर्व में ही जानकारी प्रदान की है जिनका अवतरण हजारों वर्षों के पश्चात होना है। भगवान कल्कि के विषय में यह कहा गया है कि उनके द्वारा अधर्म का नाश किया जाएगा और वही होंगे जो कलियुग का उद्धार करेंगे।

ऐसे ही अनेकों मंदिर भारत के विभिन्न स्थानों में स्थित हैं। इनमें से कई मंदिर ऐसे हैं जो मुख्यधारा से कटे हुए हैं। जयपुर और संभल में स्थित कल्कि मंदिर भी ऐसे ही हैं जिनके विषय में अभी जानकारी का अभाव है। अभी भी इन मंदिरों की स्थापना के उद्देश्य और इनके प्राचीन इतिहास के विषय में शोध किया जाना शेष है। किन्तु ये मंदिर हैं तो हमारी धरोहर ही इसलिए यह हमारा कर्त्तव्य है कि समय मिलने पर हम इन मंदिरों की यात्रा करें और इनसे जुड़ी परंपराओं और मान्यताओं के विषय में जानकारी प्राप्त करें।

जयपुर, राजस्थान की राजधानी है जिस कारण भारत के कोने-कोने से यहाँ पहुँचने के लिए यातायात के साधन उपलब्ध हैं। जयपुर के अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे, रेलवे जंक्शन और बस स्टैंड से कल्कि मंदिर की दूरी क्रमशः 12 किमी, 5 किमी और 2.5 किमी है। वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के उत्तरी भाग में स्थित संभल एक छोटा शहर होने के कारण सीधे तौर पर गिने चुने स्थानों से ही जुड़ा हुआ है। संभल का निकटतम हवाईअड्डा पंतनगर है जो संभल से लगभग 101 किमी की दूरी पर है। इसके अतिरिक्त संभल पहुँचने के लिए निकटतम रेलवे जंक्शन मुरादाबाद है जो संभल से लगभग 35 किमी दूर है। हालाँकि उत्तर प्रदेश में सड़कों का सुव्यवस्थित नेटवर्क होने के कारण उत्तर प्रदेश और पड़ोसी राज्यों से सड़क मार्ग के माध्यम से संभल पहुँचना सरल है।