अयोध्या की दीपावली

दीपावली 2021 : गोवा से लेकर पश्चिम बंगाल तक, जानिए दीवाली के विभिन्न स्वरूपों के विषय में

आज (04 नवंबर 2021) दीपावली है। आज त्यौहार है हर्षोल्लास, सकारात्मकता, प्रकाश और उत्साह का। यदि दीवाली को भारतवर्ष का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे बड़ा त्यौहार कहा जाए तो गलत नहीं है क्योंकि न केवल भारत अपितु विश्व में कई दूसरे देशों में दीपावली या तो भारतीय स्वरूप में अथवा थोड़ी-बहुत विभिन्नता के साथ मनाई जाती है। यह कहना सही है कि जहाँ भी हिंदुओं की जनसंख्या पर्याप्त है वहाँ दीपावली का आयोजन बड़े ही धूमधाम से होता है किन्तु कई ऐसे देश है जहाँ गैर-हिंदुओं द्वारा प्रकाशोत्सव मनाए जाते हैं।

अब भले ही इन उत्सवों के नाम भिन्न हों किन्तु इनकी अवधारणा हमारी दीवाली के समान ही है। यह उत्सव ही ऐसा है क्योंकि संभवतः यह वर्ष का सबसे सकारात्मक समय है और इस त्यौहार की उमंग ही ऐसी है कि अमावस्या को भी सुंदरतम बना देती है। अपने राष्ट्र भारत की ही बात करें तो विभिन्न राज्यों में ही दीपावली के विभिन्न रूप हैं। हमारा उद्देश्य यही है कि हम इस लेख के माध्यम से भारत के विभिन्न राज्यों में दीपावली के भिन्न-भिन्न स्वरूपों के विषय में आपको अवगत करा सकें।

अयोध्या :

दीपावली की चर्चा हो और अयोध्या का नाम न आए, यह संभव ही नहीं। किन्तु अनेकों वर्षों तक अयोध्या उस त्यौहार के रंगों से अछूती रही जहाँ से उसका प्रारंभ ही हुआ था। भगवान श्री राम की लंका विजय के पश्चात अयोध्या आगमन पर नगरवासियों ने सम्पूर्ण धर्मनगरी को सजाया और अगणित दीप जलाए। तब से सनातन हिन्दू धर्म का अभिन्न अंग बनी दीवाली, पिछले कुछ वर्षों से अयोध्या के समय पटल से ओझल रही किन्तु श्रीरामजन्मभूमि पर बने अवैध ढाँचे के हटाए जाने और उसका मालिकाना अधिकार हिंदुओं को प्राप्त होने के पश्चात अब जाकर 21वीं शताब्दी में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पुनः अयोध्या में भव्य दीपोत्सव का प्रारंभ हुआ।

मिट्टी के लाखों दीपकों से परम पवित्र माँ सरयू के घाट देदीप्यमान हो उठे और सम्पूर्ण अयोध्या नगरी को पुनः उसी प्रकार सुसज्जित किया गया जिस प्रकार त्रेतायुग में भगवान राम के स्वागत में अयोध्या का शृंगार हुआ था। हालांकि अयोध्या की दीवाली ठीक उसी प्रकार मनाई जाती है जिस प्रकार सम्पूर्ण भारतवर्ष में किन्तु मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ के मार्गदर्शन में वर्तमान समय में जिस प्रकार अयोध्या में दीपोत्सव का आयोजन किया जा रहा है, संभवतः ही कोई ऐसा धर्मपरायण हिन्दू होगा (लिबरल और वामपंथियों को छोड़कर), जिसके मन में एक बार अयोध्या की दीपावली में सम्मिलित होने की लालसा न उत्पन्न हुई हो।

पश्चिम बंगाल :

दुर्गा पूजा और सनातन धर्म के तंत्र भाग को आज भी जीवंत रखने वाला राज्य पश्चिम बंगाल ही है और दीपावली भी यहाँ काली पूजा के रूप में ही मनाई जाती है। दीवाली के इस उत्सव को श्यामा पूजा भी कहा जाता है। पूरे भारत में जहाँ दीपावली के दिन माँ लक्ष्मी की पूजा होती है वहीं पश्चिम बंगाल में दीपावली के 6 दिन पश्चात लक्ष्मी पूजा का आयोजन किया जाता है। दीपावली की रात माँ काली की पूजा तांत्रिक विधि-विधान से होती है और श्रद्धालु, माता को विभिन्न प्रकार का चढ़ावा अर्पित करते हैं जो तांत्रिक साधना में महत्वपूर्ण माना जाता है।

पश्चिम बंगाल में काली पूजा का आयोजन करने के लिए पंडाल स्थापित किए जाते हैं और मेलों का आयोजन किया जाता है। दीपावली की रात कालीघाट और दक्षिणेश्वर काली मंदिर में लाखों की संख्या में भक्तों का आगमन होता है जो माँ काली का आशीर्वाद प्राप्त करने राज्य के विभिन्न हिस्सों से आते हैं। इसके अलावा राज्य में दीवाली के एक दिन पहले भूत चतुर्दशी अनुष्ठान का आयोजन किया जाता है। इन अनुष्ठान के माध्यम से हिन्दू श्रद्धालु 14 दीये जलाकर बुरी और नकारात्मक शक्तियों को दूर भगाते हैं।

ओडिशा :

ओडिशा में दीपावली का त्यौहार ‘कौरिया काठी’ के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन ओडिशा के निवासी अपने पूर्वजों की पूजा करते हैं और इसके लिए जूट की लकड़ियाँ जलाई जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि दीवाली के दिन पूर्वज स्वर्ग से पृथ्वी पर आते हैं और अपने वंशजों को खूब आशीर्वाद देते हैं। इसके अतिरिक्त ओडिशा में दीपावली के अवसर पर माँ लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। साथ ही राज्य के कई स्थानों में माँ काली की पूजा का आयोजन भी किया जाता है।

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कर्नाटक :

कर्नाटक में कई दिनों तक चलने वाले दीवाली के पर्व का पहला और तीसरा दिन महत्वपूर्ण माना जाता है। कर्नाटक में दीपावली के ठीक एक दिन पूर्व नरकासुर नामक असुर के संहार की स्मृति में ‘अश्विजा कृष्ण चतुर्दशी’ मनाई जाती है। नरकासुर का वध भगवान श्रीकृष्ण ने किया था और उस असुर के रक्त के धब्बों से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने तेल से स्नान भी किया था। कर्नाटक में भी हिन्दू इस रिवाज का पालन करते हैं और स्नान के लिए मुख्यतः नारियल के तेल का उपयोग करते हैं।

दीवाली का तीसरा दिन ‘बाली पद्यमी’ के नाम से जाना जाता है। महिलाएँ इस दिन अपने घरों को रंगोली से सजाती हैं एवं गाय के गोबर का उपयोग करके घरों की दीवारों और आँगन को सजाती हैं। कर्नाटक में दीवाली का त्यौहार तुलसी विवाह तक चलता है, पूरे भारतवर्ष के समान ही।

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वाराणसी :

विश्व की प्राचीनतम नगरी और महादेव की भूमि वाराणसी में देव दीपावली का उत्सव मनाया जाता है। यह त्यौहार दीवाली के 15 दिनों के बाद अर्थात कार्तिक मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन देवी और देवता, वाराणसी आते हैं और माँ गंगा के पावन जल में स्नान करते हैं। यही कारण है कि हिन्दू श्रद्धालु, देव दीपावली के दिन माँ गंगा को मिट्टी के दीपक और पुष्प समर्पित करते हैं। साथ ही उन अनुपम घाटों को भी रंगोली और विभिन्न कलाकृतियों से सजाया जाता है, जिनके लिए वाराणसी पूरे विश्व भर में प्रसिद्ध है। मोक्ष की नगरी कही जाने वाली वाराणसी से प्रेम हो जाने के अनेकों कारण हैं, देव दीपावली उनमें से एक है।

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गुजरात :

व्यवसाय केंद्रित गुजरात राज्य के लिए दीपावली का महत्व दो प्रकार से है। गुजरात में दीपावली, दीपोत्सव और गुजराती वर्ष के अंतिम दिवस के रूप में मनाया जाता है। दीपावली का अगला दिन गुजराती संस्कृति में नव वर्ष का प्रारंभ है जिसे बेस्तु वरस कहा जाता है। गुजरात में दीवाली का पर्व वाग बरस से प्रारंभ हो जाता है। इसके पश्चात धनतेरस, काली चौदस, दीवाली, बेस्तु वरस और भाई बिज उत्सव मनाए जाते हैं। गुजरात में दीपावली के कई दिनों पहले से ही बाजार में उत्साह और तेजी देखने को मिलती है। राज्य में दीवाली के समय कोई भी नया कार्य करना शुभ माना जाता है और राज्य के निवासी नए व्यवसाय, संपत्ति अथवा वाहन इत्यादि की खरीदी एवं विवाह आदि संस्कारों के लिए उपयुक्त समय मानते हैं।

गोवा :

कर्नाटक की भाँति गोवा में भी दीपावली, भगवान कृष्ण और नरकासुर से संबंधित है। गोवा में दीपावली के एक दिन पूर्व अर्थात नरक चतुर्दशी के दिन नरकासुर के विशालकाय पुतले बनाए जाते हैं और उनका दहन किया जाता है। दीवाली के दिन श्रद्धालु मुख्यतः नारियल के तेल से स्नान करके अपने पापों से मुक्ति प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। हालांकि तेल से स्नान करने की प्रथा भारत के लगभग पूरे दक्षिणी भाग में देखने को मिलती है।

इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र, तमिलनाडु, असम एवं आंध्र प्रदेश में भी धूमधाम से दीपावली मनाई जाती है। प्रकाश एवं ऊर्जा का यह महान उत्सव भारत में तो मनाया ही जाता है, मॉरीशस, थाईलैंड, इंडोनेशिया, अमेरिका, ब्रिटेन, नेपाल, ऑस्ट्रेलिया समेत उन सभी देशों में भी इसका महत्व है जहाँ की सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था में हिंदुओं का पर्याप्त प्रभाव है।

हिंदुओं ने विश्व को होली, दीपावली, मकर संक्रांति और नवरात्रि जैसे त्यौहार दिए हैं जिनका न केवल आध्यात्मिक महत्व है अपितु ये त्यौहार समाज को एक करने का कार्य करते हैं। यही विशेषता है सनातन की एवं हिन्दू धर्म की। जीवन के विभिन्न रंगों से भरपूर ये हिन्दू पर्व जहाँ भी मनाए जाते हैं, वहाँ मात्र सकारात्मकता एवं ऊर्जा का संचार ही करते हैं।

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