हमारा रामराज्य।

5 अगस्त को हिन्दुओं की शताब्दियों पुरानी इच्छा पूर्ण होने वाली है। इस दिन श्रीअयोध्या धाम में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर के पुनर्निर्माण का शुभारम्भ होने जा रहा है। श्रीराम हिन्दुओं के लिए आदर्श रहे हैं। हिन्दुओं के सनातन धर्म का केंद्र रहे हैं प्रभु श्रीराम। आज जब भी एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था की कल्पना करते हैं तब रामराज्य की अवधारणा हमारे सामने आती है। आज इस लेख में संक्षेप में हम रामराज्य की संकल्पना के विषय में कुछ जानकारी प्राप्त करेंगे।

पौण्डरीकाश्वमेधाभ्यां वाजपेयेन चासकृत्।

अन्यैश्च विविधैर्यज्ञैरयजत् पार्थिवात्मजः।।

महाराज श्रीराम ने पौण्डरीक, अश्वमेध, वाजपेय तथा अन्य प्रकार के यज्ञों का अनुष्ठान किया। सनातन धर्म में यज्ञों और अनुष्ठानों का विशेष महत्व है। प्रजा के कल्याण के लिए राजा रामचंद्र ने इन यज्ञों को संपन्न किया।

राज्यं दशसहस्त्राणि प्राप्य वर्षाणि राघवः।

शताश्वमेधानाजह्रे सदश्वान् भूरिदक्षिणान्।।

श्रीरघुनाथ जी ने दस सहस्त्र वर्षों तक राज्य किया। अपने शासनकाल में उन्होंने सौ अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान किया। उन यज्ञों में उत्तम अश्व छोड़े जाते थे और ऋत्विजों को अथाह दक्षिणाएँ बाँटी जाती थीं।

प्रभु श्रीराम के ऐसे ही धर्मानुकूल कार्यों के कारण उनकी प्रजा में अपार सुख और सम्पन्नता का बोलबाला था। महर्षि वाल्मीकि ने रामराज्य का वर्णन किया है जिसका अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि उस समय समाज में एक आदर्श स्थिति स्थापित थी। धन-वैभव, स्वास्थ्य, संस्कृति और धर्मपरायणता से परिपूर्ण राष्ट्र ही रामराज्य की पहचान है। तो आइए वाल्मीकि रामायण से लिए गए श्लोकों से रामराज्य की विशेषताओं का अध्ययन करते हैं।

न पर्यदेवन् विधवा न च व्यालकृतं भयम्।

न व्याधिजं भयं चासीद् रामे राज्यं प्रशासति।।

प्रभु श्रीराम के राज्य शासनकाल में कभी विधवाओं का विलाप नहीं सुनाई पड़ता था। सर्प आदि दुष्ट जंतुओं का कोई भय नहीं था एवं रोगों की आशंका भी नहीं थी।

इसका तात्पर्य है कि रामराज्य में विधवाओं की स्थिति सर्वश्रेष्ठ थी। उन्हें सभी प्रकार की सुविधाएं प्राप्त थीं। जीव-जंतुओं का भय इस कारण नहीं था क्योंकि समाज में जीवों के प्रति पर्याप्त जागरुकता थी।

निर्दस्युरभवल्लोको नानार्थं कश्चिदस्पृशत्।

न च स्म वृद्धा बालानां प्रेतकार्याणि कुर्वते।।

सम्पूर्ण जगत में कहीं भी चोरों और लुटेरों का नाम नहीं सुनाई देता था। कोई भी मनुष्य अनर्थकारी कार्यों में हाथ नहीं डालता था। बूढ़े व्यक्तियों को बालकों का अंत्येष्टि संस्कार नहीं करना पड़ता था।

उपर्युक्त श्लोक तत्कालीन समाज में धनार्जन के स्त्रोतों की सार्वभौमिक उपलब्धता के विषय में कहता है क्योंकि सामान्यतः धन और जीवन सुविधाओं की अनुपस्थिति में ही चोरी और डकैती जैसी घटनाएं होती हैं। इसके अतिरिक्त स्तरीय स्वास्थ्य सुविधाओं की सहज उपलब्धता ही थी जिसके कारण रामराज्य में अकाल मृत्यु नहीं होती थी। सभी व्यक्ति अपनी आयु पूर्ण करते थे।

सर्वं मुदितमेवासीत् सर्वो धर्मपरोभवत्।

राममेवानुपश्यन्तो नाभ्यहिंसन् परस्परम्।।

सब लोग सदा प्रसन्न रहते थे। सभी व्यक्ति धर्म के अनुसार आचरण करते थे। प्रभु श्रीराम की मर्यादा को दृष्टिगत रखते हुए सभी व्यक्ति सहिष्णु व्यवहार करते थे।

निश्चित ही प्रभु श्रीराम के शासनकाल में हैप्पीनेस के पैमाने सर्वोच्च थे। जहाँ प्रभु श्रीराम जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम राज्य करें उस राज्य में दुःख का कोई स्थान नहीं हो सकता।  स्वास्थ्य और आजीविका की उपलब्धता के कारण प्रजाजनों में धर्मपरायणता थी।

नित्यमूला नित्यफलास्तरवस्तत्र पुष्पिताः।

कामवर्षी च पर्जन्यः सुखस्पर्शश्च मारुतः।।

प्रभु श्रीराम के राज्य में वृक्षों की जड़ें सदा मजबूत रहती थीं। वे वृक्ष सदा फूलों और फलों से लदे रहते थे। मेघ प्रजा की इच्छा और आवश्यकता के अनुसार वर्षा करते थे। वायु मंद गति से चलती थी जिससे उसका स्पर्श सुखद जान पड़ता था।

इस श्लोक में निश्चित ही रामराज्य में पर्यावरण और प्रकृति के सर्वोच्च संतुलन के विषय में बताया गया है। सनातन धर्म की विशेषता ही यही है कि सनातन धर्म को मानने वाला व्यक्ति प्रकृति को प्रथम माता का पद प्रदान करता है और माता कभी अपनी संतान के लिए निष्ठुर नहीं हो सकती है। यही कारण था कि रामराज्य विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक संकटों से मुक्त था।

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा लोभविवर्जिताः।

स्वकर्मसु प्रवर्तन्ते तुष्टाः स्वैरेव कर्मभिः।।

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चारों वर्णों के व्यक्ति लोभरहित होते थे। सबको अपने वर्णाश्रमोचित कर्मों से संतोष था और सभी उन्ही के पालन में लगे रहते थे।

वास्तव में सनातन की वर्ण व्यवस्था कभी भी भेदभावपूर्ण थी ही नहीं। यह तो जिहादियों, अंग्रेजों और वामपंथियों की कृपा रही कि हिन्दुओं में अपनी ही वर्ण व्यवस्था के प्रति असंतोष उत्पन्न हो गया। कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था सदैव से ही सनातन का अभिन्न अंग रही। चारों ही वर्ण अपने कर्मों से संतुष्ट थे रामराज्य में।

आसन् प्रजा धर्मपरा राम शासति नानृताः।

सर्वे लक्षणसम्पन्नाः सर्वे धर्मपरायणाः।।

प्रभु श्रीराम के शासनकाल में सारी प्रजा धर्म में तत्पर रहती थी। झूठ नहीं बोलती थी। सब लोग उत्तम लक्षणों से संपन्न थे और सबने धर्म का आश्रय ले रखा था।

समय कोई भी हो, जब भी राजा और प्रजा धर्मपरायण हो जाते हैं, रामराज्य का प्रारम्भ हो जाता है। प्रभु श्रीराम ने जिस सनातन धर्म की सहायता से रामराज्य की स्थापना की थी उसका अस्तित्व आज भी वैसा ही है जैसा लाखों वर्ष पहले था।

यही था रामराज्य जो सभी अर्थों में सम्पूर्ण था। प्रभु श्रीराम ने ऐसे शासनकाल की स्थापना की थी जहाँ स्वास्थ्य सुविधाएं सर्वश्रेष्ठ थीं, सभी व्यक्तियों के पास आजीविका के पर्याप्त साधन थे, प्रत्येक व्यक्ति तक वैदिक शिक्षा की पहुँच थी, लोग सज्जन और धर्मपरायण थे और सबसे बड़ी बात कि सभी लोग राम-राम जपते हुए प्रभु श्रीराम के बनाए मर्यादा के प्रतिमानों के अनुसार आचरण करते थे। यही रामराज्य शासन और प्रशासन का सर्वोच्च बिंदु है किन्तु आज जब रामराज्य की बात की जाती है तो धर्मनिरपेक्षता आड़े आ जाती है।

जो भी वामपंथी, जिहादी अथवा लिबरल श्रीराम के अस्तित्व पर प्रश्न खड़े करता है अथवा हिन्दुओं की आस्था पर प्रहार करता है, उनसे मात्र यही कहिए कि राम भी हमारे हैं और उनका रामराज्य भी हमारा है। जिसे राम के प्रति कोई आस्था नहीं है, राम उसके नहीं हैं। सबके अपने अपने राम नहीं हैं। राम एक ही हैं। राम ना ही किसी के लिए प्रश्न खड़े करने का विषय हैं और ना ही किसी के इमाम-ए -हिन्द।

राम हिन्दुओं के भगवान हैं और सनातन धर्म के आदि देव हैं। वामपंथी या जिहादी कितना भी प्रयास करें, रामराज्य तो आएगा।

जय श्री राम।।

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