Economics Opinion

एक के करने से नहीं होगा। एक एक को मिलकर लड़ना होगा तभी हम चीन की रीढ़ तोड़ पाएंगे। पढ़िए हमारे सामूहिक प्रयासों के महत्व पर आधारित लेख।

आज इस आंदोलन में जो भी साथ नहीं है वह हमारे आंदोलन को निर्बल बना रहा है। किन्तु हमें इन लोगों की चिंता किए बिना अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ते रहना है।

भारत और चीन के मध्य सीमा विवाद बढ़ने के साथ ही भारत भर में चीन के विरुद्ध आर्थिक बहिष्कार का आंदोलन प्रारम्भ हो चुका है। ऐसे आंदोलन होते आए हैं किन्तु इस बार लड़ाई आर पार की प्रतीत हो रही है। चीन के द्वारा हमारे 20 सैनिकों की निर्मम हत्या के बाद से भारत के लोगों में चीन के प्रति आक्रोश चरम पर है। समाज के कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने अलग अलग माध्यमों से चीन के बहिष्कार का आह्वान किया है। सोनम वांगचुक भी इनमें से एक हैं। सोनम एक इंजीनियर और इनोवेटर हैं और साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार का कार्य करते रहते हैं। सोनम वांगचुक ने एक महीने में चीन के सॉफ्टवेयर और एक साल में चीन के हार्डवेयर से भारत को मुक्त करने की बात कही। उन्होंने लोगों को प्रेरणा दी कि वे भी चीन के साथ लगातार बढ़ते हुए संघर्ष में अपना योगदान दे सकते हैं। जहाँ सीमा पर हमारे जवान चीन को उसी की भाषा में उत्तर देने के लिए पूरी तत्परता से तैनात हैं वहीं भारत के निवासियों का कर्तव्य है कि वे भी अपनी पूरी क्षमता से चीन के विरुद्ध आर्थिक युद्ध का शंखनाद करें। किन्तु इन प्रयासों को झटका तब लगता है जब हम देखते हैं कि भारत का युवा अपने फोन से टिक टॉक जैसे एप्लीकेशन भी नहीं हटा पा रहा है। कई ऐसे लोग हैं जो चीन के बहिष्कार के इस आंदोलन को भीतर से कमजोर कर रहे हैं। ऐसे लोगों के लिए उनकी सुविधाएं और उनका मनोरंजन भारत की सम्प्रभुता, अखंडता और उन 20 जवानों के बलिदान से अधिक महत्वपूर्ण है।

चीन एक विस्तारवादी देश है जो अपने आर्थिक मॉडल के बलबूते पूरी दुनिया के कई विकासशील और अल्पविकसित देशों को अपना कर्जदार बनाता जा रहा है। चीन, भारत का भी एक बड़ा व्यापारिक सहयोगी है। भारत और चीन के व्यापार आंकड़े भारत के पक्ष में नकारात्मक ही रहे हैं। चीन के साथ व्यापार में भारत को एक बड़ा व्यापार घाटा झेलना पड़ा है किन्तु स्थिति अब बदल रही है। भारत-चीन व्यापार घाटा अब संकुचित हो रहा है। भारत में चीन से आयात की मात्रा भी घट रही है। आत्मनिर्भर भारत अभियान प्रारम्भ होने के पश्चात अब भारत की अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भरता के मार्ग पर चलने के लिए तैयार है। चीन जैसे धूर्त देश को सबक सिखाने के लिए उनके आर्थिक अहंकार को तोड़ना अति आवश्यक है और आत्मनिर्भरता प्राप्त करना चीन के विरुद्ध प्रारम्भ हुए इस युद्ध का एक महत्वपूर्ण हथियार है। सरकार और सेना अपने स्तर पर प्रयासरत हैं। उनके प्रयासों पर हमें प्रश्न नहीं उठाना चाहिए क्योंकि वैश्वीकरण के इस दौर में सरकारें सीधे सीधे किसी भी देश से अपने व्यापारिक सम्बन्ध समाप्त नहीं कर सकती हैं। यदि ऐसा करना संभव होता तो आज चीन के साथ हमारा व्यापार समाप्त हो चुका होता। किन्तु नागरिक किसी भी रूप से प्रतिबंधित नहीं होते हैं। हाल ही में सरकार ने ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए वस्तुओं की बिक्री में उनके निर्माता देश की जानकारी देना अनिवार्य किया है। सरकार का यह निर्णय हम नागरिकों के लिए स्पष्ट सन्देश है कि चीन का बहिष्कार कीजिए। सरकार प्रत्यक्ष रूप से चिल्लाकर यह नहीं कहेगी लेकिन ऐसे ही अप्रत्यक्ष उपायों से हमारा सहयोग करेगी।

यदि भारतीय अर्थव्यवस्था की बात करें तो अतीत में हमसे गलतियां हुईं जिसके कारण स्वतंत्रता के 72 वर्षों के पश्चात भी आज हमें आत्मनिर्भरता का आंदोलन चलाने के लिए विवश होना पड़ा। हमारे समाज में शिक्षा मात्र डिग्री आधारित व्यवस्था रही जिसके कारण कौशल विकास और शोध आदि कार्यों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया। सदैव से ही हमारी अर्थव्यवस्था में नवाचार की कमी बनी रही। दूसरी ओर हमारे साथ ही स्वतंत्र होना वाले चीन ने अपना दीर्घगामी लक्ष्य निर्धारित किया। हालाँकि चीन ने दमनकारी नीतियां अपनाई और मजदूरों एवं कामगारों के अधिकारों का पूर्ण हनन करते हुए निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था के निर्माण की यात्रा में चल पड़ा। चीन का एक ही लक्ष्य था, विश्व का उत्पादन केंद्र बनना। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए चीन को जो भी करना पड़ा उसने किया। चीन ने विभिन्न देशों से तकनीक चुराई, दुनिया भर की विभिन्न संस्थाओं में अपने अधिकारी बैठाए जो उसके हितों में सहायक बन सकें। इसके अतिरिक्त दुनिया भर के कई विकसित और विकासशील देशों के बाजारों में संस्थागत रूप से घुसपैठ करने के लिए चीन ने एक समर्पित आर्थिक और निवेश नीति का निर्माण किया।

इतना सब किए जाने के बाद भी भारत, चीन की इन विस्तारवादी नीतियों से अप्रभावित रहा। भले ही भारत का चीन के साथ व्यापार घाटे में रहा हो किन्तु भारत कभी चीन का आर्थिक गुलाम बनने के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ा। भारत सदैव ही स्वतंत्र रूप से चीन के साथ व्यापार संबंधों की प्रक्रिया में आगे बढ़ता रहा। आज विश्व में कई ऐसे देश हैं जिन्हे यह ज्ञात है कि वो अब चीन के भारी कर्जदार हो चुके हैं किन्तु फिर भी उन देशों में चीन का विरोध करने की क्षमता नहीं है। अमरीका और यूरोप के देश भी चीन की विस्तारवादी आर्थिक नीतियों के शिकार हुए हैं किन्तु ये विकसित देश भी चीन से अपने सम्बन्ध समाप्त कर पाने में असमर्थ हैं। ऐसी परिस्थितियों में आज पूरा विश्व भारत की ओर दृष्टि जमाए बैठा है क्योंकि चीन के अहंकार को तोड़ने का साहस यदि किसी में है तो वो है भारत।

भारत न केवल एक बड़ा बाजार है अपितु भविष्य का एक विशाल उत्पादक राष्ट्र भी है। आज हम चीन के साथ जो युद्ध कर रहे हैं वह तात्क्षणिक नहीं अपितु दीर्घकालिक परिणाम देने वाला है। हमें यह स्मरण रहना चाहिए कि जिस आर्थिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए चीन ने 50 वर्षों का समय लिया उस लक्ष्य की प्राप्ति से हम मात्र 10 वर्ष दूर हैं। आज हमारा एक सूक्ष्म योगदान निकट भविष्य में भारत के आर्थिक उन्नयन का मार्ग प्रशस्त करेगा। सरकार अपने कार्य में तत्परता से लगी हुई है। कोरोना वायरस संकट और चीन के अड़ियल व्यवहार के कारण आज जो कम्पनियाँ चीन को छोड़कर दूसरे स्थानों की खोज में हैं उनमें भारत प्रमुख रूप से सम्मिलित है। इन कंपनियों को भारत में बेहतर वातावरण प्रदान करने के लिए सरकार ने कई आर्थिक सुधार के कदम उठाए हैं किन्तु आवश्यकता है अपने स्थानीय उद्योगों और उत्पादकों को आगे बढ़ाने की। भारत के प्रधानमंत्री ने वोकल फॉर लोकल का मन्त्र दिया जिससे लोकल को ग्लोबल बनाया जा सके। इस मन्त्र को साकार करने के लिए आवश्यक है कि हम अर्थात भारत के नागरिक अपने स्थानीय उत्पादों को महत्व दें।

चीन के बहिष्कार की जब भी बात आती है तो आड़े आ जाता है उत्पादों का मूल्य। लोगों का कहना है कि चीन के उत्पादों का मूल्य कम होता है। यह वास्तविकता है कि चीन के उत्पादों का मूल्य कम होता है किन्तु सत्य यह भी है कि चीन के उत्पादों की गुणवत्ता भी सबसे खराब होती है। ये कहावत ही बनी है कि “अरे चीन का माल है ज्यादा नहीं चलेगा”।

उदाहरण के लिए मान लीजिए कि चीन के एक खिलौने की कीमत 70 रूपए है जबकि उसी स्थानीय उत्पाद की कीमत 100 रूपए है तो उस 70 रूपए के चीनी खिलौने का जीवनकाल स्थानीय खिलौने की तुलना में आधा होगा। इसका अर्थ है कि जो स्थानीय खिलौना एक महीने चलेगा, चीनी खिलौना 15 दिनों में ही टूट जाएगा। इस हिसाब से चीनी खिलौना महंगा पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त भारतीय उत्पादों पर चीनी या अन्य विदेशी वस्तुओं को प्राथमिकता देने के कारण हम अपनी मुद्रा का भी नुकसान कर रहे हैं।

आज हमारे सामने अवसर है चीन जैसे धूर्त देश को सबक सिखाने का। यह स्मरण रहे कि आज भारत ही वह इकलौता राष्ट्र है जो चीन के सामने सीना ठोक के खड़ा हुआ है। चीन के साथ प्रारम्भ हुए इस संघर्ष में हमें अपना योगदान देना है। चीन का पूर्ण बहिष्कार करके और अपने स्थानीय उत्पादों की सहायता करके। स्थानीय उत्पादों की सहायता करने से एक लाभ निश्चित है कि उद्योगों में प्रतिस्पर्धा बढ़ने से मूल्यों में कमी आएगी और राष्ट्र की मुद्रा सुदृढ़ होगी। सीधी भाषा में कहें तो घर का पैसा घर में ही रहेगा। चीन का बहिष्कार करने का अर्थ है अब से उसके उत्पादों को किसी भी हाल में न खरीदना किन्तु जो उत्पाद खरीदे जा चुके हैं उन्हें नष्ट करने से हमारा ही नुकसान होगा, चीन का नहीं।

जहाँ तक रही चीन के एप्लीकेशन का उपयोग न करने की बात तो वह हमारे लिए कुछ मिनटों का काम है। टिकटॉक जैसे कितने ही ऐसे चीनी एप्लीकेशन हैं जिनके माध्यम से चीन हमारे डाटा के साथ खिलवाड़ करता है। इनका उपयोग करके चीन साइबर युद्ध में हम पर हावी हो सकता है। इनके न रहने से हमारे जीवन में कोई अंतर नहीं आएगा। हमारा जीवन उसी तरह से अनवरत चलता रहेगा। किन्तु यदि कोई कहता है कि हमारे एक के टिकटॉक अनइंस्टॉल करने से कोई विशेष अंतर नहीं आएगा तो समझ लीजिए कि वह व्यक्ति झूठा है और छद्म राष्ट्रभक्ति का खोल ओढ़े हुए है। ऐसा व्यक्ति यदि राष्ट्रभक्ति की बात करता है तो यह उसे शोभा नहीं देता। जो व्यक्ति भारत के सबसे बड़े शत्रु के एक छोटे से एप्लीकेशन के प्रति अपनी आसक्ति नहीं समाप्त कर पा रहा है उस व्यक्ति से किसी और बलिदान की क्या अपेक्षा की जा सकती है।

ऐसा भी नहीं है कि यह राष्ट्र कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तियों से हीन हो चुका है। आज चीन के बहिष्कार का आंदोलन जन जन तक पहुँच रहा है। विभिन्न वर्गों के लोग अपनी क्षमताओं के अनुसार चीन के विरुद्ध इस निर्णायक युद्ध में अपना योगदान दे रहे हैं। किन्तु यदि प्रयास संगठित हो तो सफलता शीघ्र प्राप्त की जा सकती है। आज इस आंदोलन में जो भी साथ नहीं है वह हमारे आंदोलन को निर्बल बना रहा है। किन्तु हमें इन लोगों की चिंता किए बिना अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ते रहना है। ऐसे लोगों की कोई सहायता मत लीजिए। इनसे किनारा करने का प्रयत्न कीजिए। जो व्यक्ति आज भारत के हित की बात नहीं कर सकता वह ईंमानदार कभी नहीं हो सकता है।

स्मरण रहे कि एक के करने से कुछ नहीं होगा किन्तु एक एक को मिलकर लड़ना होगा तभी हम चीन की रीढ़ तोड़ पाएंगे।

वन्दे मातरम।।                                

Leave a Reply

%d bloggers like this: