Economics Opinion

अभी भी समय है। यदि नहीं संभले तो एक दिन विश्व में बीमार देशों की सूची में हमारा भी नाम होगा। स्वास्थ्य समस्याओं पर आधारित पढ़िए यह लेख।

दुर्बलता अभिशाप के समान है और रोगी शरीर लेकर हम अपने राष्ट्र से द्रोह ही कर रहे हैं। यदि हमें अपने धर्म और राष्ट्र के सशक्तिकरण में अपना पूर्ण योगदान देना है तो हमें स्वयं को स्वस्थ रखना होगा।

आज भारत ही नहीं अपितु पूरा विश्व कोरोना वायरस के संकट से जूझ रहा है। चीन से निकलने वाला यह वायरस आज दुनिया के सभी देशों में पहुँच चुका है। कोई भी देश इससे अप्रभावित नहीं रहा है, चाहे वह विकासशील देश हो या विकसित। इस वायरस के कारण आज पूरी दुनिया की स्वास्थ्य सुविधाओं की निर्बलता सामने आई है। कोविड-19 की इस बीमारी ने यह सन्देश दिया है कि अब हमें अपनी स्वास्थ्य सुविधाओं पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।

विश्व के अन्य देश अपनी नीतियों के हिसाब से निश्चित रूप से अपनी स्वास्थ्य समस्याओं एवं सुविधाओं की पुनर्समीक्षा करेंगे किन्तु भारत के लिए स्वास्थ्य क्षेत्र में बहुत कार्य किया जाना शेष है। निश्चित रूप से कोरोना वायरस के इस संकट में भारत विश्व के कई देशों से बेहतर स्थिति में है। इसके पीछे मुख्य कारण है राजनैतिक तत्परता और भारतीयों की बेहतर प्रतिरक्षा प्रणाली। किन्तु कोविड-19 के अतिरिक्त भारत को अपने सम्पूर्ण स्वास्थ्य क्षेत्र का परीक्षण करना होगा। इस लेख का उद्देश्य है लोगों को स्वास्थ्य समस्याओं से अवगत कराना एवं उनके समाधान के विषय में विचार करने की प्रेरणा देना।

सबसे पहले तो कुछ आंकड़ों की बात करते हैं क्योंकि बिना आंकड़ों के लोगों को कोई भी बात गंभीर प्रतीत नहीं होती है।

भारत में प्रत्येक 8 मिनट में सर्विकल कैंसर से एक महिला की मृत्यु होती है।

भारत में स्तन कैंसर से पीड़ित दो महिलाओं में से एक महिला की मृत्यु हो जाती है। प्रत्येक वर्ष नए कैंसर मरीजों संख्या साढ़े ग्यारह लाख से ऊपर है।

2018 में कैंसर के कारण भारत में 7,84,821 लोगों की मृत्यु हुई जिसमें से 4,13,519 पुरुष थे एवं शेष महिलाऐं।

75 वर्ष के काम आयु के लोगों कैंसर होने की सम्भावना पुरुषों में 9.81% है जबकि महिलाओं के लिए 9.42% है।

इसी आयु वर्ग में कैंसर से मरने वाले पीड़ितों का अनुपात पुरुषों के लिए 7.34% एवं महिलाओं के लिए 6.28% है।

2015-2019 के दौरान किए गए सर्वेक्षण में 21 जिलों के 50 वर्ष तक की आयु के 63,000 मधुमेह संभावित लोगों की पहचान की गई जिसमें से 56,771 लोग मधुमेह से पीड़ित पाए गए।

पुरुषों में मधुमेह की संभाव्यता 12% जबकि महिलाओं के लिए यह संख्या 11.7% है।

नगरीय क्षेत्रों में मधुमेह की संभाव्यता 10.9% से 14.2% है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह संख्या 3.0% से 7.8% है।

मधुमेह के कारण भारत में होने वाली मृत्युओं की संख्या लगभग ढ़ाई लाख है।

इन बीमारियों के अतिरिक्त रक्तचाप, हृदय रोग और कुपोषण भारत के लिए अत्यधिक चिंताजनक हैं। आज यदि हम स्वयं की बात करें तो हमारे आसपास कई ऐसी महिलाएं और पुरुष होंगे जो ऐसी गंभीर बीमारियों से ग्रसित होंगे। ये हमारे सगे-सम्बन्धी, रिश्तेदार, मित्र अथवा पड़ोसी हो सकते हैं। यदि इनकी संख्या की बात करें तो आंकड़े भयावह हो सकते हैं। आश्चर्य की बात है कि जब हम इन लोगों की दिनचर्या पर ध्यान देते हैं तो हमें ऐसी कोई संभावना प्रतीत नहीं होती है और एक दिन हमें ज्ञात होता है कि अमुक व्यक्ति कैंसर, मधुमेह अथवा ऐसी ही अन्य किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित हो चुका है। प्रश्न उठता है कि ऐसे कौन से कारक हैं जो भारत में ऐसी गंभीर बीमारियों के प्रसार के लिए जिम्मेदार हैं? कैंसर, मधुमेह अथवा रक्तचाप की बीमारियां इतनी आम क्यों होती जा रही हैं?

आइए देखते हैं।

सबसे पहले तो हमें इन बीमारियों के पीछे के कारणों का अध्ययन करना होगा।

पहला बड़ा कारण है लापरवाही एवं अनियमित दिनचर्या।

कैंसर एवं मधुमेह जैसी बीमारियों के लक्षण प्रारम्भिक अवस्था में ही पहचाने जा सकते हैं किन्तु इन लक्षणों पर ध्यान नहीं दिया जाता। समस्याओं पर बात करने और उनके कारणों को जानने के स्थान पर उनकी उपेक्षा करने की प्रवृत्ति हमारे भीतर मजबूती से घर कर गई है। महिलाओं में यह समस्या बड़ी है क्योंकि महिलाएं अपनी समस्या की चर्चा करने के स्थान पर उसे दबा कर रखने अधिक विश्वास करती हैं। पीड़ा जब असहनीय हो जाए तब उसके बाद महिलाएं उसे व्यक्त करती हैं किन्तु तब तक वह समस्या अपने अगले चरण में पहुँच चुकी होती है। ऐसा नहीं है कि महिलाओं की इस प्रवृत्ति में शिक्षा का कोई योगदान है क्योंकि गाँवों के साथ नगरीय महिलाओं में भी ऐसी प्रवृत्ति देखने को मिलती है।

इसके अतिरिक्त वर्तमान भारत की कार्यशैली अनियमित है। नगरों में रहने वाली जनसंख्या स्वास्थ्य को द्वितीयक स्तर पर रखती है जबकि प्राथमिक स्तर पर व्यापार, नौकरी अथवा धनार्जन होता है। लोगों की इसी प्रवृत्ति तथा आधुनिकता की अंधी दौड़ के कारण आज भारत मधुमेह, रक्तचाप और मानसिक अवसाद जैसी बीमारियों से लगातार पीड़ित है। आगे चलकर यही समस्याएं हृदय रोग का आधार बनती हैं।

स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का दूसरा कारण है खाद्य श्रृंखला में हानिकारक तत्वों का सम्मिलन एवं इसे रोकने में प्रशासन की विफलता। आज फल और सब्जियों में कीटनाशकों एवं उर्वरकों का अंधाधुंध उपयोग हो रहा है। इसके अतिरिक्त अधिक चिंता का विषय है अधिक लाभ कमाने के लिए सब्जियों एवं फलों में खतरनाक रसायनों का उपयोग जो अस्वीकार्य चाहिए। हम सब्जियां और फल खरीदने जाते हैं किन्तु हमें यह ज्ञात नहीं होता कि कौन से फल अथवा सब्जियां कृत्रिम रूप से पकाए गए हैं और कौन से उत्पाद प्राकृतिक हैं। हम इसी अज्ञानता में न जाने प्रतिदिन कितने रसायनों का सेवन करते हैं। यही रसायन आगे चलकर हमारे शरीर में विषाक्त तत्व तैयार करते हैं। इसका तात्पर्य तो यही हुआ कि सब्जी न खाने वाला व्यक्ति सब्जी खाने वाले व्यक्ति की तुलना में अधिक स्वस्थ है। यही स्थिति दुग्ध उत्पादों के साथ भी है। आज अधिकतर दुग्ध उत्पादों में मिलावट की जा रही है। मात्रा बढ़ाने एवं उत्पादों को अधिक समय तक बनाए रखने के लिए उनमे अलग प्रकार के पदार्थों की मिलावट की जाती है। ये पदार्थ हमारे शरीर के लिए हानिकारक हैं।

अब विषय आता है इस मिलावटखोरी को रोकने का। भारत में इसके लिए कानूनों  उपलब्धता भी है किन्तु ये कानून उस सीमा तक प्रभावी नहीं हैं क्योंकि प्रशासन की पहुँच इन मिलावटखोरों तक सीमित है। प्रशासन की इसी विफलता के कारण खाद्य पदार्थों में हानिकारक तत्वों का सम्मिलन अनवरत जारी रहता है और उपभोक्ता खाद्य पदार्थों के रूप में धीरे धीरे विषैले तत्वों का सेवन करते रहते हैं।

भारत की स्वास्थ्य समस्याओं के बिगड़ने का तीसरा कारण स्वास्थ्य सम्बन्धी नीतियों की प्रवृत्ति से जुड़ा है। वास्तव में भारत में जो स्वास्थ्य नीतियां बनाई जाती हैं एवं उनके आधार पर जो भी कार्यक्रम चलाए जाते हैं उन में से अधिकांश की प्रवृत्ति रोग हो जाने के पश्चात रोगी की स्थिति एवं उसके ईलाज से सम्बंधित है। हालाँकि ऐसे कार्यक्रम बीमारियों की पूर्व अवस्था एवं संभावित रोगियों की पहचान पर अधिक केंद्रित होने चाहिए। नीति ऐसी बनाई जाए जो लोगों को रोग के प्राथमिक स्तर तक भी न पहुँचने दे। संभावित रोगियों की पूर्व पहचान स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के निदान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। कोरोना वायरस के इस संकट ने हमें यह मार्ग सुझाया है। जिस प्रकार हम वर्तमान में कोरोना वायरस के संभावित मरीजों की ट्रैकिंग कर रहे हैं ठीक उसी प्रकार हमें प्रत्येक रोग के रोगियों की पीड़ित होने से पूर्व ही ट्रैकिंग करनी चाहिए। स्वास्थ्य कार्यक्रम और बजट की कोई कमी नहीं है किन्तु भारत में स्वास्थ्य सम्बन्धी नीतियों में नवाचार की सर्वाधिक आवश्यकता है।

समस्याएं तो हैं किन्तु निदान क्या है?

इस प्रश्न का उत्तर कठिन नहीं है और हमें यह ज्ञात भी है किन्तु स्वास्थ्य को द्वितीयक स्तर पर रखने की प्रवृत्ति के कारण हम निदान को व्यवहारिक रूप से अपने जीवन में उतार पाने में अक्षम दिखते हैं। आज सरकार भी जैविक और प्राकृतिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों को प्राथमिकता दे रही है। लोगों के मध्य जैविक उत्पादों से सम्बंधित जागरूकता आ रही है किन्तु फिर भी हम इन प्रयासों के प्रति गंभीर नहीं हैं। समाज में कितने ऐसे प्रतिष्ठित लोग हैं जो अपने आसपास के किसी बेरोजगार युवा को जैविक कृषि अथवा जैविक उत्पादों के निर्माण के लिए प्रेरित करते हैं। गौवंश सड़कों पर दुर्घटनाओं की भेंट चढ़ जाता है किन्तु उनका सही उपयोग करने के लिए हमारे कृषकों और उद्यमियों में जागरुकता का भीषण अभाव है। हम अपने आसपास बागवानी करने वाले व्यक्ति को यदि जैविक उत्पादों का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहन देंगे तो वह निश्चित ही कृत्रिम तथा रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों का त्याग करेगा।

स्वास्थ्य सम्बन्धी मुद्दों को लेकर आमजनों में एक सशक्त जागरुकता की आवश्यकता है। महिलाओं को विशेष रूप से शिक्षित किया जाना चाहिए। महिलाओं की जागरुकता उनकी स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं को समाप्त करने में प्रभावी हो सकती है। पुरुषों की तुलना में महिलाएं अनुशासित होती हैं जिसका लाभ उन्हें मिलना चाहिए। अपनी समस्याओं की उपेक्षा न करते हुए उनके विषय में वृहद चर्चा करके एवं उनके निदान के प्रारंभिक उपायों को अपनाते हुए महिलाएं अपनी स्वास्थ्य स्थिति को अधिक बेहतर बना सकती हैं। कहा जाता है कि जब एक महिला स्वस्थ और शिक्षित होती है तब उसके साथ उसका परिवार भी स्वस्थ और शिक्षित होता है। स्वस्थ महिला ही एक स्वस्थ पीढ़ी का आधार है।

यह एक भ्रांति है कि रक्तचाप, मधुमेह और हृदय रोग जैसी बीमारियां असाध्य हैं। वास्तविकता यह है कि इनकी तरह कई ऐसी बीमारियां हैं जो मात्र खान-पान के संयम और दिनचर्या के अनुशासन से समाप्त की जा सकती हैं। स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं के निदान हेतु अनुशासन अत्यंत आवश्यक है। अनुशासनहीन दिनचर्या अस्वस्थता की ओर ले जाती है। हम स्वामी विवेकानंद, नरेंद्र मोदी, योगी आदित्यनाथ और ऐसे ही कई जन प्रतिनिधियों की ऊर्जा की प्रशंसा करते हैं एवं उनके जैसा ही बनना चाहते हैं किन्तु हम उनकी योग एवं अनुशासन आधारित दिनचर्या का पालन नहीं करना चाहते हैं। अब तो पूरी दुनिया योग को अपनी दिनचर्या में प्रमुख रूप से सम्मिलित कर रही है किन्तु योग को फैशन न बनाते हुए उसका पालन करने की आवश्यकता है। योग के अतिरिक्त शाकाहार एवं सात्विक भोजन हमारे स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।

आयुर्वेद :

वर्तमान समय में जिस चिकित्सा पद्धति की सर्वाधिक उपेक्षा हुई है वह है आयुर्वेद। आपको संभवतः यह जानकार आश्चर्य हो लेकिन भारत में आयुर्वेद धर्मनिरपेक्षता की भेंट चढ़ गया। पूर्ववत सरकारों ने आयुर्वेद को मात्र इसलिए प्रवर्तित नहीं किया क्योंकि आयुर्वेद हिन्दुओं के धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है। जबकि आयुर्वेद आज की चिकित्सा आवश्यकताओं के लिए अमूल्य पूँजी है। आयुर्वेद में मानव शरीर के पूर्ण शुद्धिकरण की शक्ति है। आयुर्वेद एक ऐसी चिकित्सा पद्धति है जिससे सभी रोगों का ईलाज सहजता एवं सरलता से किया जा सकता है। लक्षण आधारित बीमारियों को आयुर्वेद की सहायता से प्रारंभिक चरण में ही नष्ट किया जा सकता है क्योंकि आयुर्वेद में ऐसी औषधियों का वर्णन किया गया है जो हमारे आसपास बड़ी ही सरलता से उपलब्ध हो जाती हैं। जिन्हे हम निरर्थक और विषैला भी समझते हैं ऐसे पादप भी आयुर्वेद में किसी न किसी रूप से औषधि की भांति उपयोग में लाए जा सकते हैं। अब कोरोना वायरस का उदाहरण ले सकते हैं जहाँ रोगी के स्वस्थ होने की संभावना उसकी  प्रतिरोधक क्षमता पर निर्भर करती है। व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता के निर्माण में कोई अन्य चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद से बेहतर नहीं हो सकती है। आयुर्वेद के लिए पर्याप्त शोध कार्यों और बजट की अनुपलब्धता के कारण आयुर्वेद हाशिए पर चला गया और एलोपैथी का प्रभाव बढ़ता चला गया। एलोपैथी के बढ़ते प्रभाव के कारण आज चिकित्सा महँगी और अनिश्चित है। वर्तमान सरकार आयुर्वेद के उत्थान के लिए प्रयासरत है किन्तु प्रयासों में और भी गंभीरता तथा संस्थागत सुधार लाने की आवश्यकता है। साथ ही आयुर्वेद को लेकर लोगों के भीतर जागरुकता बढ़नी चाहिए।

भारत आज ऐसी स्थिति में है जहाँ हमें एक बड़ा एवं दीर्घकालिक वैचारिक युद्ध लड़ना है। संभव है कि हमें शारीरिक योगदान भी देना पड़े। सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनने एवं विश्व में अपना खोया हुआ स्थान अर्जित करने के लिए हमें अनंत प्रयत्न करने होंगे। किन्तु बीमार शरीर से कोई भी प्रयत्न सार्थक नहीं होता है। दुर्बलता अभिशाप के समान है और रोगी शरीर लेकर हम अपने राष्ट्र से द्रोह ही कर रहे हैं। यदि हमें अपने धर्म और राष्ट्र के सशक्तिकरण में अपना पूर्ण योगदान देना है तो हमें स्वयं को स्वस्थ रखना होगा।

स्वस्थ रहें सबल बनें।।

जय श्री राम।।   

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