कैसे बनेंगे हम आत्मनिर्भर?

एक ओर कोरोना वायरस का संकट तो दूसरी ओर चीन और पाकिस्तान जैसे दुष्ट पड़ोसी। भारत एक साथ कई मोर्चों पर लड़ रहा है। इन सब के मध्य हम भारतवासियों ने आत्मनिर्भर होने का भी प्रण लिया है। आज के परिवेश में आत्म निर्भरता सर्वोत्तम नीति है अपनी अखंडता और सम्प्रभुता की रक्षा के लिए। हम देख रहे हैं कि कई छोटे देश चीन की विस्तारवादी नीति के जाल में फंस चुके हैं। हमारा व्यापार भी चीन के साथ सर्वाधिक है किन्तु अब समय आ गया है चीन के व्यापारिक दुष्चक्र से बाहर निकलने का। वैश्वीकरण के इस समय में कोई भी देश वैश्विक समुदाय से अलग नहीं रह सकता किन्तु भारत में यह क्षमता है कि वह अपनी अधिकतम आवश्यकताएं भी पूरी कर सकता है और निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था का निर्माण कर सकता है। हाल ही में भारत सरकार द्वारा आत्मनिर्भर भारत पैकेज के रूप में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने हेतु शंखनाद किया गया है। सरकार अपने स्तर पर कार्य कर रही है किन्तु आज इस लेख में हम उन प्रयासों पर चर्चा करेंगे जो हमारे द्वारा किए जाने चाहिए। आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में हमारा योगदान सबसे महत्वपूर्ण है और हमें अपने कर्तव्य का भान होना चाहिए।

शिक्षा का नवीनीकरण : संस्थागत एवं व्यवहारिक बदलाव।

वर्तमान शिक्षा में पूर्णतः परिवर्तन आवश्यक है। पहली आवश्यकता है कि शिक्षा में संस्थागत परिवर्तन किया जाए। कौशल आधारित शिक्षा पद्धति के विकास पर जोर दिया जाना चाहिए। कौशल विकास को विद्यालयों में अनिवार्य कर देना चाहिए। विद्यालयों में उच्चतम स्तर अर्थात ग्यारहवीं और बारहवीं में कौशल विकास कार्यक्रमों को अनिवार्य कर देना चाहिए। सरकारी विद्यालयों के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण है। इसके पश्चात महाविद्यालय और विश्वविद्यालय स्तर पर पाठ्यक्रम अधिक व्यवहारिक बनाया जाए। गली गली में खुलने वाले इंजीनियरिंग महाविद्यालयों पर नकेल कसी जाए। इनके स्थानों पर पॉलिटेक्निक और औद्योगिक प्रशिक्षण केंद्र खोले जाएं। तकनीकी शिक्षा जितनी व्यवहारिक बनाई जाएगी उसका लाभ उतना ही अधिक प्राप्त होगा। हमें स्नातक बेरोजगार नहीं तैयार करने हैं अपितु रोजगार के लिए योग्य एक भीड़ तैयार करनी है जो किसी भी प्रकार के कार्य के लिए परिपक्व हो। आवश्यकता तो यह है कि छात्रों में कौशल विकास के बीज माध्यमिक स्तर पर ही पड़ जाने चाहिए। विद्यालय से लेकर महाविद्यालय और विश्वविद्यालय स्तर तक एक ऐसी व्यवस्था विकसित की जाए जिससे प्रत्येक छात्र किसी न किसी कौशल में दक्ष हो। यह कौशल मानविकी, सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर, औद्योगिक अथवा कृषिगत प्रक्रियायों से सम्बंधित हो सकता है। शिक्षा के क्षेत्र में नवीनता का अभाव है और जहां नवीनता का विकास हो भी रहा है तो वह उच्च निवेश आधारित है जिसका उपयोग निचले तबके के  छात्र नहीं कर पा रहे हैं।

शिक्षा के नवीनीकरण का दूसरा पहलू है व्यवहारिक तथा मानसिक परिवर्तन। आज शिक्षा भेड़चाल की भेंट चढ़ चुकी है। लोगों में जागरुकता का अभाव है। न तो छात्र और न ही अभिभावक यह समझ पा रहे हैं कि वास्तव में शिक्षा की सहायता से किस प्रकार भविष्य का निर्माण किया जाए। आज भी डिग्री को प्रतिभा से अधिक महत्व दिया जा रहा है। महाविद्यालय स्तर पर हालात और भी खराब हैं। छात्र जबरन डिग्री लेने के लिए भेजे जा रहे हैं। छात्रों की रुचि जाने बिना एवं उनकी प्रतिभा को परखे बिना उन्हें शिक्षा की भेड़चाल धकेल दिया जा रहा है। समाज के इस व्यवहार के कारण समय, संसाधन एवं योग्यता का निरंतर ह्वास हो रहा है। समाज में एक शैक्षिक भेदभाव हावी है। निजी विद्यालयों को सरकारी विद्यालयों से उच्च मानने की प्रवृत्ति, इंजीनियरिंग की डिग्री को सर्वोच्च मानने की प्रवृत्ति और स्नातक शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात सरकारी नौकरी प्राप्त करने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। अभिभावकों की महत्वाकांक्षा वर्तमान आवश्यकताओं पर हावी हो रही है। छात्र उच्चतम अंक प्राप्त करने, बड़ी प्रवेश परीक्षाओं को उत्तीर्ण करने और कठिन भर्ती परीक्षाओं को पास करने के दबाव में हैं। शिक्षा में व्याप्त इस प्रकार का व्यवहारिक असंतुलन भारत की युवा जनसंख्या की योग्यता को क्षीण कर रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में उपरोक्त वर्णित समस्याओं के समाधान के लिए आवश्यक है कि समाज के मानसिक व्यवहार में परिवर्तन लाया जाए। एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था का निर्माण हो सके जहां छात्रों को स्वयं अपने भविष्य और उपलब्ध अवसरों का ज्ञान हो। अभिभावक छात्रों पर अपने अधूरे स्वप्नों का बोझ न डालें। डिग्री प्राप्त करने के स्थान पर कौशल विकास को अधिक महत्व दिया जाए और सर्वोत्तम शिक्षा के अवसर आर्थिक परिस्थितियों से प्रभावित हुए बिना सभी को प्राप्त हो सकें।

स्वास्थ्य क्षेत्र का पुनर्निर्माण : जागरुकता एवं बेहतर उपलब्धता।

बाल्यकाल से हमें यह बताया जाता रहा है कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ दिमाग का वास होता है। यह सत्य भी है क्योंकि जब हम स्वस्थ रहेंगे तभी तो शुद्ध विचारों से किसी भी प्रकार की गतिविधियों को संपन्न कर पाएंगे। स्वास्थ्य एक ऐसा मुद्दा है जहां अभी भी कार्य करना शेष है। स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता में भारी अंतर उपस्थित है। इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य क्षेत्र में जागरुकता की कमी है जिसके कारण भारत की बहुतायत जनसंख्या किसी न किसी रोग से ग्रसित है।

सबसे पहले बात करते हैं स्वास्थ्य जागरुकता की। भारत के आम जनों के बीच स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर गंभीरता का अभाव है। कई ऐसी बीमारियां हैं जिनके प्राथमिक लक्षण दृश्य होते हैं जिन पर यदि ध्यान दिया जाए तो इन बीमारियों को उनकी प्राथमिक अवस्था में ही रोका जा सकता है। रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, पेट की समस्याएं और यहां तक की कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां भी अपनी प्राथमिक अवस्था में रोकी जा सकती हैं। महिलाओं में जागरुकता की कमी के परिणाम चिंताजनक रहे हैं। वर्तमान समय में महिलाओं में कैंसर जैसी भयानक बीमारियां आम होती जा रही हैं। यह सब सामान्य होता जा रहा है क्योंकि आज दैनिक दिनचर्या में खानपान और पोषण को लेकर भी जागरुकता की कमी है। इसी कमी के चलते नवजात शिशुओं और किशोर एवं किशोरियों में एनीमिया के लक्षण बहुतायत में पाए जा रहे हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि भारत जैसे विशाल राष्ट्र में भी स्वच्छता को लेकर जागरुकता वर्ष 2014 में भाजपा सरकार बनने के बाद आई। जिस प्रकार भारत के प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा स्वच्छता को एक जन आंदोलन बना दिया गया उसी प्रकार आज स्वास्थ्य जागरुकता को जन आंदोलन में बदलने की आवश्यकता है। विशेषकर परंपरागत स्वास्थ्य सुविधाओं के उपयोग को लेकर आम जन में विश्वास का भाव उत्पन्न होना चाहिए।

स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाओं की उपलब्धता अभी भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। निजी स्वास्थ्य सुविधाएं दक्ष तो हैं किन्तु उनका मूल्य अत्यधिक है जो साधारण व्यक्ति की पहुँच से बाहर है। सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं निजी क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा कर पाने में अक्षम दिखाई देती हैं। राष्ट्रीय स्तर के सार्वजनिक संस्थानों को यदि चर्चा से अलग रखा जाए तो जिला एवं तहसील स्तर पर अधिकतर सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं प्रभावशील नहीं हैं। यही कारण है कि स्वास्थ्य सुविधाओं का वैधानिक एवं गैर-वैधानिक निजीकरण बढ़ता जा रहा है। निजीकरण बढ़ने के साथ ही नागरिकों का शोषण भी बढ़ता जा रहा है। हमारे समाज में कई ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं जब कोई व्यक्ति किसी गंभीर बीमारी के ईलाज के बाद अपनी आर्थिक स्थिति को संभाल नहीं पाता है।

वर्तमान समय में भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं को सुलभ करने की आवश्यकता सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में से एक है। इसके लिए हम परंपरागत चिकित्सा व्यवस्था को भी सुदृढ़ कर सकते हैं। आयुर्वेद एवं होम्योपैथी चिकित्सा पद्धतियों का विकास भारत को पूर्ण रूप से स्वस्थ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति सहज एवं सुलभ है। इसके उपयोग से कई बीमारियों को उनके प्राथमिक स्तर में ही रोका जा सकता है। हम कोरोना वायरस का ही उदाहरण ले सकते हैं जहां आयुर्वेद के उपयोग से लोगों की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में सहायता मिली।

अब प्रश्न यह उठता है कि स्वास्थ्य सुविधाओं और आत्मनिर्भरता का क्या सम्बन्ध है?

इसका उत्तर साधारण है कि जब किसी राष्ट्र के नागरिक स्वस्थ रहेंगे तो उनकी दक्षता में वृद्धि होगी और उनके स्वास्थ्य खर्च में कमी आएगी जिससे उनकी आर्थिक क्षमताएं भी बढ़ेंगी। वृहद स्तर पर देखा जाए तो सामूहिक रूप से स्वस्थ नागरिकों वाला राष्ट्र अपेक्षाकृत अधिक क्रियाशील और उत्पादक होता है। बढ़ी हुई यही उत्पादकता आत्मनिर्भरता का एक महत्वपूर्ण अवयव है। इसके अतिरिक्त आयुर्वेद जैसी परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों के विकास के कारण हमारे कृषकों और चिकित्सकीय गतिविधियों से जुड़े उद्यमों का भी विकास होगा।

उद्यम की अवधारणा का विकास : रोजगार प्रदाता बनने की प्रवृत्ति का विकास।

आज युवा भारत का एक बड़ा वर्ग रोजगार की खोज में है। एक बड़ी युवा आबादी ऐसी भी है जो ऐच्छिक रूप से बेरोजगार मानी जानी चाहिए क्योंकि यह आबादी या तो सरकारी नौकरी की खोज में अथवा मनपसंद रोजगार न मिल पाने के कारण बेरोजगार है। इस प्रवृत्ति का हमें त्याग करना चाहिए। आत्मनिर्भर भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि भारत का युवा रोजगार खोजी नहीं अपितु रोजगार प्रदाता बने। इसके लिए हमें अपने युवाओं में उद्यम प्रवृत्ति का विकास करने की आवश्यकता है। इसका प्रारम्भ विद्यालय स्तर पर हो जाना चाहिए। विभिन्न प्रकार के कौशल विकास कार्यक्रमों से यह संभव हो सकता है। कृषिगत क्षेत्र भी अपार संभावनाओं वाला क्षेत्र है। वर्तमान भारत में कृषिगत उद्यमों की अनेकों संभावनाएं हैं। इसके लिए आवश्यकता है कि एक बड़ी युवा जनसंख्या कृषिगत क्षेत्र में कार्य करने के लिए प्रेरित हो। भारत का युवा वर्ग तकनीक का उपयोग करके कई क्षेत्रों में रोजगार निर्माण का कार्य करके आत्मनिर्भर भारत के स्वप्न को पूरा करने में अपना सहयोग प्रदान कर सकता है। ये क्षेत्र हैं स्वास्थ्य, कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, ई-कॉमर्स आदि। इन क्षेत्रों में उपलब्ध अवसरों एवं तकनीक की सहायता से एक वृहद अर्थव्यवस्था का निर्माण किया जा सकता है। हालाँकि भारत सरकार की स्टार्टअप एवं अन्य उद्यम योजनाओं के कारण आज भारत में उद्यमियों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। भारत में स्टार्टअप की संख्या में बड़ी वृद्धि देखने को मिली है किन्तु अभी भी भारत में अनंत संभावनाएं शेष हैं। भारत का एक बड़ा बाजार होना इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। चीन के बहिष्कार की मांग उठने के पश्चात इस बड़े भारतीय बाजार में एक रिक्तता आएगी जिससे अवसरों की उपलब्धता में भी वृद्धि देखने को मिलेगी। आवश्यकता है कि इन अवसरों को सुदृढ़ किया जाए एवं कार्यशैली में परिवर्तन किया जाए।

आत्मनिर्भरता किसी सरकार अथवा प्रशासन का कोई आदेश अथवा नीति मात्र नहीं है अपितु यह राष्ट्रीय स्वाभिमान की एक सामूहिक अवस्था है। यह आर्थिक स्वालंबन का ही एक आधुनिक रूप है। इसके अनुसार न केवल हमें अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करनी है अपितु एक निर्यातक के रूप में भी विकसित होना है। भारत में उपस्थित कार्यबल एवं अनुकूल परिस्थितियां आत्मनिर्भरता लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक हो सकती हैं। राजनैतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक नीतियां आवश्यक हैं किन्तु आत्मनिर्भर बनने की सबसे पहली शर्त है आम जन की व्यवहारिकता में परिवर्तन। शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो, कृषि हो अथवा ग्रामीण विकास हो, जब तक नागरिकों की प्रवृत्ति में परिवर्तन नहीं आएगा तब तक आत्मनिर्भरता का लक्ष्य कागजों और न्यूज चैनलों में ही चर्चा में बना रहेगा।

वन्दे मातरम।।

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