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हिन्दुओं के साथ हुई सबसे बड़ी वैधानिक हेरा फेरी : भारत की अल्पसंख्यक नीति।

कई राज्यों में हिन्दू 2%-5% होने के बाद भी बहुसंख्यक एवं मुस्लिम व ईसाई 90%-95% की संख्या में होने के बाद भी अल्पसंख्यक हैं। है न रोचक बात। तो ऐसे ही रोचक तथ्यों के बारे में जानने के लिए पढ़िए यह लेख।

कुछ दिनों पहले भाजपा नेता एवं वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय की एक याचिका को उच्चतम न्यायालय द्वारा खारिज कर दिया गया। इस याचिका में उन्होंने अल्पसंख्यक शब्द को पुनः परिभाषित करने और कई राज्यों में हिन्दुओं की न्यून जनसँख्या के कारण उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा देने की मांग की थी।

अल्पसंख्यकों का यह मुद्दा सदैव से जटिल बना रहा। सरकारों ने इस पर विचार करने का कष्ट मात्र इसलिए नहीं किया क्योंकि यह मुद्दा संवेदनशील है। ये अलग बात है कि किसी भी मुद्दे की संवेदनशीलता राष्ट्र हित से बढ़कर नहीं हो सकती है।

भारत की अल्पसंख्यक नीति पर यदि बहुआयामी विचार किया जाए तो यह सभी अल्पसंख्यकों के हितों की पूर्ति करने में असमर्थ दिखती है। उससे भी बढ़कर यह एक मजहब विशेष के लिए अत्यधिक लाभप्रद है। हालाँकि इसका दूसरा पहलू यह भी है कि यह अल्पसंख्यक नीति हिन्दुओं के साथ की गई सबसे बड़ी वैधानिक हेरा फेरी है।

इस लेख में कुछ तथ्यों और तर्कों के आधार पर भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति की समीक्षा की गई है। इस लेख का उद्देश्य है आपको उन कारणों से अवगत कराना जिनसे कई राज्यों में हिन्दू 2%-5% होने के बाद भी बहुसंख्यक एवं मुस्लिम व ईसाई 90%-95% की संख्या में होने के बाद भी अल्पसंख्यक हैं। है न रोचक बात। तो ऐसे ही रोचक तथ्यों के बारे में जानने के लिए शुरू करते हैं यह लेख।

अल्पसंख्यकों की वैधानिक स्थिति :

सबसे पहली बात तो ये है कि संविधान में कहीं भी अल्पसंख्यकों की कोई परिभाषा नहीं दी गई है और न ही उनके निर्धारण के कोई मापदंड उपलब्ध हैं। संविधान अल्पसंख्यकों के निर्धारण का धार्मिक एवं भाषाई आधार देता है। संविधान के अनुच्छेद 29, 30, 350A एवं 350B में अल्पसंख्यक शब्द का उल्लेख किया गया है।

वर्ष 1992 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम अस्तित्व में आया जिसके बाद अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए एक आयोग का गठन किया गया। इस अधिनियम में भी अल्पसंख्यकों को परिभाषित नहीं किया गया।

वर्ष 1993 में केंद्र सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों को लेकर जारी किए गए सर्कुलर में 5 समुदायों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया था। ये 5 समुदाय थे मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और पारसी। इस नोटिफिकेशन में भी अल्पसंख्यक की कोई परिभाषा नहीं दी गई और न ही इन 5 समुदायों के चयन का कोई ठोस कारण बताया गया। इस नोटिफिकेशन को हास्यास्पद माना जाना चाहिए क्योंकि 1991 की जनसंख्या के अनुसार 12.61% जनसंख्या वाले मुस्लिम अल्पसंख्यक माने गए किन्तु 0.40% जनसंख्या वाले जैनों को अल्पसंख्यक का दर्जा नहीं दिया गया। मुझे नहीं लगता कि कोई भी ऐसा तर्क होगा जो जैनों की इतनी कम संख्या होने के बाद भी उन्हें अल्पसंख्यक न माने जाने को जस्टिफाई करेगा। अंततः 2014 में कांग्रेस सरकार द्वारा जैनों को अल्पसंख्यक का दर्जा दे दिया गया। भले ही चुनावी वर्ष होने के कारण यह कार्य किया गया हो किन्तु भारत के वास्तविक अल्पसंख्यकों को उनका अधिकार तो मिला।

अल्पसंख्यक मुद्दे से जुड़े कुछ अदालती निर्णय एवं तर्क :

हालाँकि न्यायालय भी अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर कभी भी एकमत नहीं हो पाए किन्तु कई ऐसे निर्णय हैं जिन्हे भारत की अल्पसंख्यक नीति की समीक्षा का आधार बनाया जा सकता है।

1: नीट (NEET) जजमेंट

सीएमसी वेल्लोर एसोसिएशन बनाम भारत संघ।

न्यायालय ने कहा कि 19(1)(g) के अंतर्गत प्राप्त अधिकार अनंत प्रवृत्ति के नहीं हैं एवं उन पर तार्किक प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है। जब एक वृहद समुदाय के कल्याण का मुद्दा हो तब अनुच्छेद 25 एवं 26 तथा अल्पसंख्यकों से सम्बंधित अनुच्छेद 29 एवं 30 अनंत नहीं हैं। अधिकारों के संतुलन के लिए किया गया कोई भी कार्य इन अनुच्छेदों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता है।

2: बाल पाटिल केस।

2005 में उच्चतम न्यायालय ने जैन समुदाय को अखिल भारतीय स्तर पर अल्पसंख्यक का दर्जा देने से मना कर दिया। इस निर्णय में ध्यान देने योग्य बात यह है कि उच्चतम न्यायालय ने जैनों की अल्पसंख्यक स्थिति के निर्धारण का निर्णय राज्यों पर छोड़ दिया था। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य जैनों को राज्य स्तर पर अल्पसंख्यक का दर्जा दे चुके थे। इसका तात्पर्य है कि अल्पसंख्यकों का निर्धारण राज्य स्तर पर किया जा सकता है।

3: टी.एम.ए. पाई केस।

2002 में उच्चतम न्यायालय की 11 जजों की बेंच ने निर्णय देते हुए कहा कि धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों का निर्धारण राज्य स्तर पर किया जाना चाहिए न कि अखिल भारतीय स्तर पर।

4: 2007 पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का निर्णय।

2007 में उच्च न्यायालय ने पंजाब के अंदर सिखों को अल्पसंख्यक मानने से मना कर दिया। इसके पीछे तर्क दिया गया कि पंजाब के अंदर सिख बहुसंख्या में हैं और राजनैतिक रूप से शक्तिशाली भी। 2011 की जनगणना के अनुसार पंजाब में सिखों की जनसंख्या लगभग 58% है।

न्यायालयों के कई ऐसे निर्णय हैं जहां राज्य स्तर पर अल्पसंख्यकों के निर्धारण की संभावनाएं व्यक्त की गई हैं। किन्तु अंततः न्यायालय भी संविधान द्वारा अधूरे छोड़े गए मुद्दे पर कोई अंतिम निर्णय लेने में हिचकिचा रहे हैं।

अल्पसंख्यकों का अंतर्राष्ट्रीय निर्धारण एवं भारत के परिप्रेक्ष्य में अल्पसंख्यकों का तुलनात्मक अध्ययन :

संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा के अनुसार,

कोई भी समूह या समुदाय जो सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक रूप से गैर प्रभावशाली है एवं जनसंख्या में न्यूनतम है, वही अल्पसंख्यक है।

भारत में तो अल्पसंख्यकों की कोई परिभाषा उपलब्ध नहीं है तो संयुक्त राष्ट्र की दी गई परिभाषा के अनुसार ही भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन करना होगा।

  • साक्षरता दर की बात करें तो हिन्दुओं और मुस्लिमों के अतिरिक्त अन्य पंथ बेहतर स्थिति में हैं। मुस्लिमों के मामले में हालात खराब इसलिए हैं क्योंकि उनके समुदाय में जनसंख्या नियंत्रण पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है। राष्ट्रीय मासिक आय एवं व्यय के मामले में भी हिन्दुओं की स्थिति अल्पसंख्यक समूहों से कमतर है। मुस्लिमों को यहाँ भी अधिक जनसँख्या के कारण समस्या का सामना करना पड़ रहा है।
  • जनसंख्या की बात करें तो मुस्लिमों की जनसंख्या भारत में दूसरी सर्वाधिक है। कुछ ही दिनों में भारत के मुस्लिमों की जनसँख्या विश्व में सर्वाधिक हो जाएगी। ऐसे में क्या इतनी विशाल जनसंख्या अल्पसंख्यक कही जा सकती है। लक्षद्वीप एवं जम्मू और कश्मीर में मुस्लिम जनसंख्या बहुसंख्यक है। यहाँ हिन्दू अल्पसंख्यक हैं। किन्तु इन राज्यों में भी मुस्लिमों को अल्पसंख्यक होने के पूरे लाभ मिलते हैं। इसके अतिरिक्त नागालैंड, मिजोरम, मेघालय, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं। कहने का तात्पर्य है कि यदि संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा पर ध्यान दिया जाए तो जनसंख्या के हिसाब से भी हिन्दू अल्पसंख्यक कहा जाएगा।
  • अब बात करते हैं राजनैतिक प्रभुत्व की। लक्षद्वीप, जहाँ लगभग 97% मुस्लिम आबादी है और हिन्दू आबादी मात्र 5% है, हिन्दू राजनैतिक रूप से प्रभुत्वशाली तो नहीं हो सकते। नागालैंड, मिजोरम और मेघालय जैसे राज्यों में जहाँ हिन्दुओं की संख्या क्रमशः 8.75%, 2.75% और 11.53% है वहां भी ईसाईयों की तुलना में हिन्दुओं का राजनैतिक प्रभुत्व होना असंभव है।

कहने को तो पूरी भारतीय राजनीति मुस्लिम तुष्टिकरण पर आधारित रही है मुस्लिम वोट बड़े महत्व के होते आए हैं किन्तु तार्किक रूप से भारत के कई राज्यों में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं और उन्हें अल्पसंख्यकों की सुविधाएं मिलनी चाहिए।

कई ऐसे बिंदु हैं जिनके हिसाब से भारत की अल्पसंख्यक नीति तर्कहीन और पक्षपाती लगती है।

सबसे पहले तो भारतीय अल्पसंख्यक नीति, मुस्लिम अल्पसंख्यक नीति कही जानी चाहिए। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में मुस्लिमों की जनसंख्या लगभग सत्रह करोड़ बाईस लाख है जो भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 15% है। अब मुस्लिमों की जनसंख्या की तुलना अन्य अल्पसंख्यक समुदायों से करें तो मुस्लिम जनसंख्या में कहीं आगे दिखाई देते हैं। भारत के अल्पसंख्यक समूहों में मुस्लिम जनसंख्या लगभग 75% है। इसका तात्पर्य है कि सामान्य गणितीय गणना में अल्पसंख्यकों के हित में प्रारम्भ की गई योजनाओं का लगभग 70%-75% लाभ मुस्लिमों को होता है। यह आंकड़ा बढ़ सकता है क्योंकि बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों के आंकड़े इसमें सम्मिलित नहीं हैं। इससे यह स्पष्ट रूप से ज्ञात होता है कि वास्तविक अल्पसंख्यक जैसे जैन, बौद्ध और पारसी, अल्पसंख्यकों के अधिकार का पूर्ण लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। अल्पसंख्यक नीति में सामान्यतः यही माना जा रहा है कि 50% से कम जनसंख्या वाले समुदाय को अल्पसंख्यक माना जाएगा। इस तर्क से मुस्लिम जनसंख्या 40%-45% तक पहुँचने के बाद भी अल्पसंख्यक कही जाएगी।

एक व्यक्ति जो राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक माना जा रहा है वह किसी राज्य में बहुसंख्यक होने के बाद भी अल्पसंख्यक होने का लाभ उठाएगा। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में रहने वाला एक ईसाई यहाँ तो अल्पसंख्यक माना जाएगा किन्तु नागालैंड और मेघालय में पहुंचने के बाद भी उसे अल्पसंख्यकों के लाभ ही मिलेंगे जबकि उन राज्यों में ईसाई जनसँख्या में 85%-95% हैं। विडम्बना देखिए कि हिन्दू को बहुसंख्यक होने पर तो वैसे भी कुछ नहीं मिलना है किन्तु अति अल्प होने के बाद भी उसे कुछ प्राप्त नहीं होगा।

अल्पसंख्यक की वर्तमान नीति के पक्षधर एक तर्क रखते हैं कि अल्पसंख्यक समुदाय असुरक्षित महसूस न करे इसी कारण भारत में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा एवं सहायता के विशेष प्रावधान किए गए हैं। असुरक्षा का यह तर्क बिलकुल ही खोखला है क्योंकि असुरक्षा के भयानक मंजर हमने जम्मू और कश्मीर में देखे हैं। बंगाल और केरल जैसे स्थानों में भी जहाँ हिन्दू फिलहाल अल्पसंख्यक नहीं है वहां भी असुरक्षित भी वही हैं। लक्षद्वीप और नागालैंड जैसे राज्यों में भी असुरक्षित हिन्दू ही हैं न कि 97% मुस्लिम और 90% ईसाई।

हिन्दुओं द्वारा खोले गए संस्थानों (सहायता प्राप्त अथवा गैर सहायता प्राप्त) में पिछड़े और गरीब समूहों के लिए आरक्षण का प्रावधान है जिसमे अल्पसंख्यक भी सम्मिलित हैं किन्तु अल्पसंख्यक समुदाय (सहायता प्राप्त अथवा गैर सहायता प्राप्त) इस प्रकार के सामाजिक दायित्व से पूर्णतः मुक्त हैं भले ही इन पिछड़े और गरीब समूहों में अल्पसंख्यक ही क्यों न हो।

स्वतंत्रता के 70 वर्षों के पश्चात भी न तो विधायिका और न ही न्यायपालिका, अल्पसंख्यकों की परिभाषा और मापदंड तय कर पाए हैं। इस पूरे भारत में किसी को नहीं पता कि अल्पसंख्यक कौन हैं। एक बात निश्चित है कि हिन्दुओं के अलावा सभी अल्पसंख्यक हैं चाहे संख्या में 95% ही क्यों न हों। आखिरकार राज्य स्तर पर अल्पसंख्यकों की पहचान करने में क्या समस्या है। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की पहचान भी तो राज्य स्तर पर ही की जाती है। कोई जाति किसी राज्य में अनुसूचित होती है वही जाति किसी दूसरे राज्य में अनुसूचित नहीं होती है। ऐसी व्यवस्था भारत में अस्तित्व में है तो अल्पसंख्यक निर्धारण भी राज्य स्तर पर हो सकता है। लक्षद्वीप, नागालैंड, मिजोरम, जम्मू और कश्मीर, मेघालय और मणिपुर जैसे राज्यों में हिन्दुओं के अनुच्छेद 14 के अंतर्गत प्राप्त अधिकारों का लगातार हनन हो रहा है। अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता का प्रावधान करता है किन्तु जिन राज्यों में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं वहां उन्हें अल्पसंख्यकों के कोई भी अधिकार प्राप्त नहीं होते हैं।

भारत में अल्पसंख्यक नीति की पुनर्समीक्षा की अत्यंत आवश्यकता है। हिन्दुओं के प्रति अत्याचार एवं धर्मान्तरण जैसे अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए अल्पसंख्यकों को सुव्यवस्थित रूप से परिभाषित किए जाने की आवश्यकता है। यदि जनसंख्या को अल्पसंख्यक होने का मापदंड माना जाए तो भी जनसंख्या की एक सीमा तय होनी चाहिए। अल्पसंख्यक नीति को पुनर्परिभाषित करने के कई तरीके हैं लेकिन जब तक इस मुद्दे को संवेदनशील माना जाएगा तब तक इसका कोई अंतिम समाधान नहीं निकाला जा सकता है। दृढ़ इच्छाशक्ति के अभाव में भारत की अल्पसंख्यक नीति हिन्दुओं के साथ वैधानिक हेरा फेरी का माध्यम बनी रहेगी।

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