Interpretation

भारतवर्ष का अर्धनारीश्वर स्वरुप।

चाहे हम एक राष्ट्र्रपुरुष की बात करें या मातृस्वरूपा भारतभूमि की, राष्ट्र का कल्याण हमारे निजी हितों से बढ़कर होना चाहिए।

भारतीय राजनीति के महामना श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने कहा था कि भारतवर्ष एक भूखंड मात्र नहीं है अपितु एक जीता जागता राष्ट्रपुरुष है। भारतवर्ष एक सम्पूर्ण इकाई है जिसका वर्णन हमारे वेद और पुराण करते हैं।

भारतवर्ष के विषय में विष्णु पुराण में कहा गया है कि :

उत्तरं यत समुद्रस्य, हिमाद्रेश्चैव दक्षिणं।

वर्ष तद भारतं, नाम भारती यत्र संतति।।

अर्थात, विशाल हिन्द महासागर के उत्तर में तथा महान हिमालय के दक्षिण में स्थित पुण्यभूमि भारत है और यहाँ निवास करने वाली इस पुण्यभूमि की संतान भारतीय हैं।

ऊपर कहा गया श्लोक एकीकृत भारतवर्ष का एक पुरातन प्रमाण है।

एक रोचक पहलू यह भी है कि जिस भारतवर्ष को अटल जी ने राष्ट्रपुरुष की संज्ञा दी उसे हम भारत माता के रूप में भी पूजते हैं, तो एक ही इकाई की द्वैत प्रकृति कैसे हुई? हमारी भारत भूमि का कौन सा स्वरुप सत्य है?

इस लेख में ऐसे ही कुछ प्रश्नों के विषय में विचार करेंगे।

हिन्दू धर्म के सांख्य दर्शन में सनातन के आधारतभूत तत्वों का विरूपण दो रूप में किया गया है, पहला है पुरुष और दूसरी है प्रकृति। पुरुष और प्रकृति दोनों का ही स्वतंत्र रूप में कोई अस्तित्व नहीं है। देवी भागवत पुराण के अनुसार पुरुष का भौतिक रूप है शिव जिनके शरीर के बाम (बाँए) भाग से प्रकृति अर्थात माता पार्वती का प्रादुर्भाव हुआ जो प्रकृति का एक सगुण स्वरुप हैं जिनमें प्रकृति के तीन गुण अर्थात सत्व, रज और तम समाहित हैं। इसी कारण भगवान् शिव को अर्धनारीश्वर कहा जाता है। कई शास्त्रों के अनुसार ब्रह्माण्ड में जो भी उत्पन्न होता है वो अर्धनारीश्वर से उत्पन्न होता है और अपनी आयु की पूर्णता के पश्चात अर्धनारीश्वर में ही समा जाता है। भारतवर्ष का स्वरुप भी अर्धनारीश्वर है। जहाँ एक ओर हम इसे राष्ट्र पुरुष के रूप में देखते हैं वहीं दूसरी ओर मातृभूमि माता के रूप में भारतवर्ष की आराधना करते हैं।

भारतवर्ष एक राष्ट्र पुरुष के रूप में :

भारतवर्ष की महानता उसका कर्मयोग है जो उसने एक विश्वगुरु के रूप में सम्पूर्ण संसार को दिया गया। भारतवर्ष हमें पुरुषार्थ सिखाता है और कर्त्तव्य करने की प्रेरणा देता है। अनंतकाल से हमारे ऋषि-मनीषियों ने धर्म, ज्ञान, विज्ञान, तकनीकि और दर्शन का प्रचार प्रसार किया। इन सबके कारण आज वर्तमान में भी हमारा राष्ट्र सभी गुणों से संपन्न दिखता है। भारतवर्ष वह योद्धा है जो सदियों तक कट्टरपंथियों और विदेशी आक्रांताओं से लड़ता रहा। इन आक्रांताओं ने भारतवर्ष को असंख्य घाव दिए किन्तु अंत में उन सब की कब्रगाहें इसी भारतवर्ष की भुजाओं के तले खुद गईं और वो सब यहीं दफन हो गए। यही अदम्य साहस पीढ़ी दर पीढ़ी भारतवासियों में स्थानांतरित होता चला गया। इस राष्ट्र का दर्शन कर्म प्रधान रहा। श्री कृष्ण ने वास्तव में अर्जुन को सम्बोधित करते हुए भारत के लिए कहा कि हे भारत ! तुम्हारे सामर्थ्य में मात्र कर्म करना है और इसी के करने मात्र से तुम मुझे प्राप्त करोगे किन्तु कर्म फल तुम्हारे सामर्थ्य में नहीं है। भारतवर्ष ने इसी कर्म सामर्थ्य का उपहार हमें दिया है। यह राष्ट्रपुरुष ही हमारा आदर्श पुरुष है जिसे हमारे सभी कर्तव्य समर्पित हैं। यह शौर्य देता है, साहस देता है, कर्म करने की संकल्प शक्ति प्रदान करता है। भारतवर्ष वह राजनीतिज्ञ है जो “वसुधैव कुटुंबकम” के सिद्धांत पर कार्य करता है। भारतवर्ष एक ऐसा अर्थशास्त्री है जो “एकात्म मानववाद” का पुरोधा है। भारतवर्ष उस समाजशास्त्र का समर्थक है जिसका मूल तत्त्व है “कृण्वन्तो विश्वमार्यम” अर्थात एक ऐसे वैश्विक समाज का निर्माण हो जो पवित्र, कर्तव्यनिष्ठ और श्रेष्ठ हो। भारतवर्ष वह चिकित्सक है जो दूर्वा जैसे अतिसूक्ष्म पादप से लेकर वट जैसे विशाल वृक्ष में भी चिकित्सकीय गुण ढूंढ लेता है। भारतवर्ष वह शोधकर्ता है जो एक एक जाति के कल्याण को ध्यान में रखते हुए बिना किसी को हानि पहुंचाए, अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है। अन्वेषण और उपयोग की यही समवेशी प्रवृत्ति भारतवर्ष को विश्व में सर्वश्रेष्ठ स्थान दिलाती है। एक पिता के समान प्रगाढ़ कर्तव्यनिष्ठा ही भारतवर्ष को एक महान राष्ट्र पुरुष के रूप में स्थापित करती है।

भारतवर्ष की मातृभूमि माता के रूप में परिकल्पना :

अनेकों सहस्त्राब्दियों से हम अपने भारतवर्ष की परिकल्पना मातृ स्वरुप में  करते आये हैं। हमारे पुरातन ग्रंथों में कहा भी गया है कि “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” अर्थात जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़ कर है। भगवान श्री राम ने भी भारत भूमि के विषय में यही कहा है। सत्य भी यही है। जो पृथ्वी हमारा पालन पोषण करती है, वह जन्म देने वाली माता से कम नहीं है। पूरी मानव जाति इसी पृथ्वी की संतान हैं। इसके अलावा माता पृथ्वी को समर्पित एक श्लोक है,

समुद्र वसने देवी पर्वतस्तनमण्डले।

विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्वमे।।

इस श्लोक में माता पृथ्वी से क्षमा प्रार्थना की गई है क्योंकि हम प्रातः निद्रा का त्याग करने के पश्चात सर्वप्रथम पृथ्वी पर अपने पैर रखते हैं। हम भारतवासी तो न केवल भारतभूमि अपितु पूरी पृथ्वी को माता का पद प्रदान करते हैं।

आनंदमठ में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने वन्दे मातरम नामक गीत लिखा है जो भारत भूमि को समर्पित है। इस राष्ट्र गीत में भारतभूमि की उन सभी विशेषताओं का वर्णन है जिनसे मातृत्व के गुण का प्रदर्शन होता है।

सभी प्रकार के मानवीयकरण से परे भारतवर्ष एक ऐसा भाव है जो हमें एक साझा लक्ष्य प्रदान करता है। एक ऐसा लक्ष्य जो धर्म और राष्ट्र के संयोजन में गुंथित है। भारत का सनातन धर्म ही उसकी आत्मा है। यही वह एक मात्र विचार है जो हमें एक करता है। समस्त हिन्दू जाति के लिए भारतवर्ष से अधिक गौरव का कोई विषय हो ही नहीं सकता। एक ऐसी भूमि जो भगवान विष्णु के अवतारों की कर्मस्थली रही और जहाँ से ऋषि-मनीषियों ने धर्म का प्रचार किया। इस गौरव भूमि को हम चाहे जिस रूप में स्वीकार करें किन्तु हमें यह स्मरण रहना चाहिए कि हमारे कर्तव्यों के केंद्र में भारतवर्ष का उत्थान हो। चाहे हम एक राष्ट्र्रपुरुष की बात करें या मातृस्वरूपा भारतभूमि की, राष्ट्र का कल्याण हमारे निजी हितों से बढ़कर होना चाहिए।

राष्ट्र उत्थान ही हमारा कर्त्तव्य और लक्ष्य है।

जय श्री राम।।     

 

 

 

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