Interpretation

हरी चटनी और लाल सलाम।

अब्दुल मियाँ की दुकान बढ़िया दूर से ही पहचान में आ जाती है। दसियों हरे झंडे दिखाई देते हैं। यही तो पहचान है जिसे गाँव के बुद्धिजीवी किलोमीटर से सूंघ लेते हैं।

“अरे कहाँ भगे जा रहे हो अब्दुल मियाँ ? हम से अइसन नजर न चुराओ। हम कौन सा तुमसे माइनारिटी का कार्ड छीनने आए हैं”।

“वो तो वैसे भी हमसे कोई नहीं छीन सकता लेकिन अभी थोड़ा जल्दी है। का है न कि सरकार पइसा भेजी है तो अपनी मेहरारू को लेकर बैंक जाएंगे”।

“अरे तुम भी अब्दुल मियाँ कहाँ इस सरकार वरकार के चक्कर में पड़े हो। हम तो सुने है कि सरकार कागज़ मांग रही है। हम तो ये तय किए थे ना कि कागज़ नहीं दिखाएंगे। अब काहे दिखा रहे हो?”

“अइसा है गोपाल जी कि हम तुमको भी पूरा मजा लूटते हुए देखे हैं तो हमको न बताओ कि कागज़ दिखाएं कि न दिखाएं। चलो अभी निकलते हैं शाम को मिलते हैं अड्डे पर”।

गोपाल और अब्दुल मियाँ एकदम स्ट्रेटेजिक फ्रैंड हैं। गोपाल जी बहुतय पढ़े हैं। दिल्ली में रहते थे तो गजबे किए थे। मतलब सरकार हिलाए थे बिलकुल। गोपाल जी जाति विरोधी हैं इसलिए अपना सरनेम हटवा दिए हैं या ये कहिए कि थोड़ा सा कटवा लिए हैं। लेकिन अंदर की बात बताएं, हैं अव्वल दर्जे के भेदभाव वाले आदमी। लोगों को उनके वर्ण से बुलाते हैं। जब से यहाँ गाँव आ गए हैं तब से लोगों की नाक में दम कर रखा है। कमाई धमाई तो है नहीं लेकिन काम रुकता नहीं है। अब्दुल मियाँ के अलावा इनका कोई दूसरा मित्र नहीं है या ये कहें कि जानबूझकर बनाए नहीं। दिल्ली की आदत इतना जल्दी कहाँ छूटती है। अब्दुल मियाँ के तो कहने ही क्या। वो तो पैदा ही पहचान के साथ हुए हैं। अब्दुल मियाँ गाँव में ही एक पंचर बनाने की दुकान चलाते हैं। दुकान में थोड़ा बहुत गाड़ी मोटर का पार्ट भी रखे हैं। वही दुकान तो अड्डा है, गाँव के कुछ बुद्धिजीवियों का जहाँ गोपाल जी के नेतृत्व में क्रांति की आधारशिला रखी जाती है किन्तु एक बार रखने के बाद आधारशिला उठती नहीं है। अब्दुल मियाँ की दुकान बढ़िया दूर से ही पहचान में आ जाती है। दसियों हरे झंडे दिखाई देते हैं। यही तो पहचान है जिसे गाँव के बुद्धिजीवी किलोमीटर से सूंघ लेते हैं।

आज अब्दुल मियाँ भारी प्रसन्न प्रतीत हो रहे हैं। लगता है बैंक का काम सफल रहा। घड़ी दोपहर के तीन बजा रही है। गोपाल जी कांधे पर गमछा डाले पहुंचते हैं। साथ में चमकू भी है।

“अस्सलावालेकुम अब्दुल भाई। क्या हाल है? मुँह देखकर तो लग रहा है कि बैंक से खाली हाथ लौटे हो”। गोपाल जी ये कहते हुए वहीं बाहर रखी बेंच में बैठ गए। चमकू लाल झंडा ठीक करने लगा जो वहीं बगल में पीपल के पेड़ पर लगा हुआ था।

“अब क्या बताएं गोपाल भाई। हम हालात के मारे हैं। एक तो मुसलमान हैं ऊपर से अल्पसंख्यक, बैंक वाले बोले कि कल आना”। अब्दुल के मुख पर चिंता की गहरी रेखाएं खिंच गईं।

“अरे लेकिन हमारे चाचा भी गए थे। वो तो बढ़िया पइसा गिनते हुए आए हैं”। चमकू ने इतना कहा कि गोपाल भाई एकदम तमतमा गए और बोले कि,

“एक रपेट लगाएंगे। कितनी बार बोले हैं कि अब्दुल भाई जो बोल रहे हैं वही सत्य है। तुम अपनी बुद्धि न भिड़ाया करो। कितना लाल काढ़ा पिलाए हैं किन्तु तुम्हारी बैल बुद्धि में गोबरय भरा है। अब्दुल भाई से माफ़ी मांगो”।

“अब्दुल हम शर्मिंदा हैं”। चमकू ने माफ़ी मांग ली।

अब्दुल और गोपाल जी का दिल का कनेक्सन है। बिना कहे दोनों एक दूसरे की बात समझ लेते हैं। तीनों बैठे गप्पे मार रहे थे कि इतने में इनकी क्रांति के दो ठो सिपाही और आ गए, सुनील और बिसम्भर।

दोनों आकर बैठते इससे पहले गोपाल जी बोल पड़े,

“काहे रे सुनिलवा का करा रहे हो? आज अब्दुल भाई को बैंक वाला पइसा नहीं दिया और जानते हो काहे “?

“हम जानते हैं। हमको शरम आता है कि हम हिन्दू हैं। अब्दुल हम शर्मिंदा हैं”। सुनील भाई बिलकुल फील में आ गए थे लेकिन चमकू बीच में बोल पड़ा।

“सुनील भाई हमको सरम काहे नहीं आता है। थोड़ा थोड़ा आता है फिर बिचक जाता है। हम प्रयास किए लेकिन हमें उस लेबल का सरम नहीं आ पा रहा है, जिस लेबल का आपका है”।

“अरे हम क्या आज़ादी लाएंगे। हमारा अस्सिटेंट ही अपने द्वार बंद करके बैठा है, कहाँ से आए शरम। द्वार खोलो महाराज। हमें तो लगता है कि हमारे लाल काढ़े में ही खोट है”। चमकू की बात से गोपाल जी एकदम तिलमिला गए।

इतने में अब्दुल मियाँ की नमाज का समय हो गया। अब्दुल मियाँ अपनी चटाई निकालें इसके पहले ही उनके निठल्ले मित्रों के रुमाल निकल आए। इसे कहते हैं नेक्सस। हार्ट तो हार्ट कनेक्सन।

अब्दुल भाई और गोपाल जी की टोली पूरा दिन वहीं दुकान में बैठे गाँव भर की खबरों का मैनीपुलेशन करते रहते हैं। गोपाल जी तो वैसे दिल्ली में कामरेड और कामरेडियों को चाय पिलाते थे किन्तु गाँव में ऐसा व्यवहार करते हैं मानो लेनिन की रोटी में घी यही चुपड़ते थे। बाकी तो पता नहीं लेकिन मैनीपुलेशन और डफली बजाना जरूर सीख आए हैं दिल्ली से। अब नेशनल लेबल में न सही किन्तु गाँव लेबल पर तो क्रांति ला ही सकते हैं। ऐसे ही एक दिन सारे क्रांतिवीर दुकान में बैठे थे तभी वहाँ से पंडित रामप्रसन्न गुजरे। पंडित रामप्रसन्न, गाँव के पुराने एवं सम्मानित पुरोहित बिरजू जी के पुत्र हैं। रामप्रसन्न बड़े ही भोले भाले और धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं। सदैव भगवान स्वयंभू की सेवा में लीन रहते हैं। वैसे तो राजनीति और बहसबाजी से दूर रहते हैं किन्तु जब अब्दुल की दुकान के पास वाले पीपल में सोमवती अमावस्या की पूजा करने का विरोध हुआ तब रामप्रसन्न जी ही थे जो गोपाल जी के कामरेडों से अकेले उलझ गए थे। लेकिन बेचारे अकेले पड़ गए। वह पीपल अब धर्मनिरपेक्ष हो चुका है। वह समानता के ज्ञान पुंज से प्रकाशित है क्योंकि अब वहाँ लाल झंडा लगा है।

“का हो पंडित कहाँ भगे जा रहे हो? तनिक हम लोगन को भी ज्ञान की गंगा में नहला दो”। गोपाल जी बात सुनकर उनके चेला चपाटी मार हंस हंस के अपने फेफड़े संकट में डाल दिए। बिसम्भर के फेफड़ों से तो सीं सीं की आवाज आने लगी थी।

“अरे गोपाल भाई आप तो स्वयं ज्ञान के क्षीरसागर हो। हम भला आपको क्या ज्ञान बताएंगे”। रामप्रसन्न जी ने बड़ी विनम्रता से गोपाल जी के उपहास का उत्तर दिया।

“अरे लेकिन तनिक बैठ तो लो। लाओ तुम्हारे स्कूटर की हवा चेक कर दें”। अब्दुल भाई भी पंडित जी से आग्रह करने लगे।

“हमारे स्कूटर की हवा बढ़िया है अब्दुल भाई। हम थोड़ा जल्दी में हैं। बाबू जी की दवाई लेने जा रहे हैं। समय से लौट आए तो बैठ लेंगे”।

“लेकिन स्कूटर में चारों तरफ रंगाई पुताई काहे कराए हो? पूरा राम मंदिर यहीं बना लोगे क्या? ऐसा सार्वजनिक रूप से अपने धार्मिक प्रतीकों का प्रदर्शन करना सही नहीं है”। एक बार फिर गोपाल जी के चेला चपाटी हास्य के सागर में डूबने लगे। ऐसा लगा मानों स्वयं हास्य देव गोपाल जी के कंठ में विराजमान हो गए हों। एक बात तो है कि गोपाल जी के चेला चपाटी लोग डेडिकेटेड हैं गोपाल जी के प्रति। गोपाल जी छींक भी मार दें तो ऐसा लगता है मानो ड्रॉपलेट्स की जगह ज्ञान प्रवाह हुआ है।

रामप्रसन्न जी गोपाल भाई को बिना कोई उत्तर दिए थोड़ा सा मुस्कुरा के चल दिए।

“देखा बिसम्भर भाई। स्कूटर में हवा कम थी लेकिन फिर भी हमसे चेक नहीं करवाए। जानते हैं काहे”?

बिसम्भर जी कुछ कहते सुनील बीच में ही कूद पड़ा।

“हम जानते हैं काहे। अब्दुल हम शर्मिंदा हैं”।

“अरे लेकिन आप इतना शर्मिंदा काहे होते हैं? और अब्दुल भाई पंडित जी के स्कूटर में हवा कम नहीं थी। वो तो रेडियल टायर हैं, ऐसे ही दिखते हैं”।

चमकू का इतना कहना था कि एक झन्नाटेदार झापड़ चमकू के छोटे दिमाग में बज गया। इस बार गोपाल जी अपने चेला को टॉलरेट नहीं किए।

“कितनी बार बोले हैं कि तर्क न किया करो। हम तुमको बता चुके हैं कि हमारी टोली में तर्क का कोई स्थान नहीं है। हमारे साथ रहा करो तो तर्क वितर्क अपनी अटरिया में धर आया करो। समझे”?

“समझ गए”। चमकू मुँह बनाते हुए बोला।

“लेकिन गोपाल भाई, हम पंडित को इतना टॉलरेट काहे कर रहे हैं? कुछ तो करना पड़ेगा”।

सुनील की बात सुनकर गोपाल जी विचार करने लगे।

शाम को जब पंडित रामप्रसन्न गाँव लौट कर आए तो उनके स्वागत में लोग तख्ती लिए खड़े थे। तख्तियों में लिखा था,

“ये देश चलेगा संविधान से, संविधान से, संविधान से”

“आवाज़ दो कि एक हैं, एक हैं हम एक हैं”

“स्कूटर पर लिखी हुई पहचान नहीं चलेगी चलेगी”

12-13 लोगों के विशाल जनसमूह का नेतृत्व कर रहे थे गोपाल जी, बिशम्भर, अब्दुल मियाँ, सुनील और चमकू।

2-4 किनारे खड़े हुए लोग आपस में खुसर फुसर कर रहे हैं।

“भाई समोसा नहीं आया अभी तक”

“आता होगा, टमाटर पीसने में तनिक देर तो लगती ही है”

“तुम काहे शांत खड़े हो नारा वारा लगाओ तो एनर्जी आए लोगों में”

ये सब देखते हुए रामप्रसन्न जी एक क्षण के लिए रुके किन्तु उनके समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था कि आखिर क्या हो रहा है? कुछ देर वहीं खड़े रहने के बाद रामप्रसन्न जी अपना स्कूटर स्टार्ट किए और चलते बने।

बताते हैं कि समोसा थोड़ा लेट आया था। इसके बाद लोगों में समोसा लेने के लिए लड़ाई हो गई थी। गोपाल जी अधिक मात्रा में समोसा लेने के चक्कर में थे ताकि घर ले जा सकें। इस चक्कर में गोपाल जी पर दो रपेट पड़े। गाँव में तो ये भी चर्चा है कि चमकू हाथ साफ किया है।

 

 

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