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भाग 2 : कलियुग के बैकुंठ का महान उत्सव जहाँ स्वयं देवलोक से देवता आमंत्रित होते हैं।

मंत्रोच्चारण के मध्य "गोविंदा" "गोविंदा" की ध्वनि ब्रह्माण्ड भर में सकारात्मकता का संचार कर देती है। सभी प्रकार के दुखों और कष्टों को त्याग कर जीवन में हर्ष एवं उल्लास भर देने का माध्यम है ब्रह्मोत्सवम।

तिरुपति मंदिर में जब ब्रह्मोत्सवम का आयोजन होता है, ऐसा प्रतीत होता है मानों पूरा तिरुपति देवलोक में परिवर्तित हो चुका है। भगवान श्री वेंकटेश्वर को त्यौहारों से विशेष लगाव है इसी कारण तिरुमाला में प्रत्येक दिवस का प्रत्येक क्षण एक त्यौहार की भांति आनंद देने वाला है। सनातन का यह महान उत्सव स्वरूप संभवतः ही विश्व के किसी भाग में देखने को मिले। ब्रह्मोत्सवम पर आधारित पिछले लेख में अनुष्ठानों से सम्बंधित किंचित विशेष प्रक्रियाओं एवं प्रथाओं का वर्णन किया गया। इस लेख में ब्रह्मोत्सवम के सम्पूर्ण नौ दिनों का विस्तृत वर्णन किया जाएगा।

सर्वप्रथम ब्रह्मोत्सवम के नौ दिनों के कार्यक्रमों को तालिका के रूप में संक्षेप में बताया जा रहा है।

दिवस प्रातःकाल संध्याकाल
प्रथम ध्वजारोहणं पेद्दाशेषवाहनं
द्वितीय चिन्नाशेषवाहनं हंसवाहनं
तृतीय सिंहवाहनं मुत्यपुपंदिरि वाहनं
चतुर्थ कल्पवृक्षवाहनं सर्वभूपाल वाहनं
पंचम मोहिनीअवतारं गरुण सेवा
षष्टम हनुमंतवाहनं स्वर्णरथम, गजवाहनं
सप्तम सूर्यप्रभावाहनं चन्द्रप्रभावाहनं
अष्टम रथोत्सवं अश्ववाहनं
नवम पालकी उत्सवं

चक्रस्नानं

स्वर्ण तिरुचि उत्सवं

ध्वज अवरोहणं

ब्रह्मोत्सवम, प्रथम दिवस :

1st D- Pedda sesha vahanam

सर्वप्रथम श्रीवारि आलय ध्वज स्तम्भ के समीप गरुड़ध्वज स्थापित किया जाता है। रात्रि में लगभग 11:00 के समय भगवान की दिव्य शोभायात्रा का आयोजन होता है, जिसका समापन मध्यरात्रि में होता है। श्री वेंकटेश्वर पेद्दा शेषवाहन में विराजित होकर तिरुमाला मंदिर के आसपास चार गलियों में यात्रा में निकलते हैं। पेद्दा शेषवाहन, आदिशेष अर्थात शेषनाग के रूप का एक वाहन है।

ब्रह्मोत्सवम, द्वितीय दिवस :

प्रातः काल भगवान चिन्ना शेषवाहन पर सवार होकर पुनः मंदिर के चारों ओर यात्रा के लिए निकलते हैं। संध्याकाल में श्रीनिवास को उंजाल सेवा के लिए उयल मंडपम तक हंसवाहन में ले जाया जाता है।

ब्रह्मोत्सवम, तृतीय दिवस :

3rdD Simha Vahanam

उत्सव के तृतीय दिवस पर भगवान की शोभायात्रा सिंहवाहन में नगर भ्रमण में निकलती है। सिंह शक्ति एवं साहस का प्रतीक है। हिरण्यकश्यप के वध के लिए नारायण ने नरसिंह अवतार लिया था। यही कारण है कि श्री वेंकटेश्वर तृतीय दिवस पर सिंह वाहन का चयन करते हैं।

संध्या समय में भगवान पुनः उंजाल सेवा के लिए मुत्यपु पंदिरि वाहन में सवार होकर  जाते हैं। मुत्यपु का अर्थ है मोती जो शुद्धता एवं सम्पन्नता का प्रतीक है।

ब्रह्मोत्सवम, चतुर्थ दिवस :

4thD Kalpa Vruksha Vahanam

इस महान उत्सव के चौथे दिवस प्रातः काल में भगवान कल्पवृक्ष वाहन में शोभायात्रा के लिए निकलते हैं। कल्पवृक्ष वाहन, भगवान द्वारा अपने भक्तों को वरदान देने और उनकी इच्छाओं की पूर्ति करने की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करता है।

सायंकाल में प्रभु गोविंदा पुनः उंजाल सेवा के लिए जाते हैं जिसके लिए सर्वभूपाल वाहन का प्रयोग किया जाता है। सर्वभूपाल का अर्थ है, सम्पूर्ण पृथ्वी के स्वामी।

ब्रह्मोत्सवम, पंचम दिवस :

यह ब्रह्मोत्सवम का सबसे महत्वपूर्ण दिवस है। इस दिवस  मोहिनी अवतारोत्सवम कहा जाता है। देव और दानवों के द्वारा किए गए क्षीरसागर मंथन के विषय में हम सभी जानते हैं। इस मंथन से कई पवित्र और दिव्य रत्नों की प्राप्ति हुई जिनमें से अमृत भी था। इसी अमृत की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार लिया।

मोहिनी अवतारोत्सवम में भगवान को मोहिनी के रूप में सजाया जाता है एवं उनकी शोभायात्रा पालकी में निकलती है जहाँ भगवान श्री कृष्ण भी उनके साथ होते हैं।

संध्याकाल में भगवान को महाकान्ति एवं सहस्त्रमाला से अलंकारित किया जाता है। उंजाल सेवा के पश्चात श्रीनिवास सपत्नीक गरुण वाहन में विराजमान होते हैं। पुराणों के अनुसार पक्षीराज गरुण वेदों के प्रतीक हैं साथ ही वैष्णव पुराण में गरुड़ को नारायण का प्रथम भक्त कहा गया है। यही कारण है कि ब्रह्मोत्सवम के सबसे महत्वपूर्ण दिवस पर भगवान गरुड़ वाहन पर विराजमान होते हैं।

ब्रह्मोत्सवम, षष्ठम दिवस :

6thD Gaja VahanamHanumat Vahanam

इस दिवस भगवान अत्यंत सुन्दर हनुमत वाहन पर विराजमान होकर शोभायात्रा के लिए जाते हैं। हनुमान जी भगवान विष्णु के अनन्य भक्त हैं। उनके श्री राम अवतार के समय में हनुमान जी ने उनकी अटूट सेवा की। इस दिन उंजाल सेवा नहीं होती अपितु वसंतोत्सव का आयोजन किया जाता है। जिसमें भगवान स्वर्ण रथ पर विराजित होते हैं। रात्रि में श्री वेंकटेश्वर गज वाहन पर विराजित हो नगर की शोभायात्रा में निकलते हैं। गज अर्थात हाथी, सभी प्रकार के ऐश्वर्य का प्रतीक है। भगवान विष्णु ने एक विशाल मगरमच्छ से गजेंद्र की रक्षा की थी।

ब्रह्मोत्सवम, सप्तम दिवस :

7thD Chandra Prabha Vahanam

ब्रह्मोत्सवम के सप्तम दिवस में भगवान नारायण सूर्यप्रभा वाहन की सवारी करते हैं। भगवान विष्णु स्वयं इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की ऊर्जा का केंद्र हैं। सूर्य उन्ही सवित्र मंडल मध्यवर्ती भगवान विष्णु का ही एक रूप हैं।

उसी दिन संध्याकाल में भगवान उंजाल सेवा के पश्चात चंद्राकार चन्द्रप्रभा वाहन की सवारी करते हैं। चन्द्रमा शीतलता और स्वास्थ्य का प्रतीक है अतः भगवान की चन्द्रप्रभा वाहन की सवारी को देखने के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।

ब्रह्मोत्सवम, अष्टम दिवस :

8thDRathotsavam

ब्रह्मोत्सवम के अष्टम दिवस पर श्री वेंकटेश्वर रथ पर विराजित होते हैं और शोभायात्रा के लिए जाते हैं। रथ पर भगवान श्रीनिवास सपत्नीक, द्वारका के राजा श्रीकृष्ण और चार अश्वों शैब्यं, सुग्रीवं, मेघपुष्पं (चौथे अश्व का उचित नाम ज्ञात नहीं हो पाया है) के साथ अलंकारित किए जाते हैं। इस रथ को भक्त खींचते हैं। रथोत्सवम में भाग ले कर श्री वेंकटेश्वर की सेवा करने वाले मनुष्य पुनर्जन्म के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।

रात्रि में उंजाल सेवा के पश्चात भगवान को अश्ववाहन में विराजित किया जाता है। अश्व ऊर्जा का द्योतक है अर्थात भगवान अपने भक्तों की ऊर्जा को बनाए रखने के लिए अश्ववाहन में नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं।

ब्रह्मोत्सवम, नवम एवं अंतिम दिवस :

9thD Chakrasnanam

ब्रह्मोत्सवम का अंतिम दिवस पालकी सेवा एवं चक्रस्नानं का होता है। इस दौरान भगवान को सपत्नीक तेल, हल्दी और चन्दन जैसी अन्य औषधियों का लेप लगाया जाता है। उसके पश्चात चूर्णाभिषेकम प्रक्रिया संपन्न होती है। श्रीसुदर्शन चक्र को स्वामी पुष्करिणी में स्नान कराया जाता है। इसके पश्चात संध्याकाल में गरुड़ ध्वज को स्तम्भ से नीचे उतारा जाता है। यह प्रक्रिया ध्वज अवरोहणं कहलाती है।

इसी अनुष्ठान के साथ नौ दिवसीय ब्रह्मोत्सवम का समापन होता है।

यदि कोई व्यक्ति भारतीय सनातन के उत्सव स्वरूप को जानना चाहता है तो उसे तिरुमाला के बालाजी मंदिर के ब्रह्मोत्सवम में अवश्य सम्मिलित होना चाहिए। यह पृथ्वी का एक ऐसा उत्सव है जब पृथ्वीवासी देवलोक के आगंतुकों का स्वागत सत्कार करते हैं। ब्रह्मोत्सवम सम्पन्नता, उत्साह, कर्मकांड और पौराणिक अनुष्ठानों का एक प्रत्यक्ष दिव्यलोक है। मंत्रोच्चारण के मध्य “गोविंदा” “गोविंदा” की ध्वनि ब्रह्माण्ड भर में सकारात्मकता का संचार कर देती है। सभी प्रकार के दुखों और कष्टों को त्याग कर जीवन में हर्ष एवं उल्लास भर देने का माध्यम है ब्रह्मोत्सवम।

ब्रह्मोत्सवम का कोई इतिहास नहीं है। जिस रूप में ब्रह्मा जी ने इसका शुभारंभ किया था, आज भी यह तिरुमाला के विशाल मंदिर प्रांगण में उसी रूप में संपन्न होता है।

इस वर्ष कोरोना वायरस के कारण व्यवस्थाएं किस प्रकार की जाएंगी यह तो ज्ञात नहीं है किन्तु जीवन में जब भी अवसर मिले सनातन की इस अमूर्त धरोहर के दर्शनों के लिए तिरुपति मंदिर अवश्य जाएं और ब्रह्मोत्सवम में सम्मिलित हों।

गोविंदा………गोविंदा।  

स्त्रोत : साभार तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम।   

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