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भाग 1 : कलियुग के बैकुंठ का महान उत्सव जहाँ स्वयं देवलोक से देवता आमंत्रित होते हैं।

ब्रह्मोत्सवम का आयोजन वार्षिक तौर पर होता है। तिरुमाला मंदिर में ब्रह्मोत्सवम का शुभारंभ स्वयं सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने किया था। तब से यह आयोजन वार्षिक तौर पर होता आया है।

कलियुग का बैकुंठ है तिरुमाला मंदिर जहाँ विराजमान हैं पूरे ब्रह्माण्ड के पालनहार भगवान वेंकटेश्वर। तिरुपति बालाजी मंदिर जिस तिरुमाला पर्वत पर स्थित है वह शेषाचलम पर्वत श्रृंखला का एक भाग है। तिरुमाला पर्वत में सात पर्वत चोटियां हैं जिन्हें आदिशेष अर्थात शेषनाग के सात सिरों के रूप में माना जाता है। मुख्य मंदिर इन पर्वत श्रृंखलाओं की सातवीं चोटी वेंकटाद्रि पर स्थित है। भगवान वेंकटेश्वर को बालाजी, गोविंदा और श्रीनिवास जैसे नामों से पुकारा जाता है। कलियुग के संताप से पृथ्वी की रक्षा करने हेतु भगवान विष्णु ने वेंकटेश्वर का रूप लिया है जो कि तिरुपति में स्थित हैं। वेंकटेश्वर, भगवान विष्णु के साक्षात स्वरुप हैं इसी कारण उन्हें कलियुग का प्रत्यक्ष देव कहा जाता है।

वैसे तो तिरुमाला में प्रत्येक दिवस एक त्यौहार की भाँति होता है किन्तु कई ऐसे पर्व हैं जिनका सनातन में सर्वाधिक महत्व है। तिरुपति बालाजी मंदिर में मनाया जाने वाला ऐसा ही एक पर्व है ब्रह्मोत्सवम जो भारत ही नहीं अपितु पूरे विश्व भर में प्रसिद्ध है। वैसे तो पूरे तिरुपति बालाजी मंदिर का इतिहास आनंददायी एवं रोचक किन्तु उसकी चर्चा अन्य लेख में की जाएगी। यह लेख तिरुपति मंदिर के प्रमुख त्यौहार ब्रह्मोत्सवम को समर्पित है।

ब्रह्मोत्सवम का आयोजन वार्षिक तौर पर होता है। तिरुमाला मंदिर में ब्रह्मोत्सवम का शुभारंभ स्वयं सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने किया था। तब से यह आयोजन वार्षिक तौर पर होता आया है। ब्रह्मोत्सवम नौ दिनों तक चलने वाला उत्सव है। यह उत्सव तब मनाया जाता है जब कन्या राशि में सूर्य का आगमन होता है। ऐसा समय सितम्बर के अंत में एवं अक्टूबर मास के प्रारम्भ में आता है। इस उत्सव के दौरान कई प्रकार की प्रक्रियाएं संपन्न होती हैं।

ब्रह्मोत्सवम की इन प्रक्रियायों में श्री मलयप्पा, भगवान वेंकटेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में भाग लेते हैं। वास्तव में भगवान वेंकटेश्वर ही मलयप्पा हैं जो सभी प्रकार के उत्सवों में पूजे जाते हैं। गर्भ गृह में स्थापित भगवान वेंकटेश्वर की प्रतिमा स्थायी है जो गर्भ गृह से बाहर नहीं निकलती है। यही कारण है कि गर्भ गृह के बाहर उत्सवों में जो मूर्ति सभी प्रक्रियाओं में इष्टदेव के रूप में पूजी जाती है वह मलयप्पा की है। कहा जाता है कि श्री मलयप्पा की मूर्ति स्वयंभू है अर्थात जो स्वयं भगवान वेंकटेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में प्रकट हुई है। ब्रह्मोत्सवम में श्री मलयप्पा, देवियों श्रीदेवी एवं भूदेवी के साथ विभिन्न वाहनों में तिरुमाला मंदिर के आसपास विभिन्न गलियों में भ्रमण करते हैं और श्रद्धालुओं के साथ उत्सव में भाग लेते हैं।

ब्रह्मोत्सवम की विभिन्न प्रक्रियाओं का वर्णन आगे विस्तार से किया जा रहा है।
आलय शुद्धि :

ब्रह्मोत्सवम प्रारम्भ होने से पूर्व भगवान श्री वेंकटेश्वर के पूरे मंदिर को पौराणिक ग्रंथों में वर्णित नियमों एवं प्रक्रियाओं के अनुसार स्वच्छ किया जाता है। हालाँकि मंदिर स्वच्छ तो होता है किन्तु यह एक विशेष प्रक्रिया है। मंदिर को स्वच्छ किये जाने के पश्चात अलंकारम प्रक्रिया के अंतर्गत भगवान श्री वेंकटेश्वर और पूरे मंदिर परिसर को विभिन्न पुष्पों एवं आम की पत्तियों से सजाया जाता है।
मृत्तसंग्रहणं :

यह माता पृथ्वी की आराधना की एक प्रक्रिया है जो ब्रह्मोत्सवम के आरम्भ से निश्चित एक दिवस पूर्व पूर्ण की जाती है। इस प्रक्रिया के पहले मंदिर के पुरोहित विश्वकसेना, अनंत, सुदर्शन एवं गरुण की पूजा करते हैं। माता पृथ्वी से प्रार्थना करके कुछ मात्रा में मृत्तिका अर्थात मृदा एकत्रित की जाती है। इसी मृदा से अंकुरार्पणम की प्रथा पूर्ण होती है जिसमें इस मृदा को एक कक्ष में फैलाया जाता है एवं उसमे नौ प्रकार के अनाजों को बोया जाता है।
ध्वजारोहणं एवं देवतावनम :

इस अनुष्ठान के साथ नौ दिवसीय ब्रह्मोत्सवम का शुभारम्भ होता है। मंदिर प्रांगण में ध्वजस्तंभम में मंदिर के पुरोहित वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करते हुए एक ध्वज स्थापित करते हैं जिनमें गरुण प्रतीक चिन्ह के रूप में अंकित होते हैं। इस अनुष्ठान के पश्चात गरुण ब्रह्मा, इन्द्र, यम, अग्नि, कुबेर एवं वायुदेव जैसे देवों एवं वशिष्ठ तथा विश्वामित्र जैसे महान ऋषियों को आमंत्रित करने देवलोक जाते हैं।
वाहन सेवा :

इस प्रक्रिया में भगवान तिरुमला मंदिर के आसपास की गलियों में विभिन्न वाहनों में ले जाए जाते हैं। इन वाहनों का विशेष महत्व एवं तादात्म्य है।
स्नापनं :

इस अनुष्ठान में भगवान को औषधियों से युक्त जल से स्नान कराया जाता है जिससे उनकी शोभायात्रा की थकान दूर होती है।
श्रीवारी कोलुवु :

नगर की शोभायात्रा के पश्चात भगवान मंदिर प्रांगण में विराजित होते हैं जहाँ पुरोहितों के द्वारा उन्हें नैवेद्य का अर्पण किया जाता है।
चूर्णाभिषेकं :

इस अनुष्ठान में भगवान को सपत्नीक चन्दन का लेप लगाया जाता है और उसके बाद स्नान कराया जाता है। यह प्रक्रिया ब्रह्मोत्सवम के नौवें दिन प्रातः पूर्ण की जाती है पश्चात भगवान नगर की यात्रा के लिए निकलते हैं। मंदिर के पुरोहित चन्दन के चूर्ण को भक्तों में बाँटते हैं। यह चन्दन अत्यंत पवित्र माना जाता है।
चक्रस्नानं :

ब्रह्मोत्सवम के अंतिम दिवस में प्रातः यज्ञ के पश्चात भगवान सपत्नीक एवं श्रीसुदर्शनचक्र के साथ स्वामी पुष्करिणी में स्नान करते हैं। श्रद्धालु भी श्री पुष्करिणी में स्नान कर सकते हैं। यह अत्यंत पवित्र अनुष्ठान है जो सभी के कल्याण हेतु किया जाता है।
देवतोद्वासनम :

ब्रह्मोत्सवम के अंतिम दिवस पर समस्त ऋषियों और देवों को पुनः देवलोक की ओर विदा किया जाता है। इस प्रकार के महान उत्सव का शुभारंभ करने के लिए ब्रह्मा जी का सम्मान पुरोहितों द्वारा किया जाता है।
ध्वज अवरोहणं :

ब्रह्मोत्सवम के अंतिम दिवस की संध्या को गरुड़ ध्वज को पुनः उतारा जाता है। इस अनुष्ठान के पश्चात ब्रह्मोत्सवम का समापन होता है।

उपरोक्त वर्णित अनुष्ठान ब्रह्मोत्सवम की कुछ प्रक्रियाएं हैं। इस लेख के दूसरे भाग में हम आपको पूरे ब्रह्मोत्सवम के विषय में विस्तार से बताएंगे। भारत में एक ऐसा स्थान है जहाँ स्वयं भगवान विष्णु निवास करते हैं और ब्रह्मोत्सवम उन्ही नारायण समर्पित एक उत्सव है। लेख का दूसरा भाग और भी अधिक रोचक और ज्ञानपूर्ण है।

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