Interpretation

समय, संगीत और मानव संवेदनाएँ।

समय चाहे कितना भी बदल जाए, धरती ग्लोबल वार्मिंग से आइस ऐज की तरफ ही क्यों न खिसक जाए, लेकिन न तो हमारा संगीत बदलेगा न ही हमारी संवेदनाएं।

युगों युगों से मानव संवेदनाएँ अस्तित्व में हैं। समयचक्र बदल सकता है, पर्यावरण बदल सकता है किन्तु संवेदनाएँ अपरिवर्तित रूप में बनी हुईं मानव को क्रियाशील बनाती हैं। संगीत भी इसमें सहायक की भूमिका में है। काल गणना में ग्रह और नक्षत्रों का विशेष योगदान है। किन्तु आश्चर्यजनक रूप से ये नक्षत्र संगीत के सुरों से भी सम्बंधित हैं।

अनंत काल से मानव शरीर भूलोक और ब्रह्माण्ड के मध्य सम्बन्ध स्थापित करने का एक असामान्य साधन रहा है। शिव ने भी “काशी” का निर्माण इसी लक्ष्य की प्राप्ति हेतु किया था। कहा जाता है कि काशी की संरचना एक विशाल मानव शरीर के समान की गई है। “शिव” और “शक्ति” काल के द्योतक हैं और ताल के भी। भारतीय संगीत ग्रंथों के अनुसार ताल शब्द में “ता” शिव है तो “ल” शक्ति। संन्यास के विपरीत जीवन काल का जो गृहस्थ खंड होता है उसके अनुसार मानव शरीर की द्वैत प्रकृति होती है और वह “अर्धनारीश्वर” रूप में होता है। ताल शब्द स्वयं एक अर्द्धनारीश्वर रूप प्रदर्शित करता है। संगीत में काल अर्थात समय चक्र का विशेष महत्व है और इसी समयचक्र को ताल के द्वारा भली प्रकार से लयबद्ध किया जा सकता है। जब समयचक्र और ताल “सम्यक” हो जाएँ तो ही मानव संवेदनाएं शब्दों के रूप में संगीतबद्ध की जा सकती हैं।

जिस प्रकार ताल का भेद किया जा सकता है उसी प्रकार से राग में भी भेद हैं। राग “स्वर” और “भाव” से सम्बंधित है। राग को “दिवस” और “रात्रि” में अलग प्रकार से गाया जाता है। राग “ऋतुओं” में भी अलग प्रकार से गाया जाता है । दिवस और रात्रि को कई प्रहरों में विभाजित कर दिया जाता है। ये संख्या में “आठ” होते हैं और विभिन्न रागों से सम्बंधित होते हैं। उदाहरण के लिए “राग भैरव” प्रातःकाल में, “राग देस” रात्रि के द्वितीय प्रहर में, “राग श्री” सूर्यास्त काल में गाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त ये राग मानव मन की अनुपम अवस्थाओं पर आधारित होते हैं। “राग”, संवेदनाओं का स्पष्ट एवं लयबद्ध प्रतिबिम्ब है। वर्षा के रोमांच को प्रदर्शित करते हुए “राग मल्हार” को गाया जाता है। “राग वागश्री” के द्वारा एक स्त्री के उस भाव को प्रकट किया जाता है जो वह अपने प्रेमी से मिलन होने पर प्रदर्शित करती है। अपनी मातृभूमि और देश के प्रति प्रेम को “राग देस” के द्वारा दर्शाया जाता है। शिव और शक्ति के समान राग भी “रागिनी” से जुड़ा है जो कोमलता, सुंदरता, चंचलता और मातृत्व से परिपूर्ण है।

संगीत के “सुर” भी इसी प्रकार विभिन्न “ग्रहों” से जुड़े हैं। भारतीय काल गणना के अनुसार नक्षत्र और ग्रहों की गति, समय और उसकी दशा का निर्धारण करती है। इसी सम्बन्ध में विभिन्न ऋतुओं और प्रहरों में ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति के कारण सुर प्रभावी होते हैं तथा रागों की स्वच्छंदता का कारण बनते हैं। संगीत में आरोह, अवरोह और विराम आदि की स्थिति तभी सुनिश्चित हो सकती है जब “ताल” सुस्पष्ट हो और समयचक्र की “आवृत्ति” को भली प्रकार से निर्धारित करती हो।

वस्तुतः समय संगीत और मानव की संवेदनाओं का सम्बन्ध सुस्पष्ट है। भारतीय संगीत इन तीनों का एक अनुपम मिश्रण है। भारतीय मूल्य और संवेदनाएं शब्दों में जब भी व्यक्त होती हैं उनका स्वरुप रागों और सुरों में अधिकतर देखा जा सकता है। पश्चिम की तरह हमारा संगीत क्रूर और निराशावादी नहीं है। भाव चाहे कैसा भी हो भारतीय मूल्य संरक्षित ही रहते हैं। “लोकगीतों” का भी सूक्ष्मता से अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि उनके मूल में “सामयिक” संवेदनाएं अंकुरित होती रहती हैं। कुछ गीत “आराध्य देव” को समर्पित होते हैं तो कुछ का गायन “पौधरोपण” और “फसलों की कटाई” के दौरान होता है। भारतीय लोकगीतों का सम्बन्ध प्रकृति और लोक उत्सवों से होता है। “पूर्वोत्तर” के अधिकतर लोकगीत तथा नृत्य प्राकृतिक घटनाओं पर आधारित हैं जबकि उत्तर भारत के लोकगीतों की प्रेरणा “रामायण” कालीन घटनाएं हैं।

भारतीय दर्शन हमें स्वीकार करना सिखाता है। ये नियम आज से नहीं युगों से चला आया है। जीवन के प्रत्येक कालखंड में हम अपने मूल्यों पर ही निर्भर करते हैं और इनके लिए हमारी संवेदनाएं एक समान रहती हैं। भारतीय संगीत इन्ही मूल्यों से सुशोभित है। यही संवेदनाएँ उसके सुरों में प्रवाहित होती हैं। समय चाहे कितना भी बदल जाए, धरती ग्लोबल वार्मिंग से आइस ऐज की तरफ ही क्यों न खिसक जाए, लेकिन न तो हमारा संगीत बदलेगा न ही हमारी संवेदनाएं। हां यदि पूरा ब्रह्माण्ड बदल जाए और ग्रह, नक्षत्र अपनी गति और दिशा बदल दें तो हमारे सुर, राग अपना स्वरुप बदल सकते हैं लेकिन उनका मूल नहीं बदलेगा क्योंकि “भारतीय सनातन अमर” है।

जय श्री राम।।

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