Temple

एक रात में एक ही पत्थर से बनने वाला आलौकिक शिव मंदिर जिसका निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने किया।

राग भारत के मंदिरों की इस कड़ी में हम मध्य प्रदेश के रीवा जिले में स्थित एक ऐसे शिव मंदिर के बारे में जानेंगे जो एक रात में निर्मित हुआ था और जिसे स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने बनाया था।

भारतवर्ष आस्था एवं अटूट विश्वास की भूमि है। कहते हैं न कि यहां कण कण में भगवान का निवास है। सनातन धर्म की विशेषता ही यही है कि हम कण कण में भगवान ढूंढ भी लेते हैं। हमारे पूर्वज उपहारस्वरूप हमें महान परम्पराएं, ग्रन्थ, ज्ञान-विज्ञान के भण्डार और भौतिक अभौतिक दर्शन की अमूल्य पूँजी प्रदान कर गए हैं। इन सबकी रक्षा करना हमारा कर्त्तव्य है।

इन्ही अमूल्य उपहारों में प्रमुख हैं हमारे मंदिर और देवस्थल। भारतवर्ष ही नहीं समूचे विश्व में सनातन धर्म के अस्तित्व के प्रमाण हैं ये मंदिर। दक्षिण-पूर्वी एशिया में तो आज भी हिन्दू मंदिर उसी रूप में उपस्थित हैं जिस रूप में उनका निर्माण किया गया था। किन्तु विश्व के कई अन्य भागों में ये मंदिर भूमि के नीचे दबे हुए अपने अस्तित्व की गाथा कहते हैं। हमें अपने पूर्वजों का आभारी होना चाहिए जिन्होंने सनातन को जीवित रखने के लिए भारतवर्ष की इस देवभूमि में सहस्त्रों देवस्थानों का निर्माण कराया। कई शताब्दियों तक भारत मुस्लिम आक्रांताओं के शासनकाल की बेड़ियों में जकड़ा रहा जिन्होंने भारत भूमि से सनातन के विलोप के लिए कई प्रयत्न किए। इन प्रयत्नों में देवस्थानों को नष्ट करना प्रमुख रूप से सम्मिलित है। इन कट्टरपंथियों की क्रूरता के बाद भी हमारे पूर्वज सनातन की इस अमूल्य विरासत को सुरक्षित रख पाने में सफल हुए। हालाँकि हमें अयोध्या, काशी और मथुरा जैसे धर्मस्थल गंवाने पड़े किन्तु समय के साथ ये हमें पुनः प्राप्त हो रहे हैं।

आज भारत के कोने कोने में मंदिर बने हुए हैं। कई आकर में छोटे हैं तो कई मंदिर विशाल हैं। कई मंदिरों की वास्तुकला महान है तो कुछ मंदिर साधारण रूप में निर्मित किए गए हैं। इन सब विविधताओं के उपरांत भी कुछ ऐसा है जो इन देवस्थानों में समान है और वह है ऐतिहासिक महत्व। हमारे आसपास किसी पीपल या वटवृक्ष के नीचे भी कोई मंदिर होगा तो उसका भी कोई न कोई इतिहास अवश्य होगा। यही इतिहास तो हमारी भक्ति का मूल आधार है। सनातन इन्ही मंदिरों और देवस्थानों के कारण आज भी आमजनों की आत्मा से जुड़ा हुआ है।

रागभारत के माध्यम से हमने निश्चय किया था कि हमारे जिलों में उपस्थित देवस्थानों की दिव्य गाथा को लोगों सामने लेकर आएंगे जिससे हम सब एक दूसरे की साझी विरासत से परिचित हो सकें। राग भारत के मंदिरों की इस कड़ी में हम मध्य प्रदेश के रीवा जिले में स्थित एक ऐसे शिव मंदिर के बारे में जानेंगे जो एक रात में निर्मित हुआ था और जिसे स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने बनाया था।

भगवान शिव के परम भक्तों में से एक हैं महर्षि मार्कण्डेय। महर्षि को भगवान शिव से ही अमरता का वरदान प्राप्त हुआ। कथा कुछ ऐसी है कि ऋषि मर्कण्डु और उनकी भार्या ने संतान प्राप्ति के लिए भगवान चंद्रमौलि की आराधना की जिससे प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें एक विलक्षण प्रतिभा से संपन्न पुत्र रत्न का आशीर्वाद दिया। महर्षि मार्कण्डेय जन्म से ही शिवभक्त थे। भगवान के प्रति अपनी इसी निष्ठा के कारण उन्होंने भारत भर में कई स्थानों पर भगवान शिव के स्वरूप को स्थापित किया। रीवा जिले के देवतालाब नामक स्थान में पवित्र शिव मंदिर की स्थापना के पीछे महर्षि मार्कण्डेय का ही योगदान है।

महर्षि भारतवर्ष में सनातन और शिव भक्ति के प्रचार प्रसार के लिए भ्रमण किया करते थे। उनकी इसी यात्रा के मध्य उनका आगमन विंध्य क्षेत्र के रेवा नामक स्थान में हुआ जो वर्तमान में रीवा के नाम से जाना जाता है। रीवा में देवतालाब नामक स्थान पर जब महर्षि ने विश्राम के लिए अपना डेरा जमाया तब अनायास ही उनके मन में भगवान शिव के दर्शन की अभिलाषा जाग उठी। महर्षि ठहरे शिव भक्त तो उन्होंने अपने आराध्य से कह दिया कि चाहे जिस रूप में दर्शन मिलें किन्तु दर्शन मिलने तक वे यहीं तप करते रहेंगे। कई दिनों तक महर्षि मार्कण्डेय देवतालाब में तप करते रहे। उनके तप की तीव्रता को देखकर भगवान शिव ने विश्वकर्मा जी को आदेश दिया कि वो उस स्थान पर एक शिव मंदिर का निर्माण करें। भगवान विश्वकर्मा जी ने एक विशालकाय पत्थर से रातों रात उस स्थान पर शिव मंदिर का निर्माण कर दिया और चुपचाप वहां से चले गए। तपस्या में लीन महर्षि मार्कण्डेय को इस पूरी घटना का किंचित मात्र भी आभास नहीं हुआ। मंदिर बन जाने के पश्चात भगवान शिव की मानस प्रेरणा से महर्षि ने अपना तप समाप्त किया। शिव मंदिर देखकर महर्षि अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने वहां स्थित कुंड में स्नान करके भगवान शिव की आराधना की। तभी से यह मंदिर पूरे विंध्य प्रदेश में पूज्य है। पूर्वी मध्यप्रदेश में एक मान्यता है कि चार धाम की यात्रा तभी सम्पूर्ण एवं सफल मानी जाती है जब गंगोत्री का जल रामेश्वरम स्थित शिवलिंग के साथ देवतालाब स्थित शिवलिंग पर भी अर्पित किया जाए। इसी कारण तीर्थों की यात्रा पूर्ण करने के पश्चात कई लोग गंगोत्री का जल लेकर देवतालाब आते हैं और अपनी तीर्थ यात्रा को सफल बनाते हैं। इस क्षेत्र में उपस्थित कई पवित्र जल कुंडों के कारण इस क्षेत्र का नाम देवतालाब हुआ।

देवतालाब, रीवा रेलवे स्टेशन से मिर्जापुर मार्ग पर लगभग 60 किमी की दूरी पर स्थित है। सड़क मार्ग से यहां तक पहुँचने में किसी प्रकार की कोई कठिनाई नहीं है। यदि आप रीवा के निवासी हैं तो भगवान शिव के दर्शनों के लिए जाते रहें इससे हमारे इस दिव्य क्षेत्र के आसपास पर्यटन एवं आर्थिक गतिविधियों का विकास होगा। यदि आप अन्य राज्यों अथवा जिलों के निवासी हैं तो एक बार देवतालाब अवश्य पधारें।

वाराणसी से मिर्जापुर होते हुए जबलपुर जाने वाले यात्रियों के लिए देवतालाब स्थित भगवान शिव के दर्शन सुलभ हो सकते हैं क्योंकि यह मंदिर मुख्यमार्ग में ही स्थित है।

भारत के सभी तीर्थस्थलों का महत्व अपने आप में अद्वितीय है किन्तु हमें अपने स्थानीय तीर्थों को भी उतना ही महत्व प्रदान करना चाहिए जितना हम बड़े तीर्थों को प्रदान करते हैं। अपने पूर्वजों के प्रति हमारी यही निष्ठापूर्ण श्रद्धांजलि होगी कि हम उनके द्वारा स्थापित किए गए धर्मस्थलों के अस्तित्व को बचाए रखें।

हर हर महादेव।।            

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