धर्म Interpretation

भारतवर्ष के इतिहास का ऐसा हिन्दू शासक जिसे स्वर्णमयी शासनकाल के बाद भी इतिहास के स्मृति पटल से मिटा दिया गया और मात्र इसलिए कि वह ब्राह्मण था।

भारतवर्ष के इस महान शासक को इतिहास में मुगलों के दसवें हिस्से के बराबर भी स्थान नहीं दिया गया। उसका अपराध इतना ही था कि वह एक ब्राह्मण था और उसने भारतवर्ष में क्षीण हो रहे सनातन धर्म की पुनर्स्थापना का स्वप्न देखा। 

इतिहास कभी मिथ्या नहीं हो सकता। इतिहास तो स्वयं एक अटल सत्य है जो काल चक्र के किसी पहलू में अंकित हो चुका है। किन्तु इतिहास को मिथ्या बनाया जाता है। इतिहास के तथ्य मर्दन का कार्य करते हैं वामपंथी इतिहासकार और शिक्षाविद। भारत की सदैव ही यही समस्या रही कि यहाँ इतिहास के व्याख्याकारों में सभी प्रभावी विद्वान वामपंथी थे। इन्होने इतिहास को ऐसे प्रदर्शित करने का प्रयास किया जिससे पूरा भारतीय इतिहास जातिवाद और सामाजिक कुरीतियों से परिपूर्ण प्रतीत हो। वास्तव में अंग्रेजों के समय से ही भारतीय इतिहास को तोड़ने मरोड़ने का कार्य संस्थागत रूप से प्रारम्भ हो चुका था जो स्वतंत्रता के पश्चात भी अनवरत चलता रहा। मुगल काल में भी भारतवर्ष के महान इतिहास को कलंकित करने का कार्य प्रारम्भ हुआ किन्तु मुगल इतने योग्य नहीं थे जो भारतीय सनातन का महात्म्य समझ पाएं। उनके इस प्रयास को नमन करते हुए आधुनिक भारत के इतिहासकारों ने इन क्रूर मुगलों को इतिहास में एक श्रेष्ठ स्थान प्रदान किया है जिसे हम आज भी ढ़ो रहे हैं।

वामपंथी इतिहासकारों एवं बुद्धिजीवियों की एक साझा समस्या रही कि इन्हे ब्राह्मण से अथाह घृणा थी। ब्राह्मण शब्द सुनकर ही ये बुद्धिजीवी ऐसे विचलित हो जाते हैं जैसे नेवले को देखकर सर्प। ब्राह्मण घृणा का ही परिणाम है भारतवर्ष के एक महान शासक का चरित्रहरण, एक ऐसा शासक जिसने अखंड भारत के स्वप्न को पूर्ण करने के लिए न जाने कितने प्रयास किए और भारतवर्ष की अखंडता की सुरक्षा के लिए कितने ही युद्ध किए। भारतवर्ष के इस महान शासक को इतिहास में मुगलों के दसवें हिस्से के बराबर भी स्थान नहीं दिया गया। उसका अपराध इतना ही था कि वह एक ब्राह्मण था और उसने भारतवर्ष में क्षीण हो रहे सनातन धर्म की पुनर्स्थापना का स्वप्न देखा।

यह शासक था पुष्यमित्र शुंग जिसने शुंग वंश की स्थापना की थी। इस लेख में हम उन मिथ्या तथ्यों और सूचनाओं पर विचार करेंगे जिनके आधार पर पुष्यमित्र को नरसंहारक और कट्टर कहा गया।

मौर्य वंश की दुर्बलता, भारतवर्ष पर बढ़ता संकट और पुष्यमित्र का उदय :

जिस अखंड भारत की कल्पना आचार्य चाणक्य ने की थी, उनकी मृत्यु के बाद वह परिकल्पना धुंधली होने लगी। मौर्य वंश के शासक वैदिक धर्म के प्रति उदासीन होने लगे। चन्द्रगुप्त मौर्य, जैन धर्म का अनुयायी हो गया था। चन्द्रगुप्त के पुत्र बिन्दुसार ने स्वयं आजीविक सम्प्रदाय से अपनी दीक्षा ली। इसके बाद बिन्दुसार का पुत्र अशोक राजगद्दी पर विराजमान हुआ। भयंकर हिंसा करके अपने साम्राज्य का विस्तार करने वाला सम्राट अशोक अहिंसक हो गया। उसने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। इसके बाद अशोक का पूरा जीवनकाल बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में व्यतीत हुआ। जब पूरा विश्व सीमा विस्तार के संकट से जूझ रहा था तब अशोक की अहिंसा ने भारतवर्ष की वीरता पर गहरा आघात किया। अशोक ने 20 वर्षों तक एक बौद्ध सम्राट के रूप में शासन किया। इसी कारण पूरे भारतवर्ष का शासनतंत्र निर्बलता की भेंट चढ़ गया। मौर्य वंश के शासकों का दूसरे पंथों की ओर झुकाव गलत नहीं था। यह उनका निजी विषय था किन्तु शासनतंत्र की सहायता से भारतवर्ष के सनातन धर्म को क्षीण करने का कार्य करना गलत था। भारतवर्ष के वैदिक अस्तित्व पर बौद्ध पंथ की शिक्षाओं को थोपना गलत था। भारतवर्ष अहिंसा की चपेट में आता जा रहा था। भारतीय सनातन धर्म से विरक्ति की यह प्रक्रिया मौर्य वंश के अंतिम शासक बृहद्रथ तक चलती रही।

बाणभट्ट द्वारा रचित हर्षचरित में भी बृहद्रथ प्रतिज्ञादुर्बल कहा गया है क्योंकि राजगद्दी पर बैठते समय एक राजा अपने साम्राज्य की सुरक्षा का जो वचन देता है उसे पूरा करने में बृहद्रथ पूर्णतः असफल रहा।

मौर्य साम्राज्य निरंतर दुर्बल होता जा रहा था और बृहद्रथ के शासनकाल में यह दुर्बलता अपने चरम पर पहुँच चुकी थी। अधिकांश मगध साम्राज्य बौद्ध अनुयायी हो चुका था।

इन सब के बीच यह खबर आई कि ग्रीक शासक भारतवर्ष पर आक्रमण करने की योजना बना रहे हैं। पुष्यमित्र शुंग जो कि बृहद्रथ का सेनानायक था, इस बात से व्यथित था कि एक ओर शत्रु आक्रमण के लिए आगे बढ़ा चला आ रहा है और दूसरी ओर उसका सम्राट किसी भी प्रकार की कोई सक्रियता नहीं दिखा रहा है। पुष्यमित्र ने अपने स्तर पर प्रयास प्रारम्भ किया। उसे अपने गुप्तचरों से शीघ्र ही यह सूचना मिली कि ग्रीक सैनिक बौद्ध भिक्षुओं के वेश में मठों में छुपे हुए हैं और कुछ बौद्ध धर्मगुरु भी उनका सहयोग कर रहे हैं। इस सूचना से व्यथित होकर पुष्यमित्र ने बौद्ध मठों की तलाशी लेने की अनुमति मांगी किन्तु बृहद्रथ इसके लिए तैयार नहीं हुआ। फिर भी पुष्यमित्र ने अपने स्तर पर कार्यवाही की। इस कार्यवाही के दौरान पुष्यमित्र और उसके सैनिकों की मुठभेड़ मठों में छिपे शत्रुओं के सैनिकों से हुई जिसमें कई शत्रु सैनिक मृत्यु के घाट उतार दिए गए। बृहद्रथ, पुष्यमित्र की इस कार्यवाही से रुष्ट हो गया। वह पुष्यमित्र से भिड़ गया। एक ओर शत्रु भारत विजय का कुस्वप्न लिए बढ़ रहा था और यहाँ भारतवर्ष का सम्राट अपनी सीमाओं की सुरक्षा में लगे सेनानायक से संघर्ष में लगा हुआ है। अंततः सम्राट और सेनानायक के संघर्ष में सम्राट मृत्यु को प्राप्त होता है। सेना पुष्यमित्र के प्रति अनुरक्त थी इसलिए पुष्यमित्र शुंग को राजा घोषित कर दिया गया। राजा बनने के तुरंत बाद पुष्यमित्र शुंग ने अपंग साम्राज्य को पुनर्व्यवस्थित करने के लिए तमाम सुधार कार्य किए। उसने भारतवर्ष की सीमाओं की ओर बढ़ रहे ग्रीक आक्रांताओं को खदेड़ दिया और भारतवर्ष से ग्रीक सेना का पूरी तरह से अंत कर दिया।

इस प्रकार पुष्यमित्र शुंग ने पुनः एक नए अखंड भारत की नींव रखी। एक ऐसे अखंड भारतवर्ष की जहां वैदिक सनातन धर्म अपनी मूल महानता की ओर लौटने लगा। बौद्ध पंथ की ओर जा चुके हिन्दू पुनः सनातन धर्म की शरण में लौट आए। पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल में वैदिक शिक्षा अपने चरम पर पहुँच गई। उसने राष्ट्र निर्माण के तत्वों में सनातन धर्म के महत्व को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। ऐसा कहा जाता है कि पुष्यमित्र के शासनकाल में मगध साम्राज्य के लगभग सभी निवासियों तक वैदिक शिक्षा की पहुँच थी। इसी का परिणाम था कि भारतवर्ष पुनः अपनी सनातन महानता को प्राप्त करने लगा था।

मौर्य साम्राज्य के शिथिल हो जाने के कारण केंद्रीय नियंत्रण में भारी कमी आ गई जिससे मगध साम्राज्य के कई हिस्सों में सामन्तीकरण की प्रवृत्ति प्रबल होती जा रही थी। पुष्यमित्र के शासक बनने के बाद शासन व्यवस्था की इस दुर्बलता को दुरुस्त करने का कार्य किया गया। पुष्यमित्र के शासनकाल में राज्यपाल और सह-शासक नियुक्त करने की व्यवस्था प्रारम्भ हुई। शासन की सबसे सूक्ष्म इकाई के रूप में ग्रामों का विकास किया गया। इस प्रकार पुष्यमित्र ने न केवल सनातन धर्म की स्थापना की अपितु शासन पद्धति को सुव्यवस्थित करने का कार्य भी भली भांति किया। यही कारण था कि पुष्यमित्र का साम्राज्य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में बरार की दक्षिणतम सीमा तक और पश्चिम में सियालकोट से लेकर पूर्व में मगध तक विस्तृत था।

पुष्यमित्र शुंग ब्राह्मण अवश्य था किन्तु कट्टर नहीं :

एक ब्राह्मण शासक होने का यह अर्थ बिलकुल भी नहीं है कि वह शासक कट्टर है। यदि पुष्यमित्र कट्टर प्रवृत्ति का होता तब स्वयं उसकी सेना उसके विरुद्ध हो जाती जिसका कहीं भी कोई उल्लेख नहीं है। पुष्यमित्र शुंग के विषय में एक मार्क्सवादी इतिहासकार गार्गी चक्रवर्ती ने एजेंडा बनाया कि वह कट्टरपंथी ब्राह्मण था। यह सर्वविदित है कि वामपंथी और मार्क्सवादी भारतीय वर्ण व्यवस्था और विशेषकर ब्राह्मणों के भयंकर विरोधी हैं। ऐसे में इनसे यह आशा नहीं की जा सकती है कि ये किसी ब्राह्मण शासक का निष्पक्ष चरित्र चित्रण करेंगे। गार्गी किस प्रकार की इतिहासकार हैं इसका पता इस बात से चलता है कि उन्हें दिव्यावदान को आधार बनाकर पुष्यमित्र को कट्टर बताया है।

अब बात करते हैं दिव्यावदान की। दिव्यावदान का अर्थ है, दिव्य आख्यान। आख्यान को अंग्रेजी में नैरेटिव कहा जाता है। इसका तात्पर्य है कि दिव्यावदान एक नैरेटिव है जो बौद्धों के महान चरित्रचित्रण का एक माध्यम था। बौद्ध पंथ में अवदान साहित्य का अर्थ ही है, किसी भी व्यक्ति का कथाओं के माध्यम से महान चरित्र चित्रण। अब यह विचारणीय है कि यदि किसी नैरेटिव के माध्यम से बौद्धों का चरित्र चित्रण सकारात्मक रूप में किया जाएगा तो नकारात्मक कौन होगा, निश्चित रूप से वही व्यक्ति जिसका बौद्धों के साथ संघर्ष हुआ है। वह व्यक्ति है पुष्यमित्र शुंग। नैरेटिव का अर्थ ही होता है किसी व्यक्ति या संगठन के पक्ष में अथवा विपक्ष में विचारों का निर्माण करना। पुष्यमित्र का बौद्धों के साथ संघर्ष कितना सत्य है इसके विषय में आगे चर्चा की जा रही है।

पुष्यमित्र शुंग न तो बौद्ध विरोधी था और न ही बौद्धों का हत्यारा :

कल्पना कीजिये कि कोई पंथ जिसे दशकों तक शासन का भरपूर समर्थन मिलता रहा हो। जिसके अनुयायियों में एक महान साम्राज्य के शासक रहे हों। वह पंथ लगातार फल फूल रहा हो और एक राष्ट्र के कोने कोने में अपने अनुयायी बनाता जा रहा हो। इन सब के बीच एक ऐसा शासक आ जाए जो पंथ-परिवर्तन का विरोधी हो और ऐसे कार्यों के लिए शासन की सहायता बंद कर दे। ऐसे में उस शासक और पंथ के मध्य संघर्ष होना स्वाभाविक है। यही सत्य है पुष्यमित्र और बौद्धों के संघर्ष का।

अशोक के शासन काल से ही बौद्धों को राज्य का समर्थन प्राप्त होता रहा और इस समर्थन की सहायता से बौद्ध पूरे भारतवर्ष में लगातार बढ़ते चले गए। बृहद्रथ के शासनकाल तक यह पंथ-परिवर्तन चलता रहा किन्तु पुष्यमित्र शुंग के राजगद्दी में बैठने के बाद बौद्धों के इस विस्तार में अंकुश लग गया। इसी प्रतिबन्ध से बौखलाए बौद्धों और पुष्यमित्र के मध्य संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई।

पुष्यमित्र पर जिन बौद्ध भिक्षुओं की हत्या का आरोप लगाया जाता है वो कोई और नहीं अपितु भिक्षुओं का वेश धारण किए हुए ग्रीक सैनिक थे, जिनके विषय में ऊपर लेख में बताया गया है।

अब इसकी तुलना दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों से कीजिए जहाँ दंगे स्वयं हिन्दुओं के विरोध में हुए। दंगे करने वाले इस्लामिक कट्टरपंथी थे जो अब पुलिस जांच में बाहर आ रहे हैं लेकिन पूरे स्थानीय मीडिया में दिल्ली के दंगों को सीएए विरोध के नाम पर दबाने का प्रयास किया गया। यहाँ तक की वामपंथी अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के द्वारा दिल्ली दंगों को भाजपा सरकार की सहायता से हिन्दुओं के द्वारा मुसलमानों के दमन का नाम दे दिया गया। कहने का तात्पर्य यही है कि सनातन धर्म और हिन्दुओं के विरुद्ध तथ्यों को तोडना मरोड़ना पहले भी होता था और आज भी हो रहा है।

इसके बाद पुष्यमित्र पर आरोप लगाया जाता है कि उसने बौद्ध स्मारकों को नष्ट करने का कार्य किया।

इस आरोप के विरुद्ध भी तर्क हैं।

सबसे पहले तो यह सभी को ज्ञात है कि साँची और भरहुत जैसे बौद्ध स्तूपों का अधिकांश हिस्सा पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल में निर्मित हुआ है। यदि पुष्यमित्र बौद्धों का इतना ही विरोधी होता तो आज आप साँची में बौद्ध स्तूप नहीं अपितु भगवान विष्णु का मंदिर देख रहे होते। एक शासक जिसने 36 वर्षों तक शासन किया और जो एक महान साम्राज्य के साथ एक महान सेना का भी स्वामी था, वह भारतवर्ष से बौद्धों की एक एक पहचान को नष्ट कर सकता था।

पुष्यमित्र के शासनकाल की तुलना मुगलों के शासनकाल से कीजिए जिन्होंने भारतवर्ष में हिन्दुओं के पूजा स्थल नष्ट कर दिए। उन्होंने हिन्दुओं के सबसे पूज्य धर्म स्थलों को अपना निशाना बनाया। जिनमें अयोध्या, काशी और मथुरा प्रमुख हैं। मुगलों ने इन सनातन केंद्रों को न केवल नष्ट किया अपितु वहां मस्जिदों का निर्माण भी करवाया। इसके विपरीत पुष्यमित्र जैसा कट्टर ब्राह्मण कोई मंदिर बनाने की तो बात छोड़िए एक स्तूप को नष्ट भी न कर सका। भारत में इतिहास की व्याख्या करने वाले ऐसे ही निष्पक्ष रहे हैं जिन्हे हजारों मंदिर तोड़ने वाले मुगल महान लगते हैं और एक ब्राह्मण शासक कट्टर जिसने मात्र अपने सनातन धर्म का पालन किया।

पुष्यमित्र पर बौद्धों के धर्म परिवर्तन का आरोप भी लगाया जाता है किन्तु यह सर्वथा भ्रामक है। मौर्यों के शासनकाल की बात करें तो बौद्धों ने स्वयं भारी संख्या में हिन्दुओं को बौद्ध पंथ अपनाने के लिए प्रेरित किया। शासनकाल के संरक्षण से मगध साम्राज्य का एक बड़ा हिस्सा बौद्ध हो चुका था। पुष्यमित्र के राजगद्दी में बैठने के बाद वो हिन्दू जो बौद्ध हो गए थे, सनातन धारा में लौटने लगे थे। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जब मतावलम्बियों में अपने धर्म के प्रति विश्वास सुदृढ़ होता है तब ऐसी स्थिति में ये लोग अपने धर्म की ओर वापस आते हैं। वर्तमान परिस्थितयों में आरएसएस और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री महंत श्री योगी आदित्यनाथ के ऊपर भी धर्म परिवर्तन के आरोप लगाए जाते रहे हैं जो पूर्णतः निराधार हैं क्योंकि हिन्दू कभी भी धर्म परिवर्तन का कार्य नहीं कर सकता किन्तु जो हिन्दू सनातन छोड़ कर दूसरे पंथ में सम्मिलित होता है वह एक न एक दिन वापस अवश्य आता है। ऐसा इसलिए क्योंकि सनातन से अधिक स्वतंत्रता और विचारशीलता किसी और पंथ में नहीं है। पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल में भी यही हुआ।

पुष्यमित्र के कट्टर न होने का सबसे बड़ा प्रमाण हैं, वामपंथियों की लाड़ली इतिहासकार रोमिला थापर। रोमिला जी ने स्वयं अपनी पुस्तक अशोक एवं मौर्यों का पतन (Asoka and the Decline of the Mauryas) में स्पष्ट रूप से यह कहा है कि पुष्यमित्र द्वारा बौद्धों के नरसंहार का कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

अपनी पुस्तक “Popular Controversies in World History” में स्टीवन एल. डेनवर भी यही संभावना व्यक्त करते हैं कि मौर्य साम्राज्य में मिल रही सहायता बंद होने के बाद बौद्ध पुष्यमित्र विरोधी हो गए थे।

एटिने लमोत्ते (Etienne Lamotte) जो कि बौद्ध इतिहास के एक बड़े ज्ञाता थे उन्होंने ऊपर बताई गई स्टीवन की पुस्तक में कहा है कि महान बौद्ध विचारक और इतिहासकार भी इस बात की पुष्टि नहीं करते हैं कि पुष्यमित्र बौद्ध विरोधी था अथवा उसने किसी भी प्रकार से बौद्धों का नरसंहार किया।

इन सभी तथ्यों और तर्कों से यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पुष्यमित्र शुंग न तो कट्टर था और न ही नरसंहारक। पुष्यमित्र के साथ जो अन्याय इतिहासकारों ने किया वह नया और अनापेक्षित नहीं है। भारत में यही होता आया है। आज जब सूचना प्रौद्योगिकी अपने चरम पर पहुँच चुकी है, उस समय भी हिन्दू विरोधी नैरेटिव बनाने के लिए कपिल मिश्रा को दिल्ली दंगों का और नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगों का आरोपी बनाया जा चुका है। विचार कीजिए उस प्राचीन इतिहास का जब सूचना तंत्र आज के समान आधुनिक नहीं थे, किस प्रकार एक महान शासक के विरुद्ध नैरेटिव बनाया गया। उस नैरेटिव को आधुनिक इतिहासकारों ने हाथों हाथ हाईलाइट किया और बताया कि हिन्दू सम्राट कितना क्रूर हो सकता है। भारतवर्ष के इतिहास में जिसने भी सनातन धर्म का पालन किया उसे या तो इतिहास में कलंकित कर दिया गया अथवा हाशिये पर छोड़ दिया गया। भारतीय इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों को टीपू सुल्तान से बड़ा प्रेम है जो वास्तव में क्रूर था और जिसने हिन्दुओं का जीवन नर्क के समान बना दिया था। यह टीपू सुल्तान आज के बुद्धिजीवियों और सेक्युलर राजनेताओं का नायक है, लेकिन पुष्यमित्र शुंग कट्टर ब्राह्मण और हत्यारा।

पुष्यमित्र का अपराध ही यही है कि वह एक महान हिन्दू सम्राट था, उसमें भी ब्राह्मण और सबसे बड़ी बात कि वह सनातन धर्म का एक निष्ठावान अनुयायी था। अब यह आपको तय करना है कि आप किसे अपना नायक स्वीकार करते हैं। उन मुगलों को जिन्होंने हमारे मंदिर तोड़े, हमारी महिलाओं के साथ बलात्कार किया, भयंकर लूट पाट मचाई अथवा उस पुष्यमित्र को जिसने क्षीण हो रहे धर्म को पुनर्जीवित किया।

क्या आप उन इस्लामिक कट्टरपंथी शासकों को महान मानेंगे जिन्होंने भारतवर्ष के महान सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्रों को जलाकर नष्ट कर दिया अथवा उस शुंग वंश  के संस्थापक को जिसके शासन काल में न केवल हिन्दू धर्म अपितु अन्य पंथों के साहित्य का विकास हुआ। वामपंथी आपको यह नहीं बताएंगे कि अफगानिस्तान को बौद्ध विहारों से मुक्त किसने कर दिया लेकिन वे आपको पुष्यमित्र द्वारा बौद्धों के नरसंहार की झूठी कथा सदैव सुनाते रहेंगे।

आज भारत जाग रहा है और अपना वास्तविक इतिहास जान रहा है। आशा है कि भारत के नागरिक अपने उस शासक को उचित सम्मान देंगे जिसके कारण भारतवर्ष का सनातन धर्म सुरक्षित रहा और आज भी अपनी चरम अवस्था की ओर बढ़ रहा है। पुष्यमित्र शुंग इतिहास में, हिन्दुओं के आदर्शों में अमर रहेगा।

 

 

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