Hindutva Yatra

सनातन धर्म का सारांश : हिंदुत्व।

यह हम भारतवासियों का कर्तव्य है कि हम अपनी विरासत के बारे में जानें। हिंदुत्व को गाली देने से हम कूल नहीं बन जाएंगे और न प्रोग्रेसिव। हिंदुत्व हमारे राष्ट्रवाद की ढ़ाल है जो हमें अपने भारतवर्ष के प्रति कर्तव्यनिष्ठ बनाता है। 

हिंदुत्व यात्रा श्रृंखला के पिछले लेख में हमने हिंदुत्व और Hinduism के बीच के अंतर को समझा और ये देखा कि कैसे Hinduism का उपयोग हिंदुत्व को धूमिल करने के लिए किया गया। उस लेख में बताया गया है कि कैसे एक यूरोपीय परिभाषा के द्वारा भारत में हिंदुत्व को कट्टर विचारधारा कहा गया और हिंदुत्व के अनुयायी को कट्टरपंथी। वास्तव में यदि सूक्ष्मता से विचार किया जाए तो यह एक पूर्व निर्धारित षड़यंत्र था कि जब इस्लामिक चरमपंथ भारत के कई हिस्सों में हावी हो रहा था तब उसे संतुलित करने के लिए एक रणनीति के तहत हिन्दुओं की एक कट्टर पंथी जाति को गढ़ा गया। यह जाति हिंदुत्व को जानने-समझने वाली थी। अब चूँकि हिंदुत्व को बेहतर तरीके से वीर सावरकर ने परिभाषित किया था और वीर सावरकर तो वैसे भी भारत में वामपंथियों, कांग्रेसियों और बुद्धिजीवी इतिहासकारों के शत्रु रहे हैं, तो ऐसे में बड़ी ही चतुराई से हिंदुत्व को कट्टरपंथ के सांचे में ढ़ाल दिया गया। ऐसा नहीं है कि धर्मनिरपेक्षता और तुष्टिकरण स्वतंत्रता के बाद की घटनाएं हैं अपितु स्वतंत्रता के पहले भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और तत्कालीन राजनीति में तुष्टिकरण हावी था। यही तुष्टिकरण स्वतंत्रता के बाद भी निरंतर बना रहा। सन 1976 में 42वें संविधान संशोधन के द्वारा धर्मनिरपेक्षता को संविधान में जोड़ देने के बाद तो तुष्टिकरण अपने चरम पर पहुँच गया। हिंदुत्व का अपमान इसी तुष्टिकरण का परिणाम है।

अब प्रश्न उठता है कि हिंदुत्व को किस आधार पर सनातन धर्म का सारांश कहा जाए? इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने के लिए हमें लाखों वर्षों की इतिहास की यात्रा करनी होगी।

रामायण और महाभारत का काल हमारे भारतवर्ष के लिए महत्वपूर्ण समय रहा। इन दोनों ही काल चक्रों का अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि भारतवर्ष राष्ट्र के कल्याण की प्राथमिकता सर्वोत्तम थी। अपने वनवास काल के दौरान प्रभु श्री राम एवं अनुज लक्ष्मण ने पूरे भारतवर्ष में लगभग चौदह से पंद्रह हजार राक्षसों का वध किया जो यज्ञ, अनुसंधान और विज्ञान अध्ययन जैसे कार्यों में निरंतर बाधा पहुँचाते थे। अंत में उन्होंने रावण को उसकी सेना समेत मृत्यु के घाट उतार दिया जो लगातार राक्षसों के माध्यम से सनातन का शत्रु बन चुका था। अपनी राजधानी अयोध्या लौटने और राजा रामचंद्र के रूप में पद स्थापित होने के पश्चात प्रभु ने राष्ट्र एवं समाज कल्याण के सभी कार्य सम्पूर्ण किए और सनातन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। चाहे वो ग्रामीण विकास हो या शिक्षा का नवीनीकरण, वर्णाश्रम व्यवस्था का सशक्तिकरण हो या व्यापार की उन्नति, राजा रामचंद्र ने सनातन की परंपरा का पालन करते हुए राष्ट्र के उत्थान के लिए आवश्यक सभी उपाय किये।

अब आते हैं महाभारत काल में जहाँ राजनीति और सामाजिक व्यवस्था का एक तय स्वरूप प्राप्त हो चुका था। समाज में विभिन्नता बढ़ती जा रही थी। हस्तिनापुर की छाया तले कई राज्य और जनपद फलफूल रहे थे। सबके अपने अलग स्वार्थ और इच्छाएं थीं। इस काल में धर्म और अधर्म के बीच एक भयानक युद्ध हुआ। एक ऐसा युद्ध जिसके बाद सम्पूर्ण पृथ्वी पुरुषों से हीन हो गई थी। सत्ता के लोभ ने कौरवों को अँधा बना दिया था। इस महाभारत काल के नायक श्री कृष्ण थे जिन्होंने अधर्म को उसी के तरीके से परास्त किया।

रामायण और महाभारत काल में सामाजिक व्यवस्था का अंतर है, राजनीति और अर्थव्यवस्था के नियमों में अंतर है, नायक और खलनायकों में अंतर है, युद्ध में अंतर है और यहाँ तक कि योद्धाओं में भी बड़ा अंतर है लेकिन जो दोनों कालों में समान है वह है राष्ट्र की अवधारणा। दोनों ही युगों में नायकों ने सनातन धर्म की स्थापना को अपना लक्ष्य बनाया। चाहे वो प्रभु श्री राम हों या श्री कृष्ण, दोनों ही भारतवर्ष में धर्म एवं सत्य की संस्थापना के प्रमुख स्तम्भ हैं। दोनों के ही भीतर अपनी मातृभूमि और राष्ट्र के कल्याण का जो भाव था वही वास्तव में हिंदुत्व है। यदि परिभाषा के विषय में विचार करें तो “सनातन धर्म का पालन करते हुए राष्ट्रीयता की स्थापना के लिए जो प्रवृत्ति उत्तरदायी है वही हिंदुत्व है”। हिंदुत्व एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना पर आधारित है जहाँ सनातन धर्म सर्वोच्च हो। सहिष्णुता और सम्पूर्ण पृथ्वी पर निवास करने वाली मानव जाति के प्रति अपनत्व का भाव ही हिंदुत्व का मूल तत्व है। अपनत्व के भाव से ही कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है और अंततः कल्याण की इच्छा ही मानव को कर्म करने की प्रेरणा देती है। यही प्रेरणा समाज और राष्ट्र के निर्माण के लिए आवश्यक है क्योंकि यदि कोई व्यक्ति एक साझी प्रेरणा से जुड़ा नहीं होगा तो उसके कर्म एकाकी हो सकते हैं और वह स्वार्थ्य के मार्ग पर चल सकता है किन्तु एक साझी प्रेरणा से मनुष्य पहले दूसरों के बारे में सोचता है बाद में अपने लिए। यही साझी प्रेरणा है वसुधैव कुटुंबकम की जो हिंदुत्व का मूल मन्त्र है।

सनातन अत्यंत वृहद है। सनातन अनंत है। सनातन के अस्तित्व का कोई आरम्भ नहीं है। सनातन की उपस्थिति सभी रूपों में हैं चाहे वो भौतिक हों या अभौतिक। एक ओर जहाँ जीवन की स्वीकार्यता है वहीँ दूसरी ओर मोक्ष का खुला हुआ द्वार है। एक ओर ज्ञान की अनवरत परंपरा है तो दूसरी ओर भक्ति की शीतल छाया। एक ओर गृहस्थ का रेशमी बिछौना है तो दूसरी ओर तपस्या के प्रस्तर। सनातन में सब स्वीकार्य है, आस्तिक भी और नास्तिक भी, ज्ञान भी और अज्ञान भी, प्रकाश भी और अंधकार भी, हिंसा भी और अहिंसा भी। सनातन तो वो ब्रह्माण्ड है जिसका कोई छोर नहीं है। ऐसे में एक साधारण व्यक्ति किस प्रकार अपने सनातन या हिन्दू धर्म को समझ पाए? किस प्रकार वह अपने जीवन का मार्ग तय कर पाए? यह थोड़ा कठिन कार्य है। इस कठिन कार्य को सरल करने का एक उपाय है “कर्मयोग”। कर्म की प्रधानता मनुष्य के पथ को सरल बना देती है। चाहे मनुष्य मोक्ष का मार्ग चुने या जीवन का, चाहे ज्ञान का मार्ग चुने या भक्ति का, कर्म तो करना ही होगा। इस प्रकार कर्मयोग, सनातन का एक सूक्ष्म भाग है जो सनातन के प्रत्येक पहलू से सम्बंधित है। कर्मयोग के इस सिद्धांत की महत्वपूर्ण आवश्यकता है कर्म की प्रवृत्ति अर्थात कर्म किस प्रकार का हो जो कल्याणकारी हो जाए। इस आवश्यकता की पूर्ति हेतु एक सार्वभौमिक विचार का जन्म हुआ जो कर्म के मूल में था। क्योंकि एक व्यक्ति मात्र अपने लिए कार्य करता है तो यह सुनिश्चित नहीं किया जा सकता कि उसके द्वारा किया गया कार्य सबके हित में है अथवा नहीं इसलिए कल्याणकारी कार्य के लिए जिस सार्वभौमिक विचार का जन्म हुआ वह था समाज तथा राष्ट्र। मनुष्य का प्रत्येक कर्त्तव्य इन दोनों के उत्थान पर आधारित है। सामूहिक उत्थान का यही परिप्रेक्ष्य सनातन धर्म का सारांश है। इसी सारांश को 18वीं – 20वीं शताब्दी के दौरान हिंदुत्व नाम दिया गया।

हिंदुत्व की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह भारतवर्ष को एक भूमि मात्र का अंश न मानते हुए राष्ट्रमाता के रूप में प्रमुखता देता है और हम इसकी संतान हैं। हिंदुत्व का कर्मयोग भारतवर्ष के सकल कल्याण पर आधारित है। हिंदुत्व, एक हिन्दू की दो प्रकार की पहचानों से सम्बंधित है। पहला, हिन्दू धर्म अर्थात सनातन का अनुयायी होने से और दूसरा हिन्दू जाति का होने से जो सिंधु नदी से हिन्द महासागर तक के भूखंड में निवास करने वालों से बनी है। इस प्रकार वो सभी मनुष्य हिंदुत्व की विचारधारा से सम्बंधित हैं जो सनातन का पालन करते हुए भी माँ भारती के प्रति अपनी निष्ठा नहीं छोड़ते हैं और वो मनुष्य भी जो सनातन अथवा हिन्दू धर्म से सम्बंधित नहीं हैं किन्तु भारतवर्ष के प्रति संकल्पित हैं। दूसरे प्रकार के लोग किसी भी पंथ या मजहब के हो सकते हैं।

अब विचारणीय मुद्दा ये है कि हिंदुत्व से घृणा का कारण क्या हो सकता है? यह प्रश्न कठिन नहीं है।

हिंदुत्व पर आक्रमण शुरू किया वामपंथियों और इस्लामिक कट्टरपंथियों ने। दोनों के अपने कारण हैं। वामपंथी सदैव से ही राष्ट्र विरोधी रहे हैं। इनका जीवन स्वघोषित साम्यवाद और समाजवाद पर टिका हुआ है। इनके लिए राष्ट्र की अवधारणा का कोई महत्त्व नहीं है क्योंकि जब ये सत्ता में होते हैं तो ये तानाशाह बन जाते हैं। धर्म तथा जन कल्याण से इनका कोई मतलब नहीं रह जाता है। ये अड़ियल और विधर्मी स्वभाव अपना लेते हैं। ये समाज कल्याण को नकार देते हैं क्योंकि यदि समाज का उत्थान हुआ तो मनुष्यों में इनकी ग़ुलामी की प्रवृत्ति समाप्त हो जाएगी और ये वामपंथी रिक्त हो जाएंगे। भारतवर्ष में वामपंथी सदैव से ही हिन्दुओं से घृणा करते आए हैं। हिन्दुओं की परम्पराएं, रीतियां, वामपंथियों की दृष्टि में खटकती रही हैं। ये बिना कारण हिन्दुओं के धर्म का नाश करना चाहते हैं। धर्म पालन यद्यपि स्व-रुचि का विषय है किन्तु वामपंथी न तो स्वयं ही धर्म पालन करना चाहते हैं और न किसी और को करने देना चाहते हैं।

दूसरे प्रकार के लोग हैं इस्लामिक कट्टरपंथी, जिनके लिए राष्ट्र को माता स्वरुप में पूजना हराम है। इसके बाद किसी भी तर्क के लिए स्थान नहीं बचता।

स्वतंत्रता के बाद ये दोनों ही प्रकार के लोग भारतीय राजनीति और सत्ता में आए। कांग्रेस इन दोनों प्रकार के विचारों का संक्रमण है। इसलिए वह तुष्टिकरण पर विश्वास करती है। वह न तो हिन्दू धर्म के अनुयायियों को नाराज करना चाहती है और न ही अन्य पंथों, विशेषकर इस्लाम को। ऐसे में कांग्रेस ने हिन्दुओं में अपने धर्म के प्रति हीन भावना विकसित करने के लिए हिंदुत्व को निशाने में लिया और उसे एक ऐसी कट्टरपंथी विचारधारा के रूप में प्रचारित किया जो नकारात्मक है। कांग्रेस को इस कार्य में इन्ही वामपंथियों और इतिहासकारों का साथ मिला क्योंकि कांग्रेस संस्थागत रूप से शक्तिशाली थी।

हिंदुत्व, जिसने भारतीय जनमानस के भीतर राष्ट्रवाद और धर्म के संयोजन का बीज बोया, जिसने भारतवर्ष के सकल उत्थान का स्वप्न देखा, उसी हिंदुत्व को गाली दी गई। लेकिन यह हम भारतवासियों का कर्तव्य है कि हम अपनी विरासत के बारे में जानें। हिंदुत्व को गाली देने से हम कूल नहीं बन जाएंगे और न प्रोग्रेसिव। हिंदुत्व हमारे राष्ट्रवाद की ढ़ाल है जो हमें अपने भारतवर्ष के प्रति कर्तव्यनिष्ठ बनाता है।

तो हे हिन्दुओं! तुम अपना कर्तव्य करते रहो और राष्ट्र को अपने कर्मयोग के मुख्य बिंदु में स्थापित करो। हिंदुत्व हमारी पहचान है और पहचान का नाश हो जाने से अस्तित्व संकट में आ जाता है। इसलिए बिना भय और दुर्बलता के अपने धर्म का पालन करो।

हिंदुत्व यात्रा के अगले लेख में हम भारतवर्ष की एक राष्ट्र के रूप में परिकल्पना और हिंदुत्व के उससे संबंधों की चर्चा करेंगे।

धर्मो रक्षति रक्षितः।। 

जय श्री राम।।

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