Politics

एक खुला पत्र प्रधानमंत्री के नाम..

भारत के एक हिन्दू नागरिक का अपने राष्ट्राध्यक्ष से विनम्र निवेदन।

आदरणीय प्रधानमंत्री जी.

सादर प्रणाम.

श्री राम आपको इस भयंकर संकट से लड़ने की असीम शक्ति प्रदान करें। कोरोना वायरस महामारी के इस संकट में जिस प्रकार आप भारतवर्ष का मार्गदर्शन कर रहे हैं वह निश्चित ही अद्भुत है। केवल आज ही नहीं अपितु सदैव से ही हम सब आपका अनुसरण करते रहे हैं। जब आप गुजरात राज्य के मुख्यमंत्री थे तब से ही आपको जनता का भरपूर समर्थन मिलता आया है। 2014 के बाद से तो यह जनसमर्थन, जनमत में बदल गया और भारतवर्ष ने आपको दो बार प्रधानमंत्री या जैसा आप स्वयं को कहते हैं प्रधानसेवक बनने का सौभाग्य दिया। यह मात्र जनमत नहीं अपितु दैवीय आशीर्वाद भी है जो आप जैसा कर्मयोगी इस राष्ट्र का शासक है। आपके प्रधानमंत्री पद पर विराजमान होने के बाद भारतवर्ष के सकल कल्याण की आशाएं कई गुना बढ़ गईं। लोगों के भीतर सोया हुआ स्वाभिमान जाग उठा। भारत के नागरिकों में अपने राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध का प्रादुर्भाव हुआ। ऐसा नहीं है कि आपने सब कुछ रेडियो या सार्वजनिक मंचों से हमें बताया हो किन्तु यह प्रकृति का नियम है कि जैसा राजा होगा वैसी ही उसकी प्रजा भी होगी। इस विशाल राष्ट्र की बागडोर आपके हाथों में आने के बाद यह तय हो गया था कि अब भारतवर्ष के आर्थिक, सामाजिक,राजनैतिक, कूटनीतिक एवं धार्मिक उत्थान का समय आ गया है। आपने इन सभी मोर्चों पर कार्य किया। सम्पूर्ण विश्व में भारत की महान प्रतिष्ठा का निर्माण हुआ। आपके नेतृत्व में भारतवर्ष का विशेष सामाजिक उन्नयन हुआ। आपने कई ऐसे आंदोलन चलाए जो आज सामाजिक परिवर्तनों के वाहक बने हुए हैं। आर्थिक मोर्चे पर भी वैश्विक मंदी होने के उपरान्त भारत की स्थिति उतनी खराब नहीं हुई जितनी विश्व के अन्य बड़े देशों की है। आपकी कार्यपद्धति देखकर मन में यह विश्वास जागता है कि आपके नेतृत्व में भारतवर्ष सुरक्षित है और निरंतर समृद्धि के पथ पर आगे बढ़ रहा है। किन्तु भारत के धार्मिक सशक्तिकरण को लेकर मन में एक असंतुष्टि है। यह असंतुष्टि मेरी निजी प्रवृत्ति पर आधारित है और इस महान राष्ट्र का एक “हिंदू” होने के कारण मेरी कुछ चिंताएं भी हैं और आशाएं भी। हमें यह ज्ञात है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और आप जिस पद पर हैं वह भी सर्वोच्च लोकतांत्रिक पद है किन्तु फिर भी इस राष्ट्र का नागरिक होने के कारण हमारा यह अधिकार है कि हम आपके समक्ष अपनी बात रखें। वैसे भी यह सौभाग्य आपके सामने ही प्राप्त हो सकता है क्योंकि भारत में तो ऐसे भी जनप्रतिनिधि हैं जिनसे प्रश्न करने पर हमें पुलिस के सामने बारह घंटों तक उत्तर देना पड़ सकता है। मेरी यह असंतुष्टि धर्मनिरपेक्षता के एकपक्षीय उपयोग से सम्बंधित है जिसने अपने ही राष्ट्र में हिन्दुओं को दूसरे दर्जे का नागरिक बनने के लिए विवश कर दिया है।

  1. हिन्दू धर्म के प्रतीकों, चिन्हों और पूज्यों के अपमान को रोकने के लिए कठोर कानून की आवश्यकता…..

सहिष्णुता हिन्दू धर्म की महान विशेषता है। सदियों से हिन्दू भयंकर अत्याचार सहता आया है किन्तु कभी भी विश्व कल्याण के सिद्धांत से हटा नहीं। ऐसी सहिष्णु जाति से भला किसी को क्या समस्या हो सकती है लेकिन समस्या है और हिन्दुओं के अपने देश भारत में ही है। आज सोशल मीडिया और अन्य संचार साधनों के माध्यम से हिन्दुओं के प्रतीक चिन्हों और पूज्य देवी देवताओं के विषय में अभद्र से अभद्र टिप्पणियां की जा रही हैं, उन्हें गालियां दी जा रही हैं। यह कहाँ तक सही है? क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मात्र इसलिए प्राप्त है कि हमारी भावनाओं की हत्या की जाए। ऐसा करने वाले लोग भी अधिकतर वही हैं जिनके मजहब में ईशनिंदा की सजा मृत्युदंड है। कॉमेडी शो और फिल्मों आदि के माध्यम से हिन्दुओं के सनातन धर्म का मजाक उड़ाया जाता है और यह सब आता है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अन्तर्गत। ऐसा करने वाले अधिकतर लोग अपने को नास्तिक कहते हैं लेकिन आप ही बताइये कि नास्तिक होने का तात्पर्य क्या यही है कि हिन्दुओं की आस्था के साथ खिलवाड़ किया जाए। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि हम भी इस्लाम की भांति ईशनिंदा के लिए मृत्युदंड तय करें किन्तु सहिष्णुता के नाम पर लगातार हिन्दुओं के धार्मिक अस्तित्व को गाली देने वालों के लिए एक कड़े दंड का प्रावधान अवश्य किया जाना चाहिए। यदि किसी को भी असहमति है तो वह तर्क आदि के माध्यम से चर्चा करके अपनी असहमति दर्ज करा सकता है और हिंदुत्व तो वैसे भी नास्तिक को उसी तरह स्वीकार करता है जैसे आस्तिक को। हिन्दू धर्म से अधिक समावेशी तो कोई और सम्प्रदाय हो ही नहीं सकता। लेकिन इस स्वतंत्रता का गलत लाभ उठाया जा रहा है। हम कब तक बैठकर अपने देवी देवताओं और प्रतीक चिन्हों के विषय में गालियां सुन सकते हैं। एक कड़े कानून की अनुपस्थिति में ऐसा करने वाले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। कुछ सामाजिक कार्यकर्ता और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हैं जो इन लोगों को समाज के सामने लेकर आते हैं, अपनी जिम्मेदारी पर शिकायत करते हैं लेकिन कड़ी कार्यवाही के अभाव में ये लोग भी स्वयं को असहाय अवस्था में पाते हैं। यह सब रुकना चाहिए क्योंकि हमारी भावनाओं का भी मूल्य है। आप निश्चित तौर पर यह कर सकते हैं और आपको करना भी चाहिए क्योंकि यह संविधान के दायरे में भी आता है। बाकि इतना तो आपको भी पता है कि हिन्दू कभी इतने हिंसक हो ही नहीं सकते कि किसी का गला रेत दें, सिर्फ इसलिए कि किसी ने उनके धर्म के विषय में अस्वीकार्य शब्द कहे।

  1. हिन्दुओं को सुरक्षा एवं समान अवसरों की उपलब्धता…..

जैसा कि आपने दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों के दौरान देखा कि कैसे हिन्दुओं को निर्दयता से मारा गया। इसके अलावा बंगाल और केरल में भी जिस प्रकार हिन्दुओं की हत्याएं हुईं वो इस राष्ट्र के सुरक्षा कानूनों पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करती हैं। यह सिर्फ बंगाल और केरल बात नहीं है अपितु जहाँ भी कोई धर्मनिरपेक्षता का झंडा बुलंद करने वाली सरकार आती है वहां हिन्दुओं के साथ ऐसी घटनाएँ बढ़ जाती हैं। आपको इन्हे रोकना चाहिए क्योंकि हिन्दुओं के प्राणों का भी मूल्य है। हमें यह ज्ञात है कि आप लोकतांत्रिक बंधनों में बंधे हुए हैं लेकिन बंगाल और केरल जैसे राज्यों की सरकारें भी तो लोकतांत्रिक तरीके से ही चुनी गई हैं। क्या अपने सभी नागरिकों की रक्षा करना इनका कर्त्तव्य नहीं है? यदि है तो अपने कर्त्तव्य पालन में असफल होने के बाद भी इन पर कार्यवाही क्यों नहीं?

इसके अलावा मैं आपका ध्यान एक ऐसी चिंता की ओर आकृष्ट कराना चाहूंगा जो पूरे हिन्दुओं को है। भारत भर में कई स्थानों पर यह देखा जा रहा है कि हिन्दुओं के त्योहारों, जुलूस यात्राओं अथवा शवयात्राओं के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से गुजरने से उन पर पथराव किया जा रहा है। जहाँ भाजपा की सरकार है वहां तो ऐसी घटनाएं कम ही देखने को मिलती हैं और यदि वहां ऐसा होता भी है तो उचित कार्यवाही की जाती है लेकिन गैर भाजपा शासित राज्यों में ऐसी घटनाओं में हिन्दुओं के लिए न्याय प्राप्त करना थोड़ा कठिन है। अब आप बंगाल में ही देखिए जहाँ रामनवमी के अवसर पर हिंसा होती ही रहती है और ममता बनर्जी की तृणमूल सरकार कुछ भी नहीं कर पाती। बंगाल में तो ममता दीदी मुहर्रम के दौरान दुर्गा विसर्जन पर भी रोक लगा चुकी हैं। अब आप ही बताइए कि जिस राष्ट्र में हिन्दुओं की जनसँख्या लगभग 80% हो वहां हिन्दुओं को ही दुर्गा माँ की आराधना करने की छूट न मिले तो इससे बड़ा अन्याय और क्या हो सकता है। इस पर विचार कीजिए और ऐसी समस्याओं के वैधानिक उपाय ढूंढने का प्रयत्न कीजिए जिससे हिन्दू अपने को कमजोर न समझें।

  1. हिन्दू मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता…..

राजनैतिक तुष्टिकरण का सबसे बड़ा दंश यदि किसी ने झेला है तो वो हैं हिन्दू मंदिर और हिन्दू धार्मिक संस्थाएँ। सबकी दृष्टि इन मंदिरों के संसाधनों पर है। अभी हाल ही में आपने देखा कि तमिलनाडु सरकार ने हिन्दू मंदिरों को 10 करोड़ रुपये मुख्यमंत्री कोष में जमा कराने का आदेश दिया। ये अलग बात है कि जनमत के दबाव में आकर सरकार को यह फैसला वापस लेना पड़ा। इसके अलावा टीटीडी अर्थात तिरुमला तिरुपति देवस्थानम बोर्ड में आंध्रा सरकार के द्वारा गैर हिन्दुओं की नियुक्ति को लेकर भी विवाद हुआ। इस विवाद के चलते यह नियुक्तियां रद्द करनी पड़ी लेकिन सवाल यह है कि बार बार ऐसा क्यों किया जा रहा है? यह बंद होना चाहिए और इसे बंद करने के लिए विधान बनाकर हिन्दू मंदिरों की स्वायत्तता सुनिश्चित करना चाहिए। जब भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है और मस्जिदों तथा चर्चों को पूरी स्वायत्तता प्राप्त है तो फिर हिन्दू मंदिरों के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए।

  1. परंपरागत ज्ञान एवं तकनीकि का विकास…..

आपने देख ही लिया होगा कि किस प्रकार कोरोना वायरस के संकट में सबसे ज्यादा प्रभावित हमारे शहर हुए हैं। प्रवासी मजदूरों की बड़ी संख्या के कारण यह समस्या और भी बढ़ गई है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि अब हम अपनी ग्रामीण विकास की नीति में बदलाव करें और गाँवों को और भी सुविधा संपन्न बनाने की ओर अपने प्रयासों की दिशा मोड़ दें। आप भारतवर्ष में गाँवों का महत्व समझते हैं। जिन महात्मा गाँधी को आप अपना आदर्श मानते हैं उन्ही ने कहा था कि वास्तविक भारत तो गाँवों में बसता है तो गाँवों को शहर बना देने से कुछ भी प्राप्त नहीं होने वाला है। हम भले ही स्मार्ट शहर बनाएं लेकिन गाँवो को गाँव ही रहने दें तो हमारे लिए अच्छा है। अब हमें यह समझना होगा कि भारत के भीतर प्रवासन की यह समस्या विकराल होती जा रही है ऐसे में इसका समाधान ढूंढना अत्यंत आवश्यक है। प्रवासन की इस समस्या का समाधान भारत के गाँवों में ही है। अभी भी भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था अपने चरम पर नहीं पहुँच पाई है। यहाँ अवसरों की उपलब्धता हमारी आशाओं से कहीं अधिक है। हमें अपने परंपरागत ज्ञान का उपयोग करना चाहिए, चाहे वो स्वास्थ्य का क्षेत्र हो या कृषि का। क्योंकि गाँवों में विकास कार्य करने की पहली आवश्यकता है कि यह विकास समवेशी प्रवृत्ति का हो और समावेशिता भारतीय परंपरागत ज्ञान की महत्वपूर्ण विशेषता रही है। आपको यह ज्ञात है कि आयुर्वेद हमारे लिए कितना प्रभावी और महत्वपूर्ण है। इसके अलावा कृषकों की आय को दोगुना करने में भी इसका योगदान महत्वपूर्ण हो जाता है। आयुर्वेद तो मात्र एक उदाहरण है जबकि भारत ऐसे महान परंपरागत संसाधनों का धनी है। इन संसाधनों का उपयोग ग्रामीण विकास के लिए किया जाना चाहिए। इससे कई लाभ हैं। जैसे नागरिकों का प्रवासन रुकेगा, ग्रामीण भारत में धनार्जन के अवसर बढ़ेंगे और भारत की रीढ़ कही जाने वाली कृषि का विकास भी सुनिश्चित होगा।

ये सभी चिंताएं मेरी अकेले की नहीं हैं। मैं अपने निजी जीवन में कई शहरों में सामान्य लोगों से मिला हूँ, ट्रेन, बस इत्यादि में उनकी आपस में होने वाली बातचीत सुनी है। इसके अलावा सोशल मीडिया में भी हिन्दुओं को इन मांगों का पुरजोर समर्थन करते देखा है। ये कुछ ऐसे अधिकार हैं जो हिन्दुओं को मिलने चाहिए। कुछ परिवर्तन हैं जो भारतवर्ष के कल्याण के लिए आवश्यक हैं। आप स्वयं एक हिन्दू हैं और आपको भी हिन्दुओं की सहनशीलता का ज्ञान है। लेकिन इस सहनशीलता का कोई व्यर्थ में लाभ उठाए और समाज में  कटुता प्रसारित करने का प्रयास करे, यह स्वीकार्य नहीं है। हमें यह ज्ञात है कि धर्म के मामले में इस राष्ट्र में कड़े निर्णय लेना थोड़ा कठिन कार्य है लेकिन आपको निर्णय लेना पड़ेगा। केवल आपको ही नहीं अपितु आपके पूरे मंत्रीमंडल का यह कर्त्तव्य है कि वह प्रत्येक उस कार्य को पूर्ण करे जो भारत के हित में है। हम तब हतोत्साहित होते हैं जब हमारे मानव संसाधन विकास मंत्री बड़े गर्व से यह कहते हैं कि हमने इतिहास का एक पन्ना नहीं बदला है। जबकि इतिहास को बदलना आपका प्रथम कर्त्तव्य है क्योंकि यह इतिहास को बदलना नहीं अपितु उसका पुराना स्वरुप प्राप्त करना है। ये तो आपको भी ज्ञात है कि हमारे इतिहास के साथ किस प्रकार छल किया गया है और हम भावी पीढ़ी को ऐसा इतिहास नहीं देना चाहते हैं जो उनके आत्मसम्मान को क्षीण कर दे।

आपका युद्ध वामपंथी बहरूपियों से है, आपका संघर्ष चतुर-चालाक कांग्रेस से है, आपका और हमारा शत्रु नीच और नैतिक मूल्यों से हीन है। ऐसे भयानक युद्ध को धर्म के दायरे में रहकर पूर्ण नहीं किया जा सकता है। विजय प्राप्त करने के लिए हमें रक्षात्मक होने के स्थान पर आक्रामक होना होगा। जैसी रणनीति आपने नीच पाकिस्तान के लिए अपनाई है वैसी ही रणनीति भारत के भीतर छुपे शत्रुओं के लिए भी अपनानी होगी।

भारतवर्ष के लोकतांत्रिक इतिहास में आप पहले ऐसे व्यक्ति जिसे इतना व्यापक जनसमर्थन प्राप्त है। इतिहास आपका राष्ट्र निर्माता के रूप में स्मरण करे अतः हे भारतवर्ष के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ! इस विशाल जनसमर्थन का उपयोग कीजिये और हिन्दुओं के हितों का ध्यान रखते हुए भारतवर्ष के नव निर्माण का मार्ग प्रशस्त कीजिए।

जय श्री राम।।

भारतवर्ष का एक हिन्दू।

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