Opinion

Covid 19 के बाद भारत : समस्या एवं समाधान

Covid19 के बाद भारत : समस्या एवं समाधान। समस्या तो है लेकिन साथ ही समाधान भी हैं. जानने के लिए पढ़ें पूरा लेख।

आशावाद कोई ऐसा दर्शन नहीं है जिसे समझा न जा सके। आशावाद एक स्वप्न भी नहीं है जिसे आँख मूँद कर बस देखा जाए। आशावाद तो एक ऐसी अवस्था है जब किसी भी संकट या विपरीत परिस्थिति से निकलने का मार्ग ढूंढा जाता है। कोई भी संकट अपरिभाषित नहीं होता और न ही रहस्यमयी। हर संकट अपने साथ दुःख के आलावा कुछ अवसर भी लेकर आता है। इन अवसरों को खोज लेना ही आशावाद है। कोरोना वायरस का संकट भी अपने साथ कुछ नए विचार लेकर आया है। यह बिलकुल सत्य है कि आज विश्व भर में कोरोना वायरस के कारण हाहाकार मचा हुआ है। अमेरिका, इटली, स्पेन, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन जैसे देश भी इस संकट के आगे नतमस्तक हैं। भारत भी इस संकट से अछूता नहीं है लेकिन भारत में शीघ्रता से लिए गए सुरक्षा उपायों के कारण Covid19 का प्रभाव सीमित है। लेकिन इस महामारी के संकट के बाद विश्व का भविष्य क्या होगा यह सोचना पूरी मानव जाति का कर्त्तव्य है। बाकी देश भी निश्चित तौर पर इस पर इस पर विचार करेंगे लेकिन इस लेख में भारत के लिए उपलब्ध अवसरों की बात की जाएगी। हम देखेंगे कि कैसे भारत कोरोना वायरस के कारण उपजे इस संकट से अपने लिए कुछ सकारात्मक ढूंढ़ पाता है।

अनुशासन एवं नियंत्रण…..

सबसे पहली आवश्यकता है अनुशासित और नियंत्रित जीवन शैली की। कोरोना वायरस से बचाव के लिए किये गए लॉक डाउन के दौरान यह देखा गया कि भारत भर में कई स्थानों पर अनुशासनहीनता की गई। फिर वो चाहे लॉक डाउन तोडना हो या कोरोना वारियर्स के साथ बदतमीजी। इसके आलावा कई लोगों की बिगड़ी दिनचर्या और अनियंत्रित कार्यशैली के कारण उनका घर में रहना कठिन हो रहा था। प्रधानमन्त्री सहित कई प्रतिष्ठित व्यक्ति भी लोगों से घर में रहने की अपील कर रहे थे लेकिन कई लोग अपने अनुशासनहीन स्वभाव के कारण इस अपील को दरकिनार करके जानबूझकर लॉक डाउन तोड़ रहे थे। भारत के लोगों में अनुशासनहीनता की समस्या हमेशा से रही है। इसी समस्या के कारण भारत ट्रैफिक दुर्घटनाओं और प्राकृतिक आपदाओं के समय अधिक जनहानि के कारण बदनाम होता रहा। आज हमें ये समझना होगा कि हम गैर जिम्मेदार नहीं हो सकते हैं। जब राष्ट्र संकट के दौर से गुजर रहा है तब अनुशासन में रहकर शासन एवं प्रशासन की सहायता करना हमारा पहला कर्त्तव्य हो जाता है। वास्तव में अनुशासन का यह पाठ स्कूल से ही सिखाया जाना चाहिए। जो शिक्षा बचपन से दी जाती है वह जीवन भर याद रहती है। अभी तो सरकार कड़े दंड निर्धारित करके इसे रोकने में सफल हो सकती है लेकिन इसका एक दीर्घकालिक समाधान ढूंढना होगा। अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा इस राष्ट्र के नागरिकों की दिनचर्या में झलकना चाहिए। सोशल डिस्टैन्सिंग और स्वच्छता अभ्यास इसी अनुशासित दिनचर्या का एक उदाहरण हैं जो कोरोना वायरस से लड़ने के लिए पुख्ता हथियार हैं।

प्रवासन…..

भारत में कोरोना वायरस संकट का दूसरा चिंताजनक पक्ष है मजदूरों के प्रवासन का। जब भारत ने सम्पूर्ण लॉक डाउन का साहस भरा कदम उठाया तब सबसे बड़ी चिंता थी दूसरे राज्यों में फंसे हुए मजदूरों और कामगारों की सुरक्षा की। भारत परोपकारियों का राष्ट्र है और लॉक डाउन शुरू होने के साथ ही कई लोग मजदूरों और गरीबों की सहायता में जुट गए लेकिन सहायता की भी एक सीमा होती है। जब कुछ क्षेत्रों में कोरोना वायरस लगातार बढ़ रहा है तब ऐसे में लोगों की सुरक्षा का भी ध्यान रखना पड़ेगा। भले ही कुछ समय के लिए समर्थ लोग, मजदूरों और कामगारों की सहायता करें लेकिन अंत में तो इस समस्या का पूर्ण समाधान ढूँढना ही चाहिए। आखिर क्यों ज्यादा से ज्यादा लोग पैसे कमाने के लिए अपने गाँवों को छोड़कर शहरों की तरफ जा रहे हैं? प्रवासन भारत की एक बड़ी समस्या है क्योंकि इससे भारतीय नगरों पर बोझ बढ़ता जा रहा है। इसके आलावा राज्य बाहर से आने वाले इन प्रवासियों की पूरी सहायता नहीं कर पा रहे हैं। प्रवासन का एक और नकारात्मक पहलू है, लोगों के द्वारा गाँवों को छोड़ देने से वहां कृषि एवं सम्बंधित गतिविधियों का क्षीण हो जाना। जबकि कृषि भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सर्वाधिक रोजगार प्रदान करने वाला क्षेत्र है और साथ ही इसके द्वारा भारत की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ती की जाती है। प्रवासन को रोकने के लिए आवश्यक है कृषि को बढ़ावा देना। कृषि से सम्बंधित गतिविधियों जैसे फूड प्रोसेसिंग और मूल्य संवर्धन के लिए गाँवों को सक्षम बनाया जा सकता है। इसके आलावा हस्त शिल्प और कुटीर उद्योगों के माध्यम से गाँवों में रोजगार और धनार्जन के अवसर बनाए जा सकते हैं। ग्रामीण भारत में आज भी अवसरों की कमी नहीं है। सेवा क्षेत्र के लिए भी गाँव बेहतर साबित हो सकते हैं, ऐसे में गाँवों के विकास के लिए एक नई प्रकार की नीति बनाने की आवश्यकता है जो तकनीकी और दक्षता पर आधारित हो। ऐसा नहीं है कि प्रवासन बुरा है लेकिन सब कुछ एक सीमा के भीतर ही लाभदायक हो सकता है। राष्ट्र की एकता एवं अखंडता के लिए राज्यों के मध्य सकारात्मक सम्बन्ध होने चाहिए और प्रवासन उसका बेहतर माध्यम है, चाहे वो शैक्षणिक हो या रोजगारपरक किन्तु प्रवासन तभी तक सही है जब तक कामगारों को बेहतर जीवन प्रदान किया जा सकता है।

मेक इन इंडिया…..

Covid19 के संकट के बाद से कई बड़ी कंपनियों का भरोसा चीन के ऊपर उतना पुख्ता नहीं रहा जितना पहले हुआ करता था। अब ये कंपनियां चीन से बाहर निकल कर नए ठिकानों की तलाश कर रही हैं। इन ठिकानों में भारत, विएतनाम और थाईलैंड की दावेदारी सबसे मजबूत है। लेकिन भारत के पास यह अवसर है कि भारत इन कंपनियों को आकर्षित करे और दुनिया की उत्पादन फैक्ट्री के रूप में अपना स्थान सुनिश्चित करे। इसके लिए आवश्यक है मूलभूत नीतिगत परिवर्तन। भारत की जनसँख्या श्रमबल के रूप में एक सकारात्मक पक्ष है। इस जनसँख्या के माध्यम से भारत में विभिन्न कंपनियों को उत्पादन के लिए कार्यबल की आपूर्ति की जा सकती है। इसके लिए स्किल इंडिया कार्यक्रम को और भी प्रभावशाली बनाने की आवश्यकता है। स्किल इंडिया कार्यक्रम वैसे तो पूरे राष्ट्र के लिए लाभदायक है किन्तु गाँवों में इसे बेहतर तरीके से लागू किया जाना चाहिए। इसके लिए स्वयं सहायता समूहों को काम में लाया जा सकता है। राज्यों का भी यह कर्त्तव्य है कि वे चीन से बाहर निकलकर नए उत्पादन क्षेत्रों की खोज कर रही कंपनियों को आकर्षित करने के लिए नीतिगत परिवर्तन करें और निवेश प्रक्रिया को सरल तथा सहज बनाएं। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए श्री नरेंद्र मोदी ने यह कार्य बड़ी ही कुशलता से किया था। महंत श्री योगी आदित्यनाथ जी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश भी निवेशकों को राज्य में निवेश एवं उत्पादन कार्य के लिए प्रेरित करने हेतु नीति निर्माण की प्रक्रिया प्रारम्भ करने वाला है। कोरोना वायरस के संकट के बीत जाने के बाद भारत सरकार के पास यह अवसर होगा कि मेक इन इंडिया कार्यक्रम का पुनर्निर्माण हो। रोजगार सृजन का इससे बेहतर अवसर नहीं मिल सकता।

स्वास्थ्य सुविधाओं का पुनर्निर्माण…..

इस समय न केवल भारत अपितु सम्पूर्ण विश्व की समस्या है, स्वास्थ्य सुविधाओं की निरन्तर आपूर्ति क्योंकि कोरोना वायरस के संकट के कारण जो देश सर्वश्रेष्ठ स्वास्थ्य सुविधाओं का दम्भ भरते थे आज वो घुटनों पर आ चुके हैं। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में स्वास्थ्य सुविधाएँ सीमित हैं। अतः यह आवश्यक था कि कोरोना वायरस को फैलने से रोका जाए अन्यथा भारत में यह महामारी घातक रूप ले सकती है। अब भारत को यह समझना होगा कि स्वास्थ्य सुविधाओं को सुदृढ़ करने का समय आ चुका है। कोई नहीं जानता की कब कौन सी महामारी एकाएक पूरी दुनिया को असहाय बना दे। वास्तव में हमने अपने पारम्परिक ज्ञान का अनादर किया। भारत आयुर्वेद और योग जैसी अमूल्य स्वास्थ्य सुविधाओं का जनक है लेकिन उनके विस्तार और सशक्तिकरण पर उतना ध्यान नहीं दिया गया जो आवश्यक था। हालाँकि भाजपा ने केंद्र में सरकार बनाने के बाद योग को वैश्विक स्तर पर वो सम्मान दिलाया जो उसे हमेशा दिया जाना चाहिए था। Covid19 के समय में स्वयं प्रधानमंत्री लोगों से योग करने के लिए कह रहे हैं लेकिन आयुर्वेद और अन्य उपचार पद्धतियों को भी लगातार आगे ले जाने की आवश्यकता है। कई सदियों से आयुर्वेद भारत में प्रचलित रहा लेकिन पिछले कुछ दशकों से जिस प्रकार आयुर्वेद की अवहेलना की गई वह सही नहीं थी। आज कोरोना वायरस से बचने का सबसे सही तरीका है रोग प्रतिरोधक क्षमता को सुदृढ़ बनाए रखना और आयुर्वेद से बेहतर इसके लिए उपाय कहीं और नहीं मिल सकते। पहले तो जब लोगों ने स्वयं ही प्रचार किया कि हमें काढ़ा पीना चाहिए या आयुर्वेदिक उपचारों का प्रयोग करना चाहिए तब हम विश्व स्वास्थ्य संगठन का मुँह ताके बैठे थे कि वो जो कहेगा हम वही करेंगे लेकिन अंत में सरकार को स्वयं लोगों को आयुर्वेद का उपयोग करने के लिए प्रेरित करना पड़ा। भारतीय पारम्परिक चिकित्सा को सदैव ही दोयम दर्जे का स्थान प्रदान किया गया। आयुर्वेद में शोध कार्यों की भीषण कमी रही। इसके पीछे कारण था आयुर्वेद और अन्य पारम्परिक उपचार पद्धतियों से जुड़े विभागों और संस्थानों को पर्याप्त वित्तीय सहायता न मिल पाना। इस प्रवृत्ति से हमें बाहर आना चाहिए। आयुर्वेद हमारा प्राचीनतम ज्ञान है। इसकी सहायता से हमने सदियों तक अपने राष्ट्र को स्वस्थ एवं समृद्ध बनाए रखा। आज भी आयुर्वेद उतना ही प्रभावी है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता है उपलब्धता, क्योंकि दैनिक जीवन में भी उपयोग होने वाली वस्तुएं भी आयुर्वेद में औषधि के रूप में वर्णित हैं। हमारे आसपास जिसे हम व्यर्थ समझते हैं ऐसी झाड़ियां और पौधे भी किसी न किसी रूप में हमारे उत्तम स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं। ऐसे में सरकार का और हमारा कर्त्तव्य है कि हमारे इस महान प्राचीनतम ज्ञान का प्रचार प्रसार किया जाए। इसके दो मुख्य लाभ हैं पहला ये कि लोगों का स्वास्थ्य खर्च घटेगा और दूसरा आयुर्वेद का बेहतर प्रचार प्रसार होने से हमारे कृषकों को इसका लाभ मिलेगा।

स्टार्टअप एवं व्यापार नवाचार……

इन सब बिंदुओं के अलावा भारत में स्टार्टअप और उद्यमियों के सक्रिय होने की आवश्यकता बढ़ गई है। ऐसी सक्रियता जो समाधानों के लिए समर्पित हो, ग्रामीण विकास के लिए समर्पित हो, नई कार्यशैली और जीवन की सरलता को समर्पित हो। भारतवर्ष नवाचार के मामले में विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा रहता है। ऐसे में यहाँ के उद्यमियों और स्टार्टअप आरम्भ करने वालों का कर्त्तव्य हो जाता है की वे बदलती हुई परिस्थितियों के हिसाब से व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर आविष्कार करें। आज ग्रामीण भारत को आविष्कारों की आवश्यकता सबसे ज्यादा है। भारत में शहरों के ऊपर बढ़ रहे भार को काम करने के लिए गाँवों के समावेशी विकास की आवश्यकता है। इनमे कृषिगत नवाचार और व्यापारिक तकनीकी का उन्नयन प्रमुख रूप से सम्मिलित है। कोरोना वायरस के इस संकट ने हमें अवसर दिया है कि हम अपनी नीतियों और विचार निर्माण की प्रक्रिया को बदल सकें। आज पूरी दुनिया ये जान चुकी है कि जो पर्याप्त समझा जा रहा था असल में वो अभी भी अपर्याप्त है। भारत में क्षमता है बदली हुई परिस्थितियों के हिसाब से कार्य करने की। सबसे सकारात्मक पहलू यहाँ की सरकार को प्राप्त असाधारण बहुमत है और भारत की वर्तमान सरकार नए बदलाव लाने में सक्षम भी है।

कोई भी संकट इतना बड़ा नहीं होता कि मानव के अस्तित्व के लिए खतरा बन सके। मानव जाति ऐसे संकटों से लड़ने के लिए ही बनी है और फिर भारत तो सदैव से पूरी दुनिया का पथ प्रदर्शक रहा है। तकनीकी में भले ही भारत कुछ विकसित देशों से दो चार कदम पीछे क्यों न खड़ा हो लेकिन जीवटता में सबसे अग्रणी पंक्ति में खड़ा मिलेगा। भारतवर्ष के इतिहास में कई ऐसे संकट आये जब हताशा बढ़ने लगी लेकिन उन परिस्थितियों में भी भारत अपने अनूठे शक्ति प्रदर्शन से न केवल संकटों से लड़ने में सफल रहा अपितु विश्व को भी नए मार्ग सुझाए। हम इस महान राष्ट्र के नागरिक हैं और हताशा हमें शोभा नहीं देती। हमें अपने इतिहास से प्रेरणा लेनी होगी और इस संकट से निकलने के साथ ही भविष्य के लिए भी योजनाएं तैयार करनी होगी। यह सब संभव है जब हमने जीवन में दृढ़संकल्पित और अनुशासित होकर राष्ट्र निर्माण के कार्य में भागीदार बने। संगठन इसके लिए पहली आवश्यकता है। जब हम संगठित होंगे तभी अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर पाएंगे।

वन्दे मातरम।।

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