Opinion

एक मुसलमान जो कर्म से हिन्दू था।

भले ही इतिहासकार कट्टरपंथी आक्रान्ताओं को भारतवर्ष का नायक बना दें लेकिन इतिहास सदैव नहीं छुपाया जा सकता। इतिहास मुग़लों की क्रूरता का बखान करेगा और उन मुसलमानों को बाहर लेकर आएगा जो कट्टरपंथ के विरोधी थे।

इतिहास और मुसलमान..…..

इतिहास वर्तमान की पूँजी है और भविष्य की आधारशिला है। इतिहास सत्य है, शाश्वत है लेकिन इतिहास विवश है क्योंकि वह सब कुछ स्वयं नहीं कह सकता। इसके लिए उसे वक्ता चाहिए जो इतिहास को वर्तमान के पटल पर अंकित कर सकें। अब यदि वक्ता ही कुटिल हो और इतिहास को अपने हिसाब से कहना प्रारम्भ कर दे तो? ऐसा तभी होता है जब इसमें वक्ता का निहित स्वार्थ होता है। वक्ता प्रभावी होता है जिसका एक विशाल श्रोता वर्ग होता है और वक्ता इसी वर्ग को अज्ञान के अँधेरे में बंदी बनाकर रखना चाहता है।

ऐसा करके वक्ता वर्तमान का बौद्धिक मर्दन करना चाहता है और अपने श्रोताओं की विचारशीलता को क्षीण करना चाहता है। ऐसा ही एक प्रयास भारतीय मुस्लिम सम्प्रदाय में हुआ। मुसलमानों को गजनवी, टीपू, खिलजी, बाबर और औरंगजेब जैसे आक्रान्ताओं की कहानियां सुनाई गई और इन्हे मुसलमानों का नायक घोषित कर दिया गया। मुसलमानों ने इन्हे हाथों हाथ लिया भी लेकिन एक नायक ऐसा भी था जिसे इतिहास की कोपलों से वृक्ष बनने से पहले ही काट दिया गया। यह एक ऐसा अभागा नायक था जिसे मुसलमानों के आदर्श के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए था लेकिन उसे इतिहास की कालकोठरी में ही मार दिया गया और उसकी कहानियां वहीं दफ़न कर दी गईं। यह नायक था मुग़ल वंश का राजकुमार दारा शिकोह जो गंगा जमुनी तहजीब का वास्तविक स्वरुप था। मुस्लिम बुद्धिजीवी भले ही दारा शिकोह को अपने मजहब की शिक्षाओं में न सम्मिलित करें लेकिन भारतवर्ष के इतिहास का एक भाग होने के कारण यह हमारा कर्त्तव्य है कि हम दारा शिकोह की धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी परंपरा को जानें। दारा शिकोह आज भारतीय मुसलामानों के लिए एक महान उदाहरण बन सकता है। इस लेख में हमारा प्रयास होगा दारा की बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत को मुसलमानों के सामने लेकर आना और मुसलमानों से उनके वास्तविक नायक का परिचय कराना।

दारा शिकोह का जीवन……

दारा शिकोह शाहजहां का बेटा था और औरंगजेब, दारा शिकोह का छोटा भाई था। दारा अपने पिता और छोटे भाई के विपरीत उदारवादी स्वभाव का था। रुढ़िवादिता से घृणा करने वाला दारा अपनी बड़ी बहन जहाँआरा का लाड़ला था जो उसी की तरह खुले विचारों वाली थी। मुग़ल साम्राज्य का उत्तराधिकारी होने बावजूद दारा ने मुस्लिम समाज में प्रचलित बहु विवाह की प्रथा को नकार दिया और एक ही महिला से विवाह किया। नादिरा बानू बेगम ही वो महिला थी जिससे दारा प्रेम करता था और अंतिम समय तक उसी के प्रति वफादार रहा। नादिरा की बदकिस्मती देखिए कि उसका शौहर कट्टर मुग़ल वंश में पैदा होने के बाद भी उदारवादी बनने चला था और इसकी कीमत उसकी बीवी और बच्चों को चुकानी पड़ी जो दारा की मौत के बाद औरंगजेब की प्रताड़ना के शिकार हुए।

दारा की सनातन यात्रा का प्रारंभ…….

दारा शिकोह की जीवन यात्रा बड़ी ही रोचक है। वास्तव में दारा जब अपने गुरु मियां मीर के संपर्क में आया तब उसे एक नई राह मिली अपने जीवन के प्रश्नों को ढूंढने की। असल में दारा धार्मिक प्रवृत्ति का पहले से ही था किन्तु जब ईश्वर की खोज में भटकता हुआ वह मियां मीर के पास पहुंचा तो उन्होंने उसे वेदों और उपनिषदों की खोज करने की प्रेरणा दी। फिर क्या था, दारा निकल पड़ा वेदों, पुराणों और उपनिषदों की खोज में। इस यात्रा के दौरान वह कई हिन्दू संतों और सनातन धर्म के विद्वानों के संपर्क में आया। इन सभी ने ये जानते हुए भी कि दारा एक मुसलमान है उसे वेदों और पुराणों की शिक्षाओं से वंचित नहीं किया। वैसे भी सनातन एक गुरु के रूप में कोई भेद नहीं करता। सनातन तो उस सूर्य की भांति है जो बिना रंग, रूप और पन्थ को देखे हुए समान रूप से प्रकाश की किरणें बांटता है। इन हिन्दू पंडितों ने वेदों और उपनिषदों की ऋचाओं को दारा के सम्मुख विस्तार से प्रस्तुत किया। दारा के सभी प्रश्नों के उत्तर विस्तार से उसे समझाए गए। वास्तव में दारा सूफी कायदे और भारतवर्ष के सनातन धर्म के बीच का एक सेतु बनना चाहता था जिससे पूरी दुनिया और खासकर अपने इस्लाम में वेद, वेदांगों की शिक्षाओं का प्रचार प्रसार कर सके।

दारा शिकोह की प्रमुख रचनाएँ………

जैसे जैसे दारा सनातन के सागर में गहराई ढूँढता हुआ आगे बढ़ता जाता था वैसे ही उसकी और अधिक ज्ञान की प्राप्ति की लालसा भी बढ़ती जाती। सनातन को जान लेने का उसका लक्ष्य बहुत बड़ा था किन्तु फिर भी उसने लगभग 50 उपनिषदों का फारसी भाषा में अनुवाद किया। इस अनुवाद कार्य को उसने सिर्र-ए-अकबर का नाम दिया जिसका अर्थ होता है एक महान रहस्य। उपनिषदों का इस प्रकार अनुवाद करना दारा के लिए सहज नहीं था किन्तु उन हिन्दू संतों और पंडितों की सहायता से दारा ने यह कार्य सम्पूर्ण किया। दारा शिकोह ने समुद्र संगम नाम से एक पुस्तक लिखी जो हिन्दू और मुस्लिम एकता तथा शांति की स्थापना पर आधारित थी। दारा की इस पुस्तक का मुख्य आधार सूफी और वैदिक परंपरा से सम्बंधित था। दारा शिकोह कला का समर्थक था। उसे ललित कला, नृत्य और संगीत में रूचि थी लेकिन उसका लगाव चित्रकारी से बहुत था। लगाव से ही निपुणता आती है। चित्रकला में उसकी निपुणता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने सनातन की शैव और वैष्णव परंपरा पर आधारित कई चित्रकलाएं बनाई। इन चित्रों में साधु और योगी प्रमुखता से दिखाई देते थे। दारा वास्तुकला के लिए भी प्रसिद्ध था।

धर्म परिवर्तन की लालसा………

उपनिषद अपने आप में एक दर्शन हैं जिन्हें पुराणों और वेदों का सार संग्रह कहा जाता है। उपनिषद ऐसा सत्य है जिसने दारा के जीवन को बदल दिया था। प्रयागराज कुम्भ की यात्रा के दौरान मेरी भेंट एक मुस्लिम शोधकर्त्ता से हुई जिन्होंने मुझे दारा और उसके जीवन के विषय में कई रोचक किस्से सुनाए थे। उनके अनुसार दारा सनातन से इस हद तक प्रभावित हो गया था कि वह कई दिनों तक धर्म परिवर्तन के प्रश्न को लेकर परेशान था किन्तु इस प्रश्न का उत्तर उसे उसकी वाराणसी यात्रा के दौरान मिला। जब गंगा किनारे उसकी भेंट एक साधु से हुई जिसने उसके इस संकट का समाधान किया। उस साधु ने उसे समझाया कि सनातन को जानने के लिए धर्म परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है। भारतीय दर्शन इतना समावेशी है कि उसका पालन किसी भी मजहब का व्यक्ति कर सकता है।

जीवन का करुण अंत…….

दारा की यह आध्यात्मिक यात्रा सरल नहीं थी। उसे काफ़िर की संज्ञा दे दी गई। युद्ध में हार जाने के बाद दारा को जब दिल्ली लाया गया तब उसे एक अपराधी के रूप में हाथी पर बैठकर नगर की सड़कों में घुमाया गया। लेकिन औरंगजेब का यह दांव उल्टा पड़ गया। लोगों के बीच दारा एक महान राजकुमार और भावी राजा के रूप में स्थापित हो चुका था। जब नगर में उसकी परेड कराई गई तब नगर वासियों ने औरंगजेब के सिपाहियों पर भयंकर आक्रोश दिखाया और दारा के समर्थन में नारेबाजी की। इस्लामिक कट्टरपंथियों की नजर में दारा काफ़िर हो चुका था। अपने मजहब से रूढ़िवादिता को समाप्त करने की सजा दारा शिकोह को मिली। वह शांति की स्थापना करना चाहता था। उसे हिन्दुस्तान और उसकी संस्कृति से प्रेम था लेकिन इस प्रेम की सजा के रूप में उसे मृत्यु का आलिंगन करना पड़ा। 30 अगस्त 1659 को दारा को उसके पुत्र के सामने मृत्यु के घाट उतार दिया गया।

क्रूर औरंगजेब………

वेनिस के यात्री निकोलो मनुची, जिन्होंने मुगल दरबार में काम किया था, ने दारा शिकोह की मृत्यु का विवरण लिखा है। उसके अनुसार, दारा के पकड़े जाने पर औरंगजेब ने अपने आदमियों को आदेश दिया कि दारा का सिर उसके पास लाया जाए और उसने यह सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह से निरीक्षण किया कि यह वास्तव में दारा था। फिर उसने तीन बार अपनी तलवार से सिर को काट दिया। जिसके बाद औरंगजेब ने सिर को एक बॉक्स में रखने का आदेश दिया और अपने बीमार पिता, शाहजहाँ को प्रस्तुत किया, जिसमें स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि जब राजा खाने के लिए बैठे तब यह बॉक्स उसके सामने प्रस्तुत किया जाए। सैनिक को यह भी निर्देश दिया गया था कि वह शाहजहाँ को सूचित करे कि राजा औरंगज़ेब  उसे (शाहजहाँ) को यह बताने के लिए प्लेट भेजता है कि वह उसे नहीं भूलता। शाहजहाँ तुरन्त खुश हो गया और कहा कि धन्य हो भगवान कि मेरा बेटा अभी भी मुझे याद करता है लेकिन बॉक्स खोलने पर शाहजहाँ भयभीत हो गया और बेहोश हो गया। कोई अपने भाई के लिए इतना निर्दयी कैसे हो सकता है लेकिन औरंगजेब ऐसा ही था। उसे इस बात से कोई मतलब नहीं था कि दारा उसका सगा भाई है, उसका उद्देश्य दारा को उसके अपराध के लिए भीषणतम दंड देना था। अपराध भी क्या, उस दूसरे धर्म के रहस्यों को जानना जो विश्व का एक महानतम धर्म है।

हिन्दू दारा शिकोह…….

भारतीय वांग्मय के प्रति गहरी आस्था रखता था दारा शिकोह। केवल भारतीय दर्शन की ज्ञान परंपरा ही नहीं अपितु भक्ति परंपरा को भी उसने भरपूर प्रोत्साहन दिया। दारा भारतवर्ष के जनमानस पर इस्लामिक कट्टरपंथ थोपे जाने के धुर विरोधी था। दारा ने उस काल में जजिया और अन्य धार्मिक करों को समाप्त करने का आह्वान किया। वह वास्तविक रूप से हिंदुत्व की सांस्कृतिक जीवनशैली को सम्पूर्ण विश्व में प्रसारित करने का पक्षधर था। सुन्नी समुदाय में जन्म लेने के बाद भी दारा भगवद्गीता और रामायण जैसे हिन्दू ग्रंथों से प्रेरित था और इनकी शिक्षाओं को शासन और प्रशासन के सिद्धांतों के रूप में अपनाए जाने की वकालत करता था। दारा एक वास्तविक हिन्दू था जिसने ये स्वीकार किया कि मजहब और संस्कृति दोनों को एकसाथ कैसे लेकर चला जा सकता है। वह अरबों और तुर्कियों के राजनैतिक साम्राज्यवाद का विरोधी था। वह मृत्यु और आत्मा के रहस्य को जान चुका था। उसे यह ज्ञात हो गया था कि मृत्यु केवल भौतिक शरीर को मार सकती है लेकिन आत्मा को नहीं। उसे पूरा भरोसा था कि एक दिन मुसलमान उसे समझ पाएंगे। सबसे बड़ी बात यह थी कि दारा की महान आस्था अपनी उस भूमि के प्रति थी जहाँ उसका जन्म हुआ था और वही तो एक हिन्दू होता है जो अपनी जन्मभूमि को अपने प्राणों से भी अधिक प्रेम करे।

आसिंधु सिंधु पर्यन्ता यस्य भारतभूमिका।
पितृभू: पुण्यभूश्चैव स वै हिंदुरिति स्मृत:॥

अर्थात जो भी यह कहता है कि सिन्धु नदी से लेकर हिंद महासागर तक फैली हुई भूमि उसकी पितृभूमि और पुण्यभूमि है वही हिन्दू है।

इतिहास का अन्याय…….

जितना अन्याय दारा के साथ उसके अपने मजहब ने नहीं किया उतना अन्याय इतिहासकारों ने उसके साथ किया। इस्लाम में जो स्थान दारा शिकोह को मिलना चाहिए था वो नहीं दिया गया। आखिर वो भी तो एक मुग़ल ही था फिर इतिहासकारों का मुग़लों के प्रति जागने वाला प्रेम दारा के लिए क्यों नहीं जागा। औरंगजेब ने भी भरपूर प्रयास किया उसकी पहचान को इतिहास के स्मृति पटल से मिटाने का। उसकी कई पुस्तकों और चित्रकलाओं को नष्ट कर दिया गया जिनमे काफ़िरों और उनकी महान परम्पराओं का वर्णन था। इतिहासकारों का कर्त्तव्य है इतिहास की व्याख्या करना लेकिन भारतवर्ष में इतिहासकारों ने इतिहास को बदलने का पाप किया। आक्रान्ताओं को मुसलमानों का नायक बनाया गया लेकिन जिन्होंने इस्लाम के उत्थान का कार्य किया उन्हें इतिहास में ही दफ़न कर दिया गया। कट्टरपंथी आक्रांताओं का महिमा मंडन केवल मुसलमानों तक सीमित नहीं था अपितु वामपंथी षडयंत्रकारियों, इतिहासकारों और उदारवादियों ने एक योजना के तहत हिंदुओं में भी इस भ्रामक तथ्य का खूब प्रचार किया कि मुग़ल उदारवादी और विकासशील थे। आज हिंदुओं से ज्यादा मुसलमानों के लिए दारा शिकोह को जानना आवश्यक है।

दारा शिकोह की दुर्गति ही मुग़लों के उदारवाद का प्रमाण है।

 

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