Temple

मध्य भारत का श्रृंगेरी मठ जहाँ हजार सालों से एक योद्धा उपासना करने आता है।

मध्य भारत का श्रृंगेरी मठ जहाँ हजार सालों से एक योद्धा उपासना करने आता है।

भारतवर्ष सदैव से ही धर्म और आस्था का केंद्र रहा। विश्व भर से जीवन के प्रश्नों की खोज करने वाले योगी, सन्यासी और श्रद्धालु यहाँ आए और यहीं के होकर रह गए। जिसने भारतवर्ष को जान लिया वह कभी वापस नहीं गया। भारतवर्ष के कोने कोने में ज्ञान और भक्ति रची बसी है। यहाँ के मठ – मंदिर सनातन काल से आस्था और श्रद्धा के प्रमुख स्थल रहे हैं। अनेकों बार इन मंदिरों से चमत्कार का प्रकाश उत्पन्न हुआ जो विज्ञान की अवधारणाओं से परे था लेकिन भक्त बिना किसी प्रश्न के अपनी आस्था पर अडिग रहे। ऐसा ही एक मंदिर मध्य प्रदेश के सतना जिले के मैहर नामक स्थान में है। हालाँकि मध्य प्रदेश की पिछली कांग्रेस सरकार द्वारा राजनैतिक कारणों से मैहर को एक अलग जिला बना दिया था लेकिन वर्तमान में कोरोना वायरस के संकट के कारण मैहर को जिला बनाने की प्रक्रिया पूर्ण नहीं की जा सकी है। मैहर में माता शारदा का मंदिर है जो त्रिकूट पर्वत पर स्थित है। आज इस लेख में इसी मंदिर की विस्तार से चर्चा की जाएगी।

भौगोलिक स्थिति :-

मैहर पूर्वी मध्य प्रदेश के सतना जिले में स्थित है। हावड़ा मुम्बई रेल मार्ग पर स्थित होने के कारण यहाँ कई ट्रेन रूकती हैं लेकिन सतना यहाँ का मुख्य स्टेशन माना जाता है क्योंकि सतना जंक्शन में लगभग सभी ट्रेनों का स्टॉपेज होता है। मैहर स्थित माता शारदा मंदिर त्रिकूट पर्वत की चोटी पर स्थित है। यह पर्वत मैहर रेलवे स्टेशन से लगभग 5 किमी की दूरी पर है।

Trikut Parvat situated in Maihar
Trikut Parvat (Maihar)

इतिहास :-

मैहर में माता के मंदिर का इतिहास लाखों वर्ष पुराना है। जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर भयंकर क्रोध में तांडव करने लगे तब भगवान विष्णु ने ब्रह्माण्ड की रक्षा करने के लिए अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के पार्थिव शरीर के 51 भाग कर दिए। भारतवर्ष में जहाँ भी ये भाग गिरे वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। मैहर भी भारत के 51 शक्तिपीठों में एक माना जाता है। मैहर में माता सती के गले का हार गिरा था जिस कारण इस स्थान का नाम मैहर पड़ गया। आधुनिक इतिहास में इस मंदिर का जीर्णोद्धार सबसे पहले बुंदेलखंड के महान योद्धा आल्हा ने करवाया। आल्हा और ऊदल दो भाई थे जो माता शारदा के अनन्य भक्त थे। आल्हा ने लगभग १२ वर्ष की तपस्या की जिससे उन्हें माता शारदा के दर्शन प्राप्त हुए और अमरत्व का वरदान मिला। गुरु शुक्राचार्य ने यहाँ सबसे पहले माता शारदा की पूजा की थी।

मंदिर का वर्णन एवं प्रमुख त्यौहार :-

मैहर के इस पवित्र मंदिर में जगत माता शारदाम्बिका की उपासना की जाती है। इसे मध्य भारत का श्रृंगेरी मठ भी कहा जाता है क्योंकि यहाँ विराजित माता शारदाम्बिका श्रृंगेरी की पूज्य देवी का ही रूप मानी जाती हैं। माता शारदाम्बिका, माँ सरस्वती की अवतार स्वरूप हैं जो पृथ्वी पर सनातन धर्म की स्थापना में आदि शंकराचार्य की सहायता के लिए आई थीं। उत्तर भारत में जो लोग श्रृंगेरी मठ तक नहीं जा सकते उनके लिए मैहर का माता शारदा मंदिर ही महान तीर्थ है। माता शारदाम्बिका विद्या एवं बुद्धिमत्ता की देवी हैं । इनकी उपासना से व्यक्ति को महान विचारशीलता की प्राप्ति होती है। वैसे तो यह स्थान सदैव ही श्रद्धालुओं से भरा रहता है किन्तु विशेष पर्वों पर यहाँ भीड़ बढ़ जाती है। सभी प्रकार की नवरात्रि यहाँ का विशेष त्यौहार हैं। नवरात्रि में भारतवर्ष के कोने कोने से लोग माता शारदाम्बिका के दर्शन के लिए मैहर आते हैं। नवरात्रि पर्व का प्रारम्भ महाभिषेक से होता है। इसके बाद चार दिन तक लक्षार्चन एवं देवी परायण होता है। अंत में नवमी के दिन शत चंडी यज्ञ एवं विद्यारंभ की पूजा होती है। इस दिन लोग अपनी संतान के विद्यारम्भ के आशीर्वाद की प्राप्ति के लिए मैहर पधारते हैं। इन नौ दिनों के दौरान माता शारदाम्बिका की उपासना महाकाली, ब्राह्मी, महेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, इन्द्राणी, चामुण्डेश्वरी एवं गजलक्ष्मी के रूप में होती है। मंदिर परिसर में माता शारदाम्बिका के अतिरिक्त काल भैरव, बाल गणेश, हनुमान, ब्रह्मा आदि देवों की प्रतिमाएं स्थापित हैं जिनकी उपासना का विशेष महत्व है। मैहर के मुख्य परिसर से लगभग 3 किमी की दूरी पर आल्हा का मंदिर, तालाब एवं अखाड़ा है। इसी अखाड़े में आल्हा और ऊदल कुश्ती लड़ा करते थे।

इस स्थान की विशेषता है कि आज भी यहाँ लगभग हजार वर्षों से आल्हा अपनी आराध्य देवी की उपासना करने के लिए ब्रह्म मुहूर्त में आते हैं। सुबह जब मंदिर के कपाट खोले जाते हैं तब जल और ताजे पुष्प मिलते हैं। यह प्रतिदिन होता है और सबसे अच्छी बात ये है कि उनकी इस उपासना में कोई किसी प्रकार का विघ्न नहीं डालता है।

अब तो मुख्य मंदिर तक पहुंचने के लिए प्रशासन द्वारा रोप वे की व्यवस्था कर दी गई है किंतु अभी भी श्रद्धालु लगभग 1100 सीढ़ियां चढ़कर अपनी जगतमाता के दर्शन के लिए जाते हैं। कहने का मतलब है कि सुविधाएँ लोगों की भक्ति और श्रद्धा को सीमाओं में नहीं बाँध सकती। कई लोग तो सैकड़ों किमी पैदल चलकर, पेट के बल लेटकर माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

इसी प्रकार की आस्था के लिए तो भारतवर्ष प्रसिद्ध है और जब तक यहाँ लोगों में श्रद्धा भक्ति का भाव जीवित रहेगा तब तक भारतवर्ष अजर अमर बना रहेगा। आप भारत के किसी भी कोने में रहते हो लेकिन यदि अवसर मिले तो मैहर की माता शारदाम्बिका के दर्शनों के लिए अवश्य आएं। यहाँ आने पर आप कभी भी खाली हाथ वापस नहीं जाएंगे। फिर कुछ लेना हमेशा जरूरी नहीं होता है। भारतवर्ष हमारी साझी विरासत का प्रतीक है और इसे एक्स्प्लोर करना हमारा कर्त्तव्य है।

जय श्री राम।। 

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