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Covid19 के बाद कितनी बदल जाएगी दुनिया?

ऐसा नहीं है कि विश्व इस समस्या का समाधान नहीं ढूंढ सकता और ये भी हो सकता है कि आने वाले कुछ महीनों में कोई देश Covid19 का इलाज ढूंढने में भी सफल हो जाए लेकिन इन सब अनिश्चिताओं के बीच एक बात निश्चित है कि अब से दुनिया की प्रवृत्ति परिवर्तित हो जाएगी। ये बदलाव क्या होंगे पढ़िए इस लेख में।

किसी ने भी ये नहीं सोचा होगा कि 2019 के आखिरी महीनों में जो दुनिया अमरीका और चीन के ट्रेड वॉर के समाधान की खोज कर रही थी वो आज अपने अस्तित्व को बचाने के लिए एक वैक्सीन की खोज में जुट जाएगी। समय ने एकाएक करवट ली और आज विश्व के बड़े से बड़े देश एक वायरस के आगे असहाय होकर घुटनों पर आ गए हैं। ऐसा नहीं है कि विश्व इस समस्या का समाधान नहीं ढूंढ सकता और ये भी हो सकता है कि आने वाले कुछ महीनों में कोई देश Covid19 का इलाज ढूंढने में भी सफल हो जाए लेकिन इन सब अनिश्चिताओं के बीच एक बात निश्चित है कि अब से दुनिया की प्रवृत्ति परिवर्तित हो जाएगी। जब हम कोरोना वायरस के इस दुष्चक्र से बाहर निकलेंगे तब हम एक नई कार्यात्मक शैली सीख चुके होंगे। राजनीति बदल चुकी होगी और वैश्वीकरण का अर्थ बदल जाएगा। आज इस लेख में ऐसे ही कुछ बदलावों की चर्चा की जाएगी।

जाने माने उद्योगपति और माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स ने कई वर्षों पहले कहा था कि अभी ये दुनिया किसी भयावह महामारी को झेलने के लिए तैयार नहीं हो पाई है और वायरस जनित महामारी तो दुनिया को भयंकर नुकसान पहुंचा सकती है। आज बिल गेट्स का कहा हुआ सत्य हो रहा है। पूरी दुनिया की ऐसी बुरी हालत क्यों हुई इसकी चर्चा हम बाद में करेंगे क्योंकि यह गहन शोध का विषय है लेकिन अभी ये जानते हैं कि इस महामारी के बाद दुनिया किस स्थिति में आगे बढ़ेगी।

इस लेख में आगे जो भी कहा जा रहा है वास्तव में वैसा होना चाहिए। ये वो सम्भावनाएं हैं जो दुनिया को नई राह दिखा सकती हैं बाकि सभी देश स्वतंत्र हैं और जो उनकी रणनीति के हिसाब से सही होगा वही किया जाएगा।

वैश्वीकरण :-

कोरोना वायरस के संकट के बीत जाने के बाद सबसे ज्यादा बहस वैश्वीकरण पर होगी। उस वैश्वीकरण पर जिसे दुनिया के लिए वरदान माना जा रहा था। इसके द्वारा देशों की सीमाएं खुली और आर्थिक, सामाजिक एवं कूटनीतिक आदान प्रदान प्रारम्भ हुआ। व्यापार की उन्नति का पर्याय बन चुके वैश्वीकरण के कारण कई देशों ने अपने भविष्य के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया लेकिन अब यह भूमण्डलीकरण सामान्य नहीं रह गया। अन्धाधुन्ध उदारता ने इसके महत्व को कम कर दिया। भले ही कोरोना वायरस का संक्रमण तीन या चार महीने पुराना है लेकिन अपनी सीमाओं की बंदी कई देशों ने प्रारम्भ कर दी थी जिनमें अमेरिका प्रमुख है। हालाँकि यह सीमाबन्दी कोरोना के संक्रमण से सम्बंधित नहीं है अपितु इसके आधार में अपने अपने देशों के हित सम्मिलित हैं। अब तो यह निश्चित है कि Covid19 के कारण बड़े बड़े देशों की जो दुर्दशा हुई है उसके कारण विश्व भर में वैश्वीकरण पर पुनर्विचार प्रारंभ हो जाएगा।

चीन पर लगातार यह आरोप लगाया जा रहा है कि उसने Covid19 के बारे में सही जानकारी दूसरे देशों को उपलब्ध नहीं कराई। इसके अलावा विश्व स्वास्थ्य संगठन का ढुल मुल रवैया भी विकास शील देशों के हित में नहीं रहा। ऐसे में कोरोना वायरस का खतरा लगातार बढ़ता चला गया। यदि चीन पर लगाए गए आरोप निराधार नहीं हैं तो चीन ने वैश्वीकरण की आधारभूत नीतियों का उल्लंघन किया है जिसका मूल्य अमेरिका और इटली जैसे देशों को चुकाना पड़ रहा है। वैश्वीकरण की पराकाष्ठा के इस समय में अब पूरी दुनिया पर एक भीषण आर्थिक संकट छा गया है जिससे सबसे अधिक विकासशील देश प्रभावित होंगे। हालाँकि देशों की व्यापार और विदेश सम्बन्धी नीतियां वैश्वीकरण का ही एक भाग हैं लेकिन प्रत्येक देश की अपनी प्राथमिकताएं हैं जिन्हें ध्यान में रखते हुए इनकी अलग अलग व्याख्या करना उचित होगा।

विदेश नीति :-

इस संकट के समय में विश्व ने अपने नेताओं का सामर्थ्य देखा है। देशों के मध्य आपसी सामंजस्य ने नई प्रकार की विदेश नीति के द्वार खोल दिए हैं। इसकी निश्चितता का अनुमान वर्तमान में नहीं लगाया जा सकता है किन्तु यदि इस पर रणनीतिक रूप से विचार किया जाए तो Covid19 के धुंध के उस पार की संभावनाओं को देखा जा सकता है। उदहारण के तौर पर भारतवर्ष की गतिविधियां देखी जाएं तो एक संतुष्टि का भाव उत्पन्न होता है क्योंकि भारतवर्ष की वर्तमान सरकार ने विदेशों में फंसे अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए जिस प्रकार अपनी विदेश नीति का उपयोग किया वो सराहनीय है। इसके अलावा कई देशों को संकट के समय में दवाओं की आपूर्ति की गई जिसने भारतवर्ष की विश्व कल्याण की परंपरा को उजागर किया। जब दक्षिण एशिया में कोरोना वायरस अपने पैर पसार रहा था तब भारतवर्ष के नेतृत्व में वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के माध्यम से दक्षिण एशिया के देशों की एक बैठक आयोजित की गई जहाँ जिसमे कोरोना वायरस के विरुद्ध एक ज्वाइंट एक्शन प्लान पर सहमति बनी। भारतवर्ष ने एक सराहनीय नेतृत्व का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए पाकिस्तान जैसे देश की उपस्थिति को स्वीकार किया और उसे बैठक में सम्मिलित किया। संकट के इस समय ने देशों को अपने मित्र और शत्रु की पहचान करा दी। अब आने वाले भविष्य में देश इस समय को याद करेंगे और विदेश नीति से सम्बंधित अपनी प्राथमिकताएं तय करेंगे।

व्यापार नीति :-

सबसे बड़ा परिवर्तन व्यापार के क्षेत्र में होने जा रहा है। यह परिवर्तन इतना प्रभावकारी होगा कि इसकी गूँज आने वाले कई वर्षों तक होगी और वैश्विक व्यापार की दिशा और दशा बदल जाएगी। यदि चीन की लापरवाही या किसी षड़यंत्र की पुष्टि होती है तो चीन को एक बड़ा प्रतिबंध झेलना पड़ सकता है, साथ ही चीन में निर्माण कार्य करने वाली कंपनियां नए ठिकानों की खोज करेंगी। इनमें भारतवर्ष, थाईलैंड और विएतनाम जैसे नए ठिकाने प्रमुख आकर्षण बन सकते हैं। चीन पर एक और आरोप यह लगाया जा रहा है कि चीन संस्थागत निवेश के साधनों का उपयोग करके कई अल्प विकसित देशों और छोटी अर्थव्यवस्थाओं पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। यदि यह आरोप सिद्ध होते हैं तो कई देश अपनी बाह्य निवेश नीतियों को बदल देंगे। हालाँकि भारतवर्ष ने इसकी शुरुआत कर दी है क्योंकि चीन का पड़ोसी होने के नाते भारतवर्ष को अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है।

कोरोना वायरस संकट के पहले भी पूरा विश्व एक आर्थिक मंदी की दहलीज पर खड़ा था जिसका प्रमुख कारण अमेरिका और चीन का ट्रेड वॉर था। अब हालात और भी ख़राब होने जा रहे हैं क्योंकि यदि Covid19 को जल्दी ही समाप्त नहीं किया गया अथवा उसके प्रभाव को कम करने के उपाय नहीं सोचे गए तो सम्पूर्ण विश्व का आर्थिक स्वास्थ्य गड़बड़ा सकता है। देशों की परस्पर आर्थिक निर्भरता के कारण ऐसी परिस्थितियां निर्मित हुई। इस संकटकाल के बीत जाने के बाद निश्चित तौर पर देशों की व्यापारिक नीतियों में परिवर्तन देखने को मिलेगा क्योंकि जिन देशों ने क्षमतावान होने के बाद भी दूसरे देशों पर अपनी निर्भरता को कम नहीं किया वो आगे अपने देश के आर्थिक सशक्तिकरण के प्रश्न पर विचार करेंगे।

अन्य क्षेत्र :-

एक बात तो है कि अपने आप को विकसित एवं अग्रणी श्रेणी में गिनने वाले देशों का अनुभव बुरा रहा। विश्व भर में स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में जो देश सबसे आगे खड़े दिखाई देते थे आज वही सबसे ज्यादा कोरोना वायरस से प्रभावित हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि सुविधाओं के होने के बाद भी ऐसे संकट काल में किसी भी देश की स्थिति अनिश्चित हो सकती है। इसके पीछे प्रमुख कारण है अनियन्त्रित कार्यात्मक शैली एवं अनुशासनहीनता। कई देशों के नागरिकों ने कोरोना वायरस को गंभीरता से नहीं लिया और लगातार लापरवाही करते रहे जिसके परिणाम स्वरुप इन देशों में Covid19 के केस बढ़ते चले गए। भारतवर्ष ने लगातार इससे बचाव के प्रयत्न किए और सम्पूर्ण लॉक डाउन की घोषणा की लेकिन भारतवर्ष में भी लोगों की लापरवाही देखने को मिली।

कार्यक्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है जिसे “वर्क फ्रॉम होम” कहा जा रहा है। हालाँकि इसका अस्तित्व पहले भी था लेकिन अब इसे मुख्य धारा में सम्मिलित करने की योजना बनाई जा रही है। वर्क फ्रॉम होम के जरिए कंपनियां अपने खर्च को कम करते हुए अपनी दक्षता को बढ़ाने के विषय में विचार करेंगी। इससे कर्मचारियों की कार्यकुशलता बढ़ेगी, विशेषकर सूचना एवं प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में। इस प्रवृत्ति के कारण एक नई प्रकार की अर्थव्यवस्था का जन्म हो सकता है। निश्चित तौर पर यह संकट एक अवसर लेकर आया है अपनी नीतियों के विषय में पुनर्विचार करने का।

एक महत्वपूर्ण पहलू है पर्यावरण और धरती के स्वास्थ्य का। आज भारतवर्ष ही नहीं पूरी दुनिया पर्यावरण में हुए असाधारण परिवर्तन को देख रही है। जब तमाम देश अपने अपने स्तर पर ग्लोबल वार्मिंग और अन्य पर्यावरणीय समस्याओं से लड़ रहे हैं तब कोरोना का यह संकट पर्यावरण की सुरक्षा और समावेशी विकास के नए उपायों पर प्रकाश डाल सकता है। देशों को यह सोचना चाहिए की किस प्रकार पृथ्वी को हानि पहुंचाए बिना भी विकास कार्य किए जा सकते हैं। इसके लिए लॉक डाउन जैसे नए विचारों पर भी मंथन किया जाना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का दायित्व ऐसे में बढ़ जाता है लेकिन इन संस्थाओं को निष्पक्षता के साथ कार्य करना चाहिए और ऐसी नीतियां बनाने से बचना चाहिए जो विकास शील देशों के हित में न हो।

भारतवर्ष के सन्दर्भ में :-

कोरोना वायरस का यह संकट विश्व के लिए एक अवसर हो या न हो किन्तु भारतवर्ष के लिए अवश्य है क्योंकि भारतवर्ष की प्रवृत्ति संकट काल में भी अवसरों की खोज करने की रही है। यह सही भी है क्योंकि भारतवर्ष की क्षमताएं असीमित हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात कि यह समय अपनी नीतियों के संबंध में पुनर्विचार करने का है। हमारे राष्ट्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अभी भी अनंत संभावनाएं बाक़ी हैं। कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों के विकास के लिए नई नीतियों पर आधारित प्रयत्न किया जाना चाहिए। समय आ चुका है जब ग्रामीण क्षेत्रों से होने वाला प्रवासन रोकने के लिए राज्यों को सक्रिय रूप से रोजगार निर्माण की दिशा में कार्य करना होगा। लघु एवं कुटीर उद्योग को महत्व देना होगा। ऐसा प्रयास किया जाना चाहिए जिससे अधिक से अधिक उत्पादन अपने ही देश में प्रारम्भ हो और गाँवों की आत्मनिर्भरता बढे। गाँव और नगरों के संबंधों को पुनर्परिभाषित करना होगा। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश की सरकार ने अपने राज्य के लगभग 15 लाख ऐसे लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने की प्राथमिकता पर कार्य प्रारम्भ किया है जो राज्य के बाहर अन्य दूसरे राज्यों में काम करते हैं। एक राज्य से दूसरे राज्य में काम करना गलत नहीं है अपितु इससे भारतवर्ष की अखंडता का विकास होता है किन्तु यह सही भी एक निश्चित सीमा तक है। अधिक प्रवासन से नगरों के ऊपर भार बढ़ता है और संकट काल में इन कामगारों की उत्तर जीविता पर भी खतरा बढ़ जाता है।

सामाजिक क्षेत्र में भी कार्य किया जाना बाकी है क्योंकि भारतवर्ष में अनुशासन की कमी देखने को मिली है। तब्लीगी जमात के सदस्यों ने जिस प्रकार व्यवहार किया उसने एक प्रश्न खड़ा कर दिया है। प्रश्न है युद्ध काल या ऐसी ही भीषण महामारी के समय में सामाजिक सुरक्षा को बनाए रखने का। भारतवर्ष निश्चित तौर पर अपने खुफिया तंत्र के सशक्तिकरण पर कार्य करेगा। इसके अलावा हमें भी भारतवर्ष के नागरिक होने के तौर पर समाज के दुश्मनों को पहचानना होगा और उनके कार्यकलापों की भर्त्सना करनी होगी।

इसके अलावा भारतवर्ष में अब लोगों में अपने राष्ट्र को लेकर गौरव का भाव उत्पन्न होगा क्योंकि आज तक विकसित देशों के प्रति जो धारणा बनी थी वह अब टूट रही है। पूरी दुनिया देख रही है कि भारतवर्ष की क्षमताएँ कितनी हैं और इस कोरोना वायरस के संकट के समय में भारतवर्ष वैश्विक नेतृत्व कर रहा है। इसका श्रेय भारतवर्ष के प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी को अवश्य दिया जाना चाहिए। लोगों को अपने उपलब्ध संसाधनों का मूल्य समझ में आएगा। विदेशों में शिक्षा और रोजगार प्राप्त करने की प्रवृत्ति कम होगी। शहरों की ओर पलायन कम होगा और कृषि कार्यों में वृद्धि दिखाई देगी। कोरोना वायरस के इस झटके से लोगों में आसक्ति का भाव कम होगा।

ऐसे बहुत से परिवर्तन हैं जो अगले कुछ महीनों में देखने को मिलेंगे। सरकार इस अवसर का लाभ निश्चित ही उठाएगी और उठाना भी चाहिए क्योंकि भारतवर्ष एक महान एवं समावेशी अर्थव्यवस्था बनने की पूरी क्षमता रखता है।

 

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