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अब समय आ गया है भारतवर्ष की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण का।

अब जबकि विश्व एक भयंकर आर्थिक मंदी के मुहाने पर खड़ा है तब भारतवर्ष के पास यह अवसर है कि एक नई आर्थिक नीति का निर्माण किया जाए जो ग्रामीण उत्थान से जुडी हो क्योंकि भारतवर्ष का ग्रामीण क्षेत्र अभी भी अर्थव्यवस्था में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान नहीं दे पाया है।

सम्पूर्ण विश्व पर कोरोना के प्रभाव के कारण न केवल स्वास्थ्य का संकट मंडरा रहा है अपितु एक विशाल आर्थिक संकट भी मुंह बाए खड़ा है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुमान के अनुसार वर्तमान वित्तीय वर्ष में कई देशों की विकास दर नकारात्मक रहने की संभावना है। केवल भारतवर्ष और चीन ही दो ऐसे देश होंगे जो बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगे। लेकिन आंकड़ों की भूल भुलैया में न उलझते हुए हम बात करते हैं उस सम्भावना की जो भारतवर्ष को आर्थिक मोर्चे पर आगे लेकर जाएगी। अब जबकि विश्व एक भयंकर आर्थिक मंदी के मुहाने पर खड़ा है तब भारतवर्ष के पास यह अवसर है कि एक नई आर्थिक नीति का निर्माण किया जाए जो ग्रामीण उत्थान से जुडी हो क्योंकि भारतवर्ष का ग्रामीण क्षेत्र अभी भी अर्थव्यवस्था में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान नहीं दे पाया है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहाँ संसाधनों की उपलब्धता और उनका उपभोग एक नियत प्रवित्ति के भाग हैं। यह प्रवित्ति ग्रामीण क्षेत्रों को समावेशी बनती है। ऐसे में उपभोग की सीमा आवश्यकता के अनुरूप ही होती है। भारतवर्ष एक कृषि प्रधान राष्ट्र है। कृषि सदैव से ही पालन पोषण से सम्बंधित रही है। चाहे अनौपचारिक क्षेत्र में रोजगार उत्पन्न करने की बात हो या इस विशाल राष्ट्र की अनाज आपूर्ति की, भारतवर्ष की ग्रामीण स्वायत्तता तत्परता से अपने कर्त्तव्य पथ पर गतिशील रही। ग्रामीण भारतवर्ष की इसी गतिशीलता को लगातार बढ़ाने के लिए अब अवसर पर आधारित नीतियों का निर्माण करना होगा। घरेलू उद्योग की तमाम आवश्यकताएँ ग्रामीण क्षेत्रों से पूरी की जा सकती हैं। खाद्य प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन के विषय में ग्रामीण क्षेत्रों में अनेकों अवसर हैं। सबसे पहली आवश्यकता कार्यबल की है जो ग्रामीण जनसँख्या से पूरी की जा सकती है। ऐसे में गाँवों में कौशल विकास को विशेष महत्व देते हुए घर घर तक इस कार्यक्रम को पहुँचाने की आवश्यकता है।

भारतवर्ष के कृषि एवं खाद्य आधारित निर्यात को बढ़ाने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों की सक्रिय सहभागिता आवश्यक है। Covid19 के कारण कई अन्य देशों में जो खाद्य सुरक्षा का संकट उत्पन्न होगा उसकी आपूर्ति करने के लिए भारतवर्ष का कृषिगत निर्यात पूरी तरह से तैयार होना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में लघु औद्योगिक क्लस्टर बना कर खाद्य प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन से संबंधित निर्माण प्रक्रियाओं को लगातार बढ़ाया जा सकता है। इसका सबसे बड़ा लाभ होगा कृषि के साथ अन्य संबद्ध क्षेत्रों का विकास। पैकेजिंग को सुदृढ़ बनाने के लिए तत्परता दिखानी होगी और ऑनलाइन प्रक्रिआओं का उपयोग करके ग्रामीण क्षेत्रों में पैकेजिंग व्यवस्था को बहुतायत में स्थापित करना होगा।

भारतवर्ष के गाँवों की रीढ़ हैं उनके स्वयं सहायता समूह जो लाखों की संख्या में हैं और इन समूहों में सदस्यों की संख्या भी अच्छी खासी है। ये स्वयं सहायता समूह आर्थिक विकास की महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकते हैं। इन समूहों का उपयोग अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच बनाने में किया जाना चाहिए। हालाँकि वर्तमान सरकार इनका बेहतर तरीके से उपयोग कर भी रही है।

इसके बाद एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है जहाँ विशेष कार्य किया जा सकता है। यह हस्तशिल्प तथा उससे जुड़े अन्य उत्पादों से सम्बंधित है। भारतवर्ष का ग्रामीण क्षेत्र हस्तशिल्प की कला से संपन्न है ऐसे में यह एक सुव्यवस्थित लघु तथा मध्यम उद्योग के रूप में विकसित किया जा सकता है। इसके लिए एक अनूठी मार्केटिंग रणनीति की आवश्यकता है जिससे आर्थिक लाभ प्राप्त करने के साथ हस्तशिल्पिओं के हितों की रक्षा भी की जा सके। वास्तव में भारतवर्ष की जो कलाएं उसके ग्रामीण परिवेश में आज भी फल फूल रही हैं उनके सशक्तिकरण से सांस्कृतिक एवं सभ्यता विकास का मार्ग भी प्रशस्त होगा।

ग्रामीण विकास में तकनीकी की महती आवश्यकता है। रियल टाइम डाटा असेसमेंट, आधार, ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क, पंचायत डैशबोर्ड जैसे कई तकनीकी आधारित नवाचारों के माध्यम से सरकार ग्रामीण विकास की प्रक्रिया को सुलभ और सरल बनाने में जुटी है लेकिन इस प्रक्रिया को और भी तेज करना होगा। वास्तव में तकनीकी आधारित क्रियाकलाप कौशल विकास और तकनीकी शिक्षा की आवश्यकता पर भी जोर देते हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए भी स्वयं सहायता समूहों का उपयोग किया जा सकता है। इन समूहों के माध्यम से तकनीकी शिक्षा को आम जनों तक सरलता से पहुँचाया जा सकता है। वैसे भी कॉमन सर्विस सेंटर के माध्यम से सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत कर चुकी है किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि अब सम्भावनाएं नहीं बची हैं।

आज के इस तकनीकी के परिवेश में कुछ भी नियत नहीं है। आज डाटा संग्रहण की जो तकनीकी सरकार उपयोग कर रही है, हो सकता है भविष्य में उससे भी बेहतर स्थिति हो जाए। ऐसे में निजी एवं स्वयंसेवी संस्थाओं का भी यह कर्तव्य है कि नई तकनीकी के माध्यम से ग्रामीण विकास की प्रक्रिया में सहायक बनें।

भारतवर्ष के गाँव ही उसकी आत्मा हैं और आत्मा का स्वरूप नहीं बदला जा सकता है। इसका तात्पर्य यह है कि आवश्यक नहीं कि हम अपने गाँवों को शहर बनाने का प्रयास करें। गाँवों को यदि गाँव ही बने रहने दिया जाए तो भी भारतवर्ष की तस्वीर बदली जा सकती है। आवश्यकता है एक सही और सुव्यवस्थित मार्ग की, गाँवों की विशेषताओं को और भी सुदृढ़ बनाने की, क्योंकि गाँवों के विकास से ही सांस्कृतिक विकास भी जुड़ा है। किसी भी राष्ट्र का विकास तभी सम्पूर्ण माना जा सकता है जब उसका सर्वांगीण विकास हो न कि क्षेत्र आधारित।

भारतवर्ष की समृद्धि के लिए आवश्यक है कि हमारे गाँव भी संपन्न हों और गाँवों की सम्पन्नता से एक एक व्यक्ति का सर्वांगीण उत्थान संभव हो सकेगा।

वन्दे मातरम।।                 

 

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