आखिर रामानंद सागर के जैसी रामायण दोबारा क्यों नहीं बनाई जा सकी? पढ़िए ये लेख…

विश्व भर में कोरोना वायरस के कारण एक महान संकट मुँह फैलाए खड़ा है। कई विकसित और अग्रणी देश भी इस संकट से भीषण रूप से प्रभावित है। भारतवर्ष भी इससे अछूता नहीं है। हालाँकि भारतवर्ष में हालात अमेरिका, फ्रांस और इटली जैसे नहीं हैं। सबसे बड़ी बात थी कि राष्ट्र के हालात इन देशों के समान न हों इसलिए भारतवर्ष में 21 दिनों के लिए लॉक डाउन की घोषणा की गई। पूरा भारतवर्ष जहाँ था वहीं रुक गया। लोग अपने घरों में कैद होकर रह गए। ऐसे में राष्ट्र के नागरिकों के समय के सदुपयोग और उनके चारित्रिक उत्थान हेतु दूरदर्शन में पुनः एक बार रामायण और महाभारत का प्रसारण किया गया। दोनों में से रामायण पुरानी है चाहे इतिहास की बात हो या टीवी पर प्रसारण की। आज इस लेख में हम रामायण की बात करेंगे और इस बात का विश्लेषण करेंगे कि ऐसा क्या कारण था जो श्री रामानंद सागर द्वारा बनाई गई रामायण के समान दूसरी रामकथा नहीं बनाई जा सकी।

रामायण का प्रसारण दूरदर्शन में 1987- 88 के दौरान हुआ। हालाँकि तब मेरा अस्तित्व ही नहीं था किन्तु जो लोग रामायण को बड़ी ही भक्ति और श्रद्धा से देखते थे उनके अनुसार रामायण के प्रसारण के समय भारतवर्ष में एक स्वघोषित कर्फ्यू जैसा वातावरण बन जाता था। दर्शक सुबह से पूजा पाठ करके, अपने दैनिक कार्यों को पूरा करके, जमीन पर बैठकर रामायण देखते थे। ये भी बताया जाता है कि लोग टीवी के सामने धूप और दीप भी जला लिया करते थे। ऐसा हो भी क्यों न क्योंकि भगवान श्री राम इस भारतवर्ष के महान आदर्श हैं। भगवान श्री राम के नैतिक मूल्यों को आम जनों में स्थापित करने में श्री रामानंद सागर का योगदान दशकों तक भारतवर्ष के स्मृति पटल में अंकित रहेगा।

इस रामायण की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसे बनाने में किसी प्रकार के प्रपंच का कोई उपयोग नहीं किया गया था। यह सीरियल पूर्णतः पौराणिक दस्तावेजों पर आधारित था। इसमें किसी भी प्रकार की हेरफेर नहीं की गई थी। भगवान श्री राम के जीवन चरित्र पर जो भी महर्षि वाल्मीकि और गोस्वामी तुलसीदास लिख गए थे उन्ही संवादों और छंदों का उपयोग करके पूरी रामायण बनाई गई। श्री रविन्द्र जैन ने रामायण की यात्रा को अत्यन्त कर्णप्रिय बना दिया। श्रीरामचरितमानस के दोहे और छंद संगीत के साथ उपयोग किए गए। नीति और मर्यादा आधारित संवादों में इनका विशेष तौर पर उपयोग किया गया।

भगवान श्रीराम का युग अनेकों आदर्शों को स्थापित करने वाला है। उस युग से भातृप्रेम, पितृप्रेम, कर्त्तव्यनिष्ठा, वचनबद्धता और भक्ति के जो अंकुर फूटे उनसे तैयार हुआ वटवृक्ष आज भी भारतवर्ष को नीतियों और मर्यादा की छाया प्रदान कर रहा है। श्री रामानंद सागर जी ने उस परंपरा को बनाए रखा। टीवी की इस रामायण की एक और महान विशेषता यह है कि इसमें जहाँ भी संन्यास, योग, तप और साधना की बात हुई वहां श्रीकृष्ण द्वारा कही गई गीता की सुंगध आई। हो सकता है कि संवाद लिखते समय लेखक को गीता का भरपूर ज्ञान रहा हो किन्तु यह भी सत्य है कि चाहे गीता हो या रामायण, सबका सारांश एक ही है।

इसके बाद यह समझना कठिन नहीं रह जाता कि आज जबकि तकनीकी ने अभूतपूर्व प्रगति कर ली है और संसाधनों की सुलभता है तब नब्बे के दशक में आई रामायण के जैसा कोई पौराणिक टीवी शो क्यों नहीं बनाया जा सका। सन 2000 के बाद कई टीवी शो बने जो हमारे देवों और देवियों पर आधारित थे। अलग अलग समय में विभिन्न निर्माताओं द्वारा हमारे पुराणों पर आधारित सीरियल बनाने का प्रयास हुआ लेकिन तकनीकी और संसाधनों का उपयोग करने के बाद भी वो श्री रामानंद सागर की रामायण की बराबरी नहीं कर सके। यह सब विचारों की मौलिकता और समझ का खेल है। सबसे पहले हमें समझना होगा कि रामायण तकनीकी से नहीं अपितु पवित्रता से बनी है। VFX से दृश्यों को चमत्कारिक और लुभावना तो बनाया जा सकता है किन्तु VFX मर्म और विचार निर्मित नहीं कर सकते। वर्तमान निर्माताओं और निर्देशकों ने पौराणिक तथ्यों का उल्लंघन करते हुए केवल प्रपंच रचा। एक सास बहु के झगड़े और परिवारिक षडयन्त्रों पर आधारित टीवी सीरियलों की भाँति धार्मिक सीरियलों में भी मसाला डालने का प्रयास किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि शो लम्बा तो खिंच गया लेकिन मर्म जाता रहा। विचार निर्माण का लक्ष्य भूल कर तकनीकी के अंधाधुंध प्रयोग ने हमारे पौराणिक और वैदिक तथ्यों को माइथोलॉजी बना दिया। मैं ये नहीं कह रहा हूँ कि इस क्षेत्र में कुशल तथा योग्य व्यक्तियों की कमी है। कई लोगों ने अच्छे काम भी किये हैं लेकिन अधिकतर लोगों ने भगवान् श्रीराम, श्री कृष्ण और अन्य पौराणिक महान राष्ट्र निर्माताओं के चरित्र और ऐतिहासिक अस्तित्व के साथ न्याय नहीं किया। हम इससे भी अच्छा कर सकते थे। हमें ये समझना होगा कि हमारे पुराण और रामायण, महाभारत जैसे महाकाव्य माइथोलॉजी नहीं हैं। ये हमारा इतिहास हैं। इनको समाज के सामने चलचित्र के रूप में प्रदर्शित करने से पहले हमारा उद्देश्य इनका तकनीकी चित्रण न होकर वैचारिक प्रचार प्रसार होना चाहिए। समय यही कहता है कि श्रीराम और श्री हनुमान जैसे महान आदर्शवान नायकों को समाज में राष्ट्र निर्माताओं के तौर पर स्थापित किया जाना चाहिए। वैसे भी श्रीराम हमारे भारतवर्ष का अभिमान हैं, राष्ट्र नायक हैं।

आप उपनिषद गंगा का ही उदाहरण ले सकते हैं। जिसका मात्र मंचन हुआ है किन्तु किस प्रकार कुछ मुट्ठीभर कलाकारों द्वारा सम्पूर्ण सनातन को संवादों और भावों से सुसज्जित करके समाज के सामने लाया गया। आवश्यकता विचार निर्माण की है न कि तकनीकी के प्रदर्शन की। मैं तकनीकी विरोधी नहीं हूँ किन्तु अति सर्वत्र वर्जयेत। जैसे तकनीकी हमारी मानविक संवेदनाएं नहीं बदल सकती उसी प्रकार विचारों के निर्माण में भी तकनीकी सर्वदा सहायक नहीं हो सकती। हाँ विचारों को आम जनों तक पहुँचाने में तकनीकी को सहायक बनाया जा सकता है।

आशा है कि जब हम इस कोरोना वायरस के संकट से बाहर आएँगे तब हम अपने भीतर श्रीराम प्रभु के आदर्शों और श्रीकृष्ण के राष्ट्रधर्म को अपने भीतर सहेजे हुए होंगे। भारतवर्ष के निर्माण में दूरदर्शन की यह पहल सहायक बने यही प्रार्थना है श्रीराम से।

जय श्री राम।। 

Leave a Reply