Hindutva Yatra

हिंदुत्व यात्रा : भाग 1 हिंदुत्व की प्रस्तावना।

हिंदुत्व यात्रा : भाग 1 हिंदुत्व की प्रस्तावना। इस लेख में हिंदुत्व की प्रस्तावना कही गई है। जिस प्रकार से भारतवर्ष में लगातार हिंदुत्व की कीर्ति को मलीन करने का षड़यंत्र किया जाता रहा है उससे निपटना भारतवर्ष के भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।

यह हिंदुत्व यात्रा श्रृंखला का पहला लेख है। इससे पहले कि हम आगे बढ़ें, हम अपने बचपन के बारे में थोड़ा बात करते हैं। हमारे विद्यालय के दिनों में हमें अपने पाठ्यक्रम के रूप में भारतीय भाषाओं का लाभ उठाना था। अंग्रेजी अनिवार्य थी और हिंदी, संस्कृत, तमिल और अन्य भारतीय भाषाओं को हमारी रुचि और सुगमता के अनुसार हमारे द्वारा चुना गया था। अब परीक्षा के समय पर आते हैं। हमारी भाषा के प्रश्न पत्र में एक खंड था जिसे अपठित गद्यांश कहा जाता था। इस खंड में, विभिन्न स्कूल बोर्डों के मानदंडों के अनुसार कुछ 500 से 1000 शब्दों में एक अपठित गद्यांश दिया गया था। हमें सारांश लिखना होता था और शब्द सीमा, उचित शीर्षक और कई अन्य निर्देशों के साथ इन अपठित गद्यांशों को हल करना होता था। सारांश के लिए शब्द सीमा 100 से 150 शब्दों की होती थी। हमने दिए गए शब्द सीमा के भीतर एक शानदार सारांश लिखने की पूरी कोशिश की। जिसने भी सही सारांश लिखा उसे सबसे अच्छे अंक मिले। लेकिन यह कैसे निर्धारित किया गया था कि सबसे अच्छा सारांश किसने लिखा है? यह पर्यवेक्षक या चेकर निर्धारित करता था जिसके पास मॉडल सारांश और शीर्षक था। जो भी उत्तर इस मॉडल सारांश के सबसे करीब था, उसे सबसे अच्छे अंक प्राप्त होते थे।

अब मैं हिंदुत्व पर अपनी बात पर आता हूं।

1000 या इससे अधिक शब्दों का दिया गया अपठित गद्यांश ही सनातन  है और हम सभी ऐसे छात्र हैं जिन्हें उत्तीर्ण होना है। सनातन  के लिए दिया गया मॉडल सारांश हिंदुत्व  है। हम जानते  हैं कि हम में से कई लोग अपने इस एकल जीवन में पूरे सनातन  को समझने की स्थिति में नहीं हैं। यह सनातन धर्म  से परिचित होने के लिए हमारी ग्रहण करने की शक्ति पर निर्भर करता है। महान सनातन  का पूर्ण ज्ञान होने का दावा कोई नहीं कर सकता। हमारे पूर्वजों को इस तथ्य के बारे में पर्याप्त जानकारी थी इसलिए उन्होंने मॉडल सारांश का एक सेट तैयार किया जो सनातन  को एक बहुत ही सामान्य हिंदू  से संबंधित कर सकता है। यही मॉडल सेट हिंदुत्व  है। हिंदुत्व  हम सभी को अपनी वैचारिक पहचान को सशक्त बनाने में मदद करता है। जो लोग इस सारांश को अच्छी तरह समझते हैं, वे बिना किसी हिचकिचाहट के खुद को हिंदुत्व  का गौरवशाली अनुयायी घोषित करते हैं।

मैं दार्शनिक तरीके से हिंदुत्व  का वर्णन नहीं करूंगा क्योंकि हिंदुत्व  का दर्शन हमारे लिए नया नहीं है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय, बाल गंगाधर तिलक, चंद्रनाथ बसु  और विनायक दामोदर सावरकर  जैसे कई महान विद्वानों ने हिंदुत्व का वर्णन किया था। लेकिन मैं सनातन  धर्म की छाया में पोषित हिंदुत्व  के गौरव की बात करूंगा।

हिन्दुत्व  एक सांस्कृतिक पहचान के साथ ही साथ राष्ट्रवाद  का अप्रतिम स्वरुप है। धर्म और राष्ट्र का जो अन्तर्सम्बन्ध हमारे सामने है उसका मूल हिंदुत्व  ही है। असल में राष्ट्र और धर्म को अलग करके देखना असंभव है। जो धर्मनिरपेक्ष हैं वो अंतिम तौर पर बहुसंख्यक के विरोध में दूसरी ओर ही खड़े हैं। ऐसे में क्या राष्ट्र को धर्म से अलग कर देना उचित है? यह प्रश्न दशकों से भारतवर्ष के सामने सुरसा के समान मुख फैलाये खड़ा था जिससे बाहर निकलना भारतवर्ष के लिए आवश्यक था। ऐसे में कुछ महान विचारकों ने हमें वह मार्ग सुझाया जो सबके हित में है। यही मार्ग हिंदुत्व  का है। भारतवर्ष भले ही धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बन गया है किन्तु उसकी आत्मा से हिन्दुत्व को पृथक नहीं किया जा सकेगा।

अब प्रश्न उठता है कि हिंदुत्व  की गलत व्याख्या करने वाले या हिंदुत्व  को बदनाम करने वाले लोगों को किस प्रकार की समस्या है? इसका उत्तर भी अपठित गद्यांश वाले उदाहरण से ही समझा जा सकता है। हमारे विद्यालयों में कई ऐसे भी विद्यार्थी भी होते थे जिन्हे दिए गए गद्यांश का एक वाक्य भी समझ में नहीं आता था। ऐसे में ये विद्यार्थी उस गद्यांश के सारांश के नाम पर फ़िल्मी गाने और आल जुलूल कहानियां छाप आया करते थे। अब इन्हे शून्य नंबर दिए जाते थे किन्तु यही विद्यार्थी चिल्ला चिल्ला कर पर्यवेक्षक को ही दोषी बना देते थे। यही हाल हिंदुत्व  के मामले में भी है। जिन्हे सनातन  का रत्ती भर ज्ञान नहीं है या जो जानबूझ कर सनातन  को भारतवर्ष के स्मृति पटल से मिटा देना चाहते हैं वही हिंदुत्व  की बेसिरपैर आलोचना करते हैं।

जो हिंदुत्व  हम भारतवर्ष के निवासियों की जीवन शैली है उसे वामपंथी बुद्धिजीवी और इतिहासकार मात्र इस कारण दुत्कारते हैं क्योंकि उनके हिसाब से विनायक दामोदर सावरकर  हिंदुत्व  के विचार के जनक हैं जबकि ऐसा नहीं है। हिंदुत्व  का अस्तित्व वीर सावरकर  के पहले भी था। वीर सावरकर  ने तो हिंदुत्व  को एक मौलिक विचार के रूप में मात्र प्रचारित किया। इसके द्वारा वह हमारी सोई हुई चेतना को जगाना चाहते थे।

भारतवर्ष के शत्रु यही तो नहीं चाहते कि हमारी सुप्त चेतना जागृत हो। इसी कारण लगातार वीर सावरकर  की ढाल बनाकर हिन्दुत्व  को मलीन करने का प्रयास जारी रहा। किन्तु इस राष्ट्र को खंड खंड करना इतना सहज नहीं है। हिंदुत्व  भारतवर्ष की महान आत्मा है और इस पर किसी भी प्रकार का आघात सहन नहीं किया जाएगा।

हिंदुत्व यात्रा के अगले लेख में हम हिंदुत्व  और Hinduism के मध्य उपस्थित अंतर को समझने का प्रयास करेंगे। यह भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है क्योंकि Hinduism का उपयोग हिन्दुत्व  के विरोध में लगातार किया जाता रहा है।

वन्दे मातरम।।      

 

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