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रजोधर्म का महोत्सव: अम्बुबाची पर्व।

हिन्दू सनातन धर्म जितना पुरातन और महान है, उतना ही समावेशी और सुन्दर भी। सभी के लिए कुछ विशेष नियम और स्थान निर्धारित किए गए हैं। जल स्त्रोत हों या वृक्ष, पशु -पक्षी हो या मानव सभी पूज्य हैं। इनसे जुड़े कितने ही त्यौहार सनातन के भीतर समाहित हैं। प्रकृति को माँ का स्थान दिया जाता है और इसी माँ की एक विशेष क्षमता को समर्पित त्यौहार है, अम्बुबाची पर्व जो असम के कामाख्या शक्तिपीठ में मनाया जाता है।
Ambubachi festival in Guwahati
Photo Credit : Indian Express

हिन्दू सनातन धर्म जितना पुरातन और महान है, उतना ही समावेशी और सुन्दर भी। सभी के लिए कुछ विशेष नियम और स्थान निर्धारित किए गए हैं। जल स्त्रोत हों या वृक्ष, पशु -पक्षी हो या मानव सभी पूज्य हैं। इनसे जुड़े कितने ही त्यौहार सनातन के भीतर समाहित हैं। प्रकृति को माँ का स्थान दिया जाता है और इसी माँ की एक विशेष क्षमता को समर्पित त्यौहार है, अम्बुबाची पर्व जो असम के कामाख्या शक्तिपीठ में मनाया जाता है।

वैसे तो वामपंथी इतिहासकारों ने पूरा प्रयास किया ताकि सनातन पर प्रश्न उठाये जा सके किन्तु सनातन की समवेशी प्रवृत्ति स्वतः ही सामने आ जाती है। अम्बुबाची पर्व एक महिला के रजोधर्म का त्यौहार है जो अपने आप में अद्वितीय है। 52 शक्तिपीठों में से एक कामाख्या में माँ आदि शक्ति की पूजा धरती माँ के रूप में होती है। हालाँकि मंदिर के गर्भ गृह में माँ शक्ति की कोई मूर्ति नहीं है अपितु उनके योनि रूप की पूजा की जाती है, जिसके भीतर से एक प्राकृतिक जल धारा निकलती रहती है।  यह त्यौहार अषाढ़ महीने (असम में इसे अहार कहा जाता है) के सातवें दिन से प्रारम्भ होता है। इस दिन माँ शक्ति जो धरती माँ के रूप में पूजी जाती हैं, रजस्वला होती हैं और अपने वार्षिक मासिक धर्म में प्रवेश करती हैं । “अम्बु” का अर्थ है जल और “बाची” का अर्थ है बहते रहना। तीन दिनों तक उस क्षेत्र के “सभी मंदिर बंद” रखे जाते हैं। मुख्य मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित योनि रूपी प्रतिमा को वस्त्रों से ढक दिया जाता है। इस दौरान न तो पुजारी न ही श्रद्धालुओं को मंदिर के गर्भगृह में जाने या माँ शक्ति की पूजा करने की अनुमति होती है। तीन दिनों के पश्चात चौथे दिन मंदिर के कपाट खोले जाते हैं और माँ को स्नान कराने के बाद उनके शुद्धिकरण की प्रक्रिया पूरी की जाती है। इसके पश्चात प्रतिमा पर ढके गए “अंगवस्त्र” प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं को बांटे जाते हैं। इन तीन दिनों के दौरान ही अम्बुबाची का पर्व मनाया जाता है।

यह त्यौहार तमाम तरह के श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। न केवल भारत के कोने कोने से अपितु विदेशों से भी श्रद्धालुगण अपनी जिज्ञासा का समाधान करने के लिए आते हैं। पूरा नीलांचल क्षेत्र एक अद्वितीय ऊर्जा से सराबोर रहता है। इसके अलावा यह त्यौहार तांत्रिक विद्या के जानकार साधु संतों और संन्यासियों के लिए एक अवसर होता है कि वो अपनी विद्या को और माँझ सकें। अम्बुबाची को पूर्वोत्तर का महाकुम्भ भी कहा जाता है। तंत्र विद्या और मंत्र शक्ति का सनातन में विशेष महत्व है और कामाख्या इसके लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। अषाढ़ के इन तीन दिनों के दौरान नीलांचल पर्वत की गुफा – कन्दराएँ तपस्वियों से भरी होती हैं।

अम्बुबाची पर्व उन सभी प्रश्नों का उत्तर है जो सनातन और रजोधर्म के सम्बन्ध पर उठते हैं। विश्व के किसी भी पंथ या संस्कृति में ऐसा कोई त्यौहार नहीं है जो महिला के रजोधर्म पर आधारित हो। सबरीमला की परंपरा पर प्रश्न उठाने वाले बुद्धजीवि अम्बुबाची पर भी प्रश्न उठाते हैं लेकिन यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि महिला को अर्धांगिनी स्वरुप में जितने समावेशी तरीके से सनातन ने स्वीकार किया है उतना संभवतः किसी ने नहीं।

रजोधर्म को हमेशा ही विवाद का विषय बना कर प्रस्तुत किया गया जिससे एक बड़े वर्ग के मन में अपनी ही संस्कृतियों और परम्पराओं के प्रति असंतोष उत्पन्न किया जा सके। आज पूरे भारतवर्ष के भीतर मुट्ठीभर मंदिरों (जिनकी अपनी एक विशेष परंपरा है) को छोड़ दें तो ऐसा नहीं है कि कोई भी मंदिर किसी महिला से उसके रजोधर्म के बारे में प्रश्न पूछता है। यह एक ऐसा विषय रहा जिसे वामपंथियों ने सनातन की रूढ़ि के रूप में प्रचारित किया।  छद्म नारीवाद का छद्म विद्रोह केवल हिन्दू आस्था के प्रति ही खुलकर सामने आता है। बाकि पन्थों और सम्प्रदायों में जो भी भेदभाव है वो किसी को नहीं दिखता है। लेकिन अम्बुबाची पर्व इस छद्म नारीवाद के मुंह पर एक जोरदार तमाचा है।

प्रथम पूज्य कामाख्या शक्तिपीठ भारत का वह अमूल्य स्थल है जहाँ से रजोधर्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया के रूप में दुनिया के सामने निकल कर आता है। यह एक देवी के रजोधर्म का वह अनूठा उदाहरण है जो बताता है कि प्रकृति कितनी उपजाऊ और मातृत्व से परिपूर्ण हो सकती है। मंदिर के गर्भगृह में स्थित योनि प्रतिमा भी इस बात का द्योतक है कि ऊर्जा का जो स्त्रोत शेष विश्व के लिए वासना का केंद्र है वह सनातन में प्रथम पूज्य है। इसके बाद भी जिसे अम्बुबाची में खोट दिखे वो तीन दिनों के लिए नीलांचल की ऊर्जावान श्रृंखलाओं में समय बिताए।

 

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