धर्म Opinion

सनातन एवं पर्यावरण संरक्षण।

इस शीर्षक के दो भाग हैं, एक है सनातन और दूसरा भाग है पर्यावरण संरक्षण। सामान्य तौर पर दोनों का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं दिख सकता है किन्तु यदि पूर्वाग्रहों एवं वामपंथ के धुंधले चश्मे को उतार दिया जाये तो पर्यावरण संरक्षण का सर्वश्रेष्ठ उपाय सनातन के भीतर ही समाहित दिखता है।

इस शीर्षक के दो भाग हैं, एक है सनातन और दूसरा भाग है पर्यावरण संरक्षण। सामान्य तौर पर दोनों का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं दिख सकता है किन्तु यदि पूर्वाग्रहों एवं वामपंथ के धुंधले चश्मे को उतार दिया जाये तो पर्यावरण संरक्षण का सर्वश्रेष्ठ उपाय सनातन के भीतर ही समाहित दिखता है।

समस्या क्या है पहले उसकी बात कर लेते हैं। पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है जिसके कारण ध्रुवों की बर्फ पिघल रही है ग्लेशियर समाप्त होते जा रहे हैं। ऋतुओं में असामान्य तौर पर परिवर्तन देखा जा रहा है। सभी प्रकार की जैव एवं पादप विविधता पर्यावरण के असंतुलन और प्रदूषण से प्रभावित हैं। जल-थल-वायु सब दूषित हो रहे हैं। जिस गति से औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण बढ़ रहा है, उसी गति से वन एवं हरित क्षेत्र का विनाश होता जा रहा है। दुनिया भर में विभिन्न प्रकार की संधियाँ हो रही हैं और साथ ही अलग-अलग शहरों में बैठकें आयोजित की जा रही हैं। बैठकों में पर्यावरण संकट को लेकर बड़ी चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं। विकसित देश जिन्होंने औद्योगिकीकरण के कई स्तरों को पार कर लिया है और पर्यावरण के संरक्षण की वास्तविक जिम्मेदारी जिनके कन्धों पर है, वो अब इन संधियों से उकता चुके हैं। उनका कहना है कि विकासशील देश पर्यावरण से सम्बंधित रियायतों का गलत फायदा उठा रहे है और अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हट रहे हैं। फिर भी पर्यावरण संकट किसी के लिए राजनैतिक अथवा कूटनीति का विषय हो सकता है लेकिन अंतिम तौर पर इसका नुकसान इस पृथ्वी के पर्यावरण और पूँजीवाद, साम्यवाद जैसे बड़े बड़े शब्दों से अनभिज्ञ आम मनुष्य को हो रहा है।

पर्यावरण प्रदूषण के पीछे एक बड़ा कारण है, अपने पर्यावरणीय साधनों का दुरूपयोग एवं उनका हनन। जैसे ही हम समय के साथ आधुनिक होते गए अपने पर्यावरण के प्रति हमारी संवेदनशीलता घातीय रूप से कम होती गई। अब प्रश्न ये उठता है कि पर्यावरण के इस भीषण संकट से निपटने के लिए क्या हमें सनातन की ओर जाना होगा? इसका उत्तर यदि हाँ में हुआ तो आश्चर्य की कोई बात नहीं है।

समझते हैं कैसे।

सनातन धर्म एवं हिन्दू संस्कृति की महान विशेषता रही है कि इनके दर्शन में पृथ्वी एवं प्रकृति का स्थान सबसे उच्च रखा गया है। प्रातःकाल शय्या त्यागने के बाद धरती पर अपना पैर रखने के पहले उससे क्षमा याचना करना दिनचर्या का अहम हिस्सा है। शांति मंत्र में पृथ्वी से लेकर अंतरिक्ष तक जीवों और पादपों सभी का वर्णन है। अपनी रीतियों और परम्पराओं के अनुपालन के दौरान हम प्रकृति से बड़ी निकटता से जुड़े होते हैं।

विभिन्न प्रकार के अवसरों के सफल आयोजन के लिए विभिन्न वृक्षों के भागों की आवश्यकता होती है। बांस उनमें से प्रमुख है। हालाँकि केंद्र सरकार के द्वारा राष्ट्रीय बांस मिशन का प्रारम्भ किया गया है ताकि अन्य वृक्षों की तुलना में बांस का अधिक उपयोग किया जाए। हम पहले से बांस का उपयोग करते आ रहे हैं और हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा भी अपनी आजीविका के लिए बांस पर निर्भर है।

हम तुलसी जैसे छोटे पौधे से लेकर पीपल और बरगद जैसे विशाल वृक्ष की भी आराधना करते हैं। आपको जानकार संभवतः आश्चर्य की अनुभूति हो सकती है किन्तु भारत के कई ऐसे गाँव हैं जहाँ आम, आंवला और महुआ जैसे फ़लदायी वृक्षों का उपनयन संस्कार पूरे रीति रिवाज के साथ किया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें पुत्र के स्वरुप में देखा जाता है। सनातन में वर्णित सोलह संस्कारों में ऐसा एक भी संस्कार नहीं है जिसमे कोई रीति वृक्षों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से न जुड़ी हो।

हिन्दू धर्म में जल के स्त्रोतों का भी अपना अलग महत्व है, विशेषकर नदियों का। हिन्दू पुराणों एवं शास्त्रों में भारतवर्ष के भीतर सात पवित्र नदियों का वर्णन है। गंगा, यमुना, नर्मदा, कृष्णा जैसी नदियों को माता का स्थान दिया जाता है। हाल ही में प्रयागराज में विश्व का सबसे विशाल धार्मिक अनुष्ठान, कुम्भ पर्व संपन्न हुआ जो गंगा के तट पर ही आयोजित किया जाता है। दैनिक सन्ध्या आरती हो या किसी विशेष उपलक्ष्य का विस्तृत अनुष्ठान इन नदियों के जल के बिना अधूरा ही लगता है। त्योहारों में इनकी पूजा की जाती है। नदियों के अलावा तालाबों और कुओं की भी मान्यताएं हैं। कई हजार वर्षों से विभिन्न सभ्यताएं नदियों के तट पर ही विकसित हुई और फलीं फूलीं लेकिन सनातन धर्म में जो पद नदियों के लिए निर्धारित किया गया है, वैसा सम्मान संभवतः किसी संस्कृति में नहीं दिया गया है।

पृथ्वी पर उपस्थित जैव विविधता के लिए भी सनातन संस्कृति सदैव ही सहिष्णु रही है। भगवान श्री विष्णु के दस अवतारों में पहले तीन अवतार मत्स्य, कत्स्य और वाराह क्रमशः जलचर, उभयचर और थलचर को इंगित करते हैं। सांप जैसे छोटे जीव से लेकर हाथी जैसे विशाल प्राणी हमारी सनातन संस्कृति में पूजे जाते हैं। गाय की महत्ता किसी से भी छिपी हुई नही है किन्तु गाय के साथ ही उसी श्रेणी के अन्य पशु भी हमारे रिवाजों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। दत्तात्रेय भगवान ने अपने जीवन काल में किसी व्यक्ति को गुरु स्वीकार करने के स्थान पर 33 प्रकार के जीवों को अपना गुरु माना था।

ऐसे ही अनंत उदाहरण हैं जो ये बताते हैं कि सनातन हमें अपनी प्रकृति से प्रेम करना सिखाता है न कि उसका हनन करना। पर्यावरण संरक्षण एक मानविक मूल्य है, जीवन का संस्कार है और इस पूरी दुनिया को इसका सबसे बड़ा संदेश सनातन संस्कृति से प्राप्त हो सकता है। भारत भी पर्यावरण के इस संकट से अछूता नही है लेकिन जहां हम पूरे विश्व को सनातन के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का उपदेश दे रहे हैं क्या हम उसका पालन कर रहे हैं? गंगा की सफाई के लिए हजारों करोड़ खर्च किए जा रहे हैं। तमाम संसाधन जुटाकर यमुना को अविरल और निर्मल बनाने के प्रयत्न शुरु हैं लेकिन हमारे कर्त्तव्य अभी भी क्षीण हैं। हमें भी निजी तौर पर उन सभी कार्यों को बंद करना होगा जो हमारी माता स्वरूपा प्रकृति को हानि पहुंचाते हैं।

पर्यावरण प्रदूषण एक विकराल समस्या है लेकिन यदि भारत इस समस्या का समाधान विश्व के सामने लेकर आता है तो यह एक महान उपलब्धि होगी। समाधान यही है कि नागरिकों के मध्य पर्यावरणीय मूल्यों का विकास करना होगा जिससे यह प्रथ्वी सदैव ही सुजला-सुफला-शस्य श्यामला रह सके।

 

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