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विभीषण पर भी लागू हुआ था दल बदल अधिनियम।

दलबदल कानून तो विभीषण के ऊपर भी लागू हुआ था और उन्हें राज्य के बाहर कर दिया गया था। किन्तु उन्होंने अपने राज्य और पद की चिंता नहीं की।
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विभीषण अपने बड़े भाई लंकापति रावण को धर्म के अनुसार आचरण करने की शिक्षा देते हैं। सीता को स-सम्मान भगवान राम के पास वापस भेजते हुए उनसे क्षमा मांगने के लिए कहते हैं। किन्तु अहंकारी रावण बिना विचार किए हुए अपने अनुज विभीषण को लात मार कर लंका राज्य से बाहर निकाल देता है। ऐसे में विभीषण श्री राम की छाया में पहुँचते हैं और अपनी शरण में स्थान देने के लिए उनसे प्रार्थना करते हैं। श्री राम और विभीषण के संवाद को श्रीरामचरितमानस में तुलसीदास जी ने बड़े ही गूढ़ चिंतन के साथ पिरोया है किन्तु विभीषण की कही हुई एक बात बहुत ही महत्वपूर्ण है जो आज भी शत प्रतिशत प्रासंगिक है।

नाथ दसानन कर मैं भ्राता । निसिचर बंस जनम सुरत्राता ।।

सहज पापप्रिय तामस देहा । जथा उलूकहि तम पर नेहा ।।

अर्थात “हे नाथ! मैं दशमुख रावण का भाई हूँ। हे देवताओं के रक्षक! मेरा जन्म राक्षस कुल में हुआ है। मेरा तामसी शरीर है। स्वभाव से ही मुझे पाप प्रिय है जैसे उल्लू को अन्धकार पर सहज स्नेह होता है”।

यहाँ विभीषण सीधे तौर पर स्वीकार करते हैं कि वो राक्षस कुल में पैदा हुए हैं और पाप करना उनका स्वभाव है। लेकिन फिर भी अपने कुल और स्वभाव का त्याग करते हुए विभीषण धर्म को प्राथमिकता देते हैं और अपने जीवन को सत्य के लिए समर्पित करते हैं। यही विभीषण की महानता है। यही विभीषण का त्याग है। ऐसा नहीं है कि विभीषण ने रावण को सही रास्ते पर लाने का प्रयत्न नहीं किया किन्तु रावण ने यह स्वीकार नहीं किया। उल्टा विभीषण के ऊपर राजद्रोह का आरोप लगा और उन्हें कुलघाती कहकर अपमानित किया गया। इतना सब होने के बाद भी विभीषण अपनी भक्ति और नैतिक कर्त्तव्य पर अडिग रहे।

आज भी विभीषण के विचार जीवंत होने चाहिए। विशेषकर भारतीय दलगत राजनीति में। हमने कई बार ये देखा है कि पार्टियों ने अपने नेताओं को सिर्फ इसलिए नोटिस भेज दिया क्योंकि उन्होंने सरकार के कुछ महत्वपूर्ण फैसलों का समर्थन कर दिया। ये पूरी तरह से गलत है। यदि कोई मुद्दा राष्ट्र, धर्म अथवा जन कल्याण से सम्बंधित है तो उसका समर्थन करना एक सामूहिक ही नहीं अपितु व्यक्तिगत कर्त्तव्य भी है। कुछ मुट्ठीभर जन प्रतिनिधि इस कर्त्तव्य का पालन भी करते हैं किन्तु दल विशेष की विचारधारा से जुड़े होने के कारण उन्हें अपना समर्थन वापस लेना पड़ता है या अपनी पार्टी छोड़नी पड़ती है।

यह नैतिक न्याय का उल्लंघन है। दल बदल अधिनियम में भी कई बार इसकी चर्चा की गई कि वैयक्तिक विचारधारा भी मायने रखती है। यह सही है कि दलगत राजनीति में सामूहिक उत्तरदायित्व की अवधारणा अस्तित्व में है किन्तु राष्ट्रहित के मुद्दे पर किसी सदस्य द्वारा पार्टी लाइन से अलग स्टैंड लेने पर उसके ऊपर की गई कार्यवाही नैतिक रूप से गलत ही होगी भले ही संविधान उसे सही माने। ऐसे में यह उस सदस्य का कर्त्तव्य है कि वह नैतिकता को महत्व दे। क्योंकि इतनी समझ सबके भीतर होती है कि क्या गलत है और क्या सही। दलबदल कानून तो विभीषण के ऊपर भी लागू हुआ था और उन्हें राज्य के बाहर कर दिया गया था। किन्तु उन्होंने अपने राज्य और पद की चिंता नहीं की।

यहाँ एक और महत्वपूर्ण सीख सामने आती है। वो ये है कि कोई व्यक्ति किस वंश में जन्म लेता है यह मायने नहीं रखता। महत्वपूर्ण हैं उसके कर्म। चाणक्य ने भी कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था को सर्वश्रेष्ठ माना, जहाँ वर्ण निर्धारण जन्म से नहीं अपितु कर्म से सम्बंधित है। विभीषण असुर कुल में जन्मे थे किंतु उन्होंने असुर स्वभाव का त्याग किया और श्री राम के साथ आकर धर्म का चुनाव किया। इसका परिणाम यह मिला कि उन्हें श्री राम के समक्ष सुग्रीव और जामवंत के समतुल्य स्थान प्राप्त हुआ।

भले ही यह संसार विभीषण को “घर का भेदी” कह कर उनके त्याग का अपमान करे किन्तु अतीत में उन्हें वही स्थान मिला रहेगा जो श्री राम ने उनके लिए तय किया है।

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