Opinion

जब एक देश, राष्ट्र बनता है।

उत्तरं यत समुद्रस्य, हिमाद्रेश्चैव दक्षिणं।
वर्ष तद भारतं, नाम भारती यत्र संतति।।

अर्थात, विशाल महासागर के उत्तर में एवं महान हिमालय के दक्षिण में स्थित जो भूमि है वही भारत हैं एवं यहाँ निवास करने वाले लोग भारतीय।

हमारे महानतम एवं पुरातन ग्रंथों में से एक विष्णु पुराण में इस श्लोक के द्वारा भारत की एकात्मता को बताया गया है। अटल जी सदैव ही कहा करते थे कि भारत मात्र एक भूमि का खंड नहीं है अपितु जीता जागता राष्ट्र पुरुष है। कई सहस्त्राब्दियों से हम भारत को मातृ रूप में पूजते आए हैं। अलग – अलग समय में भारत को विभिन्न नामों से जाना गया किन्तु एक राष्ट्र के तौर पर भारत सदैव एक भाव से विश्व में सुशोभित रहा।

लेकिन एक देश और राष्ट्र में क्या अंतर है? जब हम महान भारत राष्ट्र की बात करते हैं तो इसके मायने क्या हैं? शाब्दिक रूप से देश और राष्ट्र में कोई अंतर नहीं दिखता है किन्तु जब विस्तृत व्याख्या की जाती है तब वास्तविकता स्पष्ट रूप से सामने आती है।

एक देश क्या है? ऐसा भौगोलिक क्षेत्र जिसकी अपनी राजनीतिक एवं कूटनीतिक पहचान है। जिसके बाहरी विश्व से आर्थिक, राजनैतिक एवं कूटनीतिक सम्बन्ध होते हैं। जिसकी सम्पूर्ण गतिविधियाँ एक सीमा रेखा के भीतर ही संचालित होती हैं। एक देश की अपनी अखंडता एवं संप्रभुता होती है। एक देश का अस्तित्व अपने नागरिकों के कल्याण से है।

इस हिसाब से तो भारत भी एक देश है। बिलकुल भारत एक देश भी है, किन्तु जब हम “भारत राष्ट्र” की कल्पना करते हैं तब उसमे सम्मिलित है भारत का सनातन धर्म एवं विशाल संस्कृति। जब एक देश अपनी संस्कृति की महानता से सुशोभित होता है तब वह राष्ट्र बन जाता है।

एक राष्ट्र में धर्म का समावेशन होता है। भारत में वैसे भी अनगिनत संस्कृतियाँ फली फूलीं। विभिन्न भाषाओं एवं बोलियों में भारत की महानता की कथाएं कही गई। अलग अलग दिशाओं में परिधानों और व्यंजनों की विविधता से भारत की आत्मा सुसज्जित है। ऐसे में हमारे महान पूर्वजों ने भारत की एकात्मता को सुनिश्चित करते हुए एक संगठित राष्ट्र की रचना की। जिस महान भारत की कल्पना रामायण एवं महाभारत काल से की गई उसे कौटिल्य के सानिध्य में पहले चन्द्रगुप्त मौर्य और बाद में पुष्यमित्र शुंग जैसे शासकों द्वारा आगे बढ़ाया गया। हमारे इतिहास में एक ऐसा समय भी आया जब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ लिया गया। किन्तु तमाम तरह के आक्रमणों और मजहबी बर्बरताओं को झेलते हुए भारत अपने अस्तित्व में अडिग रहा।

भारत का अस्तित्व इसलिए सुरक्षित रहा क्योंकि जिस भारत राष्ट्र की अवधारणा सदियों पहले दी गई थी, वह भौगोलिक एवं धार्मिक रूप से एकात्म स्वभाव की थी। सप्तसिन्धु के नाम से जाना जाने वाला भू भाग सनातन की साझी परंपरा से जुड़ा रहा।

कुल मिलकर एक देश की अवधारणा कुछ अर्थों में संकुचित होती है। कहने को तो विश्व में सैकड़ों देश हैं। पाकिस्तान, सीरिया, इराक, सोमालिया जैसे देश भी हैं जिनकी अपनी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं है। गृह युद्ध से जूझ रहे इन जैसे कई देश हैं जहाँ मजहबी उन्माद चरम पर है क्योंकि एक वर्ग विशेष अपनी प्रभुसत्ता स्थापित करने हेतु दूसरे वर्गों के अस्तित्व को ही ख़त्म कर देना चाहता है। इन्हे राष्ट्र नहीं कहा जा सकता है।

राष्ट्र तो भारत, इजराइल, अमरीका, जापान, चीन जैसे होते हैं। जहाँ राष्ट्रवाद सामूहिक गर्व का विषय है। इसके अलावा एक सांझी संस्कृति के अभाव में भी राष्ट्रों ने राष्ट्रवाद को ही अपनी संस्कृति के रूप में स्थापित कर लिया। देश की परिभाषा के उलट राष्ट्र की अवधारणा विशाल अर्थों वाली है।

लाखों वर्षों से अमर रहा भारत भविष्य में भी संस्कृतियों और सभ्यताओं का नेतृत्व करता रहेगा। आवश्यकता है एक राष्ट्र के रूप में उसे संगठित बनाए रखने की।

जय हिन्द।।

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